Friday, August 10, 2007

आखिर आज़ादी का मतलब क्या है?

स्वतंत्रता दिवस की तैयारी में सरकार व्यस्त है, जनता अपने में बेहाल है। मस्त है। बाज़ार का सूचकांक चढ़ना उतरना बना हुआ है। झुग्गियों मे रह रही जनता जैस तैसे बरसात में जहां-जहां से छत टपक रही है वहाँ प्लास्टिक लगाती-चढ़ाती त्रस्त है। नौनिहाल अपने स्कूल के ड्रेस को धो रहे हैं, अपने सफेद जूतों में और खली लगाकर उसको चमकाने की जुगत में है। स्कूल का प्रिन्सिपल स्कूल के स्टोर से किसी बक्से के कोने मे पड़े तिरंगे को ढुढवा रहा है। मीडिया हमे टीवी पर बता रहा है कि दिल्ली विधान सभा मे एक आदमी कैटीन चला कर पांच हज़ार से ज़्यादा प्लाट खरीद लेता है, गाड़ि‍यां ऐसी जो मर्सिडिज़ से भी मंहगी है। उसका मालिक बना काफ़ी समय से इतरा रहा था, आखिरकार कानून के हाथ चढ़ा। नेताओं की खरीद-फ़रोख्त संसद और विधान सभा मे धड़ल्ले से हो रही है, इसी में कुछ हैं जो मुजरिमों को सज़ा पर सज़ा दिये जा रहे है। ऐसा लगता है कि सारी व्यवस्था मानो सही चल रही है। कुछ इस बात में शान देख रहे हैं तो कुछ को लगता है कि साम्प्रदायिक नेता और संसद और विधानसभा से जुड़े जननायकों के किस्से इन न्यायालयो की दीवारों मे दफ़न हैं। एक छोटा सा वर्ग है जो धन के अकूत, बडे हिस्से पर काबिज़ है, इसकी कभी सुध होती है कभी भूले रहते हैं, जो नहीं भूलते हैं वह यह कि अगस्‍त महीने में नियम से स्वंतन्त्र्ता की वर्षगांठ की तैयारी करने लगते हैं!

आखिर आज़ादी का मतलब क्या है?
तिरंगा ऐसा क्यों हो गया है जो सिर्फ़ क्रिकेट के मैदान में ही लहाराया जाता है, और हार हो तो मैदान से गायब, ऐसा क्यों? शहर के चौराहे पर गरीब बच्चा हाथ में छोटे-बड़े झन्डे बेच कर उस दिन की कमाई से किसी तरह अपना पेट पाल ले, ऐसा क्यों है? आज आज़ाद देश में ऐसा भी हो रहा है कि एक विकलांग अपनी छोटी सी मांग के पूरा नही होने पर आत्महत्या करने पर मजबूर है। ये कौन लोग हैं जो विकलागों को बेबस और मजबूर बना रहे हैं, ऐसा क्यों है? क्या हम इस सबके आदी हो गये हैं? सब चलता है इस वाक्य को हमने अपना ब्रम्ह: वाक्य बन जाने दिया है? और इसी ब्रह्म: वाक्‍य की छतरी के नीचे प्रेम से देशभक्ति का गीत भी गाते रहते हैं, और हमें शर्म भी नहीं लगती? आइए, फिर से गाने या रेंकने लगें: जहां डाल डाल सोने की चिडिया करती थी बसेरा ये भारत देश है मेरा ये भारत देश है मेरा....

6 comments:

Isht Deo Sankrityaayan said...

धूमिल याद आ रहे हैं.

जोगलिखी संजय पटेल की said...

धन्य हे मेरे देश
जहाँ आज़ादी जन्म सिध्द अधिकार है
कर्तव्य बेकार है
प्रमाद की गूँज
अश्लीलता का आग्रह
जो नहीं करना चाहिये वह
सब करने को तैयार हैं
क्योंकि आज़ादी यहाँ जन्म सिध्द अधिकार है.
धन्य हे मेरे देश ....

विमल भाई ...जयहिन्द.
मन उद्वेलित था ’आख़िर आज़ादी का मतलब पढ़ कर सो पू.पापा श्री नरहरि पटेल की हस्ताक्षर रचनाओं में से एक है धन्य है मेरे देश का एक बंद यहा लिख गया..ये रचना उन्होने सत्तर के दशक में माननीय अटलजी के साथ इन्दौर में पढ़ी थी..टिप्पणी के रूप में लिख गया..जो यहाँ माकूल भी बन पड़ी है. पूरी रचना मेरे ब्लाँग पर १५ अगस्त के पूर्व जारी करने की कोशिश करूंगा.

आपकी पोस्ट सचाई को उघाड़ती है. साधुवाद.

ajai said...

Jab tak achchhe log aage nahi aayenge aur janta bhed-bakri ki tarah galat logo ke peechhe chalegi ,koyi sambhavna nazar nahi aati.Aaj jaroorat hai samjhneki, ki hum kaise logo ka netritva sweekarte hai.Pratibha palayan kar rahi hai ,koyi jimmedari nahi lena chahta ,sab mauka parast hai ,agar sabhi log behtar jindagi ke liye videsh chale jayenge to DESH ko sunder kaun banayega?Ek kavita yaad aa rahi hai pata nahi Dushyantji ki hai ya Nagarjunji ki ya kisi aur ki par hai bada samyik-
Batlao wo kaun desh ka BHARAT bhagya vidhata hai.
Fataa suthanna pahne jiska gun Haricharna gaata hai.

बोधिसत्व said...

सर
टालस्टाय ने कहीं लिखा है कि
आजादी का मतलब है हर कोई हरहाल में मुझसे सहमत हो।
और मल्होत्रा तो पकड़ में आ गया है। कितने मल्होत्रा मस्त हैं इस मुल्क में। वे कभी नहीं धरे जाएगें।

उम्दा सोच said...

विमल जी आप ने वर्तमान परिस्थिति का जो चित्रण किया है अगर देश यूँ ही चलता रहा तो एक दिन हमारी आज़ादी भी खतरे में पड सकती है!

अनिल रघुराज said...

दुख तो इसी बात का है साथी कि आज़ादी के ठीक बाद मोहभंग का सिलसिला शुरू हो गया था, जे पी आंदोलन के समय दूसरी आज़ादी की भी बात चली, हमारे-आप जैसे लोग दशकों से अपनी पीड़ा ज़ाहिर कर रहे हैं, फिर भी कुछ खास बदल नहीं आ रहा। हालत वैसी ही है जब धूमिल ने पूछा था कि आज़ादी क्या तीन थके हुए रंगों का नाम है, जिसे एक पहिया ढोता है...