Friday, July 27, 2007

जागते रहो सोनेवालो!

तो भाई न्यूज़ चैनल को लेकर मोहल्ला पर तो गरमा गर्म बहस चल ही रही थी... अब देख रहे हैं ताज़ा-ताज़ा अनामदास जी भी उसी बहस को गरमाने में लगे हुए हैं। यहां इन सब की बातो पर सहमति- असहमति का मुद्दा मेरे लिये नहीं है... मेरी चिन्ता तो मनोरंजन चैनल में जो-जो दिखाया जाता है उसके बारे में दो-एक बात अलग से जोड़ने भर की है... रोज़ जो दिखता है, उसे देख कर तो यही लगता है कि सारे फसाद की जड़ औरते ही हैं। घर में सज-धज कर घर तोड़ने की योजना बनाते रहते से अलग जीवन की और कोई योजना इनके पास नहीं है। घर बैठ कर ये सब अपनी डाल कमज़ोर करने पर तुली रहती हैं और इन सब की नेता हैं एकता कपूर। इन स्थितियों को देखकर लगता है कि आने वाले दिनों में इस देश के जितनी भाभियां, देवरानियां, चाचा, ताऊ, बूआ, मौसी, मामा कहीं मुंह छिपाते घर के किसी कोने में पडे रहेंगे... उन्हें शर्म आयेगी जब उन्हे इन नामो से बुलाया जायेगा! जितने भी चैनल है उन सब का शीर्षक देखियेगा तो समझ में आ जायेगा कि सीरियल का नाम चुनने में इनकी प्रतियोगिता आजकल फ़ैशन में चढ़े भोजपुरी फिल्मों से है। मर्द बेचारा ऐसा जैसे कि नामर्द, सारी चीज़े उसकी आंखो के सामने घटित हो रही होती हैं और वो खामोश लुंजपुंज हाथ-पैर हिलाने, कुछ करने-धरने में पूरी तरह, बुरी तरह फेलियर।

वैसे इधर स्थिति थोड़ी बदली भी है... एकता कपूर का साम्राज्य थोड़ा लड़खड़ाया है। उनके नये प्रयोग सफ़ल होते दीख नहीं र्हे। इस मामले मे प्राइम टाइम बैंड ज़ी टीवी स्टार टीवी के बनिस्पत मजबूत दिखाई दे रहा है। पर वो भी वही सब कर रहा है जॊ एकता कपूर पहले कर चुकी है। न्यूज़ चैनल पर लिखने वाले लिख रहे हैं पर जिन चैनलों के पास ज़्यादा दर्शक हैं उनका भी हाल न्यूज़ चैनल से बहुत बेहतर नहीं है। भाई, यह ऐसी दुखती नस है कि इस पर लगातार हल्‍ला मचाये रखने की ज़रूरत है। मगर ये भी जानता हूं कि आप हमारा लिखा पढ़कर पतली गली से सरक लेंगे... चैनलवालों को उनकी मनमानी करते रहने देंगे? अपना मुंह खोलिये, कुछ तो बोलिये... एक शेर सुना कर अपनी बात पर विराम लगाना चाहुंगा:

सुबह होती है शाम होती है!
उम्र यूं ही तमाम होती है!!
और जिन्हें पं. छ्न्नूलालजी और राशिद खान को सुनना है वो इस पेज़ के एकदम नीचे चले जायें.. आनन्‍द ही आनन्द आयेगा.

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