Saturday, December 15, 2007

उस्ताद राशिद खान को सुनते हुए !!

उस्ताद राशिद खान को तो आपने सुना ही होगा, अभी पारुल ने उनका गायन अपने ब्लॉग पर लगाया भी था जो आपको पसन्द भी आया होगा, राशिद खान को जब सुना तो वाकई उनके गायन शैली मुझे तो बहुत पसन्द आई, वैसे बहुतों को हमने लाईव सुना है,पर पसन्द तभी आता है जब उस आवाज़ को अपने भीतर भी गुनगुनाते हुए सुना जा सके, राशिद जी की यही खासियत है
आज भी आपको राशिद साहब की वो रचनाएं सुनने को मिलेंगी जिसे सुनने बाद भी कम से कम बोल तो आपकी जुबान पर होंगे ही.

शास्त्रीय संगीत के बारे में आम धारणा बन गई है कि बड़ा बोझिल होता है, झेल होता है, अरे इस पर तो एक चुट्कुला भी आम है कि एक जगह बढिया संगीत का जलसा हो रहा था एक शास्त्रीय गायक अपनी तान छेड़े हुआ था,

जिस सुर में वो गायक गा रहा था वो करूण रस ही था शायद ,तभी एक व्यक्ति ने देखा कि उसके बगल वाला व्यक्ति रो रहा है उसकी आंख से आंसू धीरे धिरे झर रहे हैं, उसे आश्चर्य हुआ क्योकि

वो अपने आपको शास्त्रीय संगीत का बड़ा मर्मग्य समझ कर ही रस ले रहा था उसे इस बात पर आश्चर्य हो रहा था जिन सुरों को वो समझता है पर उसके दिल में उस तरह तो नहीं उतर रही पर ये व्यक्ति गायक की तान पर आंसू बहा रहा है, ज़रूर कोई बड़ा पंडित है कोतुहल वश पूछ बैठा ' लगता है गायक के सुर ने आपके मर्म को छू लिया है आप शास्त्रीयता में वैसे ही इतने गहरे धंसे हुए च्यक्तित्व लगते है क्या मुझे भी समझाएंगे किस बात पर आपके आंसू निकल रहे है' तो सामने वाले व्यक्ति ने कहा कि 'वो बात नही है जहां मै बैठा हूं वहां पैर हिलाने की जगह नही है पैर की तकलीफ़ बढ गई है इसी से रोना आ रहा है', पर यहां मेरी मंशा रुलाने की कतई नही है

आज आप सुनिये राशिद खान की आवाज़ का जादू, आपको सुनाउं इसका मौका आज जाकर मिला है !!

पहला गीत फ़िल्म जब वी मेट से है !




ये दूसरी रचना नैना पिया से है



और ये तो आप सुन ही ले फिर बात करें

10 comments:

Ashok Pande said...

बेहतरीन पोस्ट विमल जी। मैं एक अर्से से उस्ताद राशिद खान को सुनता रहा हूं। आपके ब्लाग पर उन्हें सुन कर बहुत आनन्द आया। बने रहिये।

parul k said...

bahut aabhaar vimal ji..bahut khuubsurat gayaki hai raashid khaan ki..kuch din pahaley mainey "kahuun kaisey sakhi"song post kiya thaa magar vo log sun nahi paaye..aapka shukriya

avinash said...

भई वाह!!!

yunus said...

भई विमल जी , अदुभुत प्रस्‍तुति । उस दिन आपके मोबाईल पर रशीद खां साहब को सुनकर दिल कहां भरा था । अभी भी कहां भरा है । ये सारी चीजें हमें अपने निजी संग्रह के लिए चाहिए । हम जल्‍दी ही मिल रहे हैं इस मकसद से । एक बात और कह दें । साधुवाद साधुवाद

अनूप शुक्ल said...

बहुत खूब!

mahashakti said...

आपके इस पोस्‍ट को पढ़ और सुनकर अच्‍छा लगा बधाई।

रवीन्द्र प्रभात said...

अदुभुत प्रस्‍तुति ,बधाई।

जोगलिखी संजय पटेल की said...

विमल भाई,राशिद ख़ान रामपुर सहसवान घराने के रौशन चिराग़ हैं. नब्बे के दशक में वे आई.टी.सी.रिसर्च अकादमी कोलकता के प्रशिक्षु रहे हैं और उन्हें विदुषी गिरिजादेवी,उस्ताद मुश्ताक़ हुसैन ख़ाँ साहब , पं.वी.जी जोग और पं अजय चक्रवर्ती का सानिध्य और संगसाथ मिला है.वे इस अकादमी के सबसे प्रतिभाशाली कलाकार रहे हैं.विमल भाई इस गुणी कलाकार को मिला सबसे बड़ा सम्मान यह है कि पुणे में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले (दिसम्बर)प्रतिष्ठित सवाई गंधर्व संगीत समारोह के आयोजक और गानयोगी पं भीमसेन जोशी ने कुछ वर्ष पूर्व राशिद भाई के गायन के ठीक पहले मंच पर आकर कहा कि अब यदि आप सब को मेरी गायन विरासत का जलवा देखना है तो राशिद ख़ान के गायन में देखिये.सुर की शुध्दता,तानों का वैशिष्ट्य,अदभुत लयकारी और खरजपूर्ण स्वर का वितान राशिदभाई की गायकी की ख़ासियत है. वे हमारे भारतीय शास्त्रीय संगीत की महान परम्परा के वैसे ही नुमाइंदे है जिसका निर्वाह उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब,उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ,फ़ैयाज़ ख़ाँ,पं.डी.वी.पलुस्कर,पं.नारायणराव व्यास,पं.विनायकराव पटवर्धन,संगीतमार्तण्ड पं.ओंकारनाथ ठाकुर,पं.कुमार गंधर्व ,पं.मलिकार्जुन मंसूर,विदूषी हीराबाई बडोदेकर और उस्ताद अब्दुल क़रीम ख़ाँ साहब आदि ने किया है. इस अनोखे स्वर-कारीगर के शुमार से ठुमरी महक गई है.

vimal verma said...

आप सभी का शुक्रिया, पर संजयजी आपकी टिप्पणी हमेशा से सारगर्भित ही होती है,इतना अच्छा अनुभव कि हम आप से हमेशा ग्रहण ही करते हैं जो कम से कम मेरे लिये एक सुखद एहसास है,आप हमेशा इसी तरह बने रहें यही कामना है मेरी !!!

अजित वडनेरकर said...

मेरे पसंदीदा गायक की चीज़ सुनवा कर आपने आनंदित कर दिया। आज के दौर में राशिद खां साहब के शिखर पर हैं ऐसा मैं मानता हूं। नवाचार से भी उन्हें परहेज़ नहीं है ये उनकी उस तबीयत को बखान करती बात है जो प्रायः हिन्दुस्तानी संगीतकारों में कम ही देखने को मिलती थी।