Sunday, January 13, 2008

उनके लिये जिन्हें दुनियाँ पागल समझती है !!!

एक समय था जब हम कोई थियेटर वर्कशॉप किया करते थे और उस समय उस हॉल में जितने भी कलाकार थे उनकी ऊल जुलूल हरकतों को देखकर लगता था कि दिमागी रूप से खिसके कुछ लोगों का जमावड़ा है,कोई बाहरी देखे तो झट्के से वो इनसबको पागल तो समझ ही लेगा,वैसे भी ब्लॉग जगत में इस तरह के पागलों की कमी भी नहीं है, वैसे ये हमेशा से मेरे साथ तो कम से कम रहा ही है,कि किसी ऐसे व्यक्ति को जो गली मोहल्लों चौराहों ,इस नुक्कड़ से उस नुक्कड़ पर आपको, हमेशा दिख ही जाता है जो महीनों से नहाया नही है कुछ हाथ में एक गठरी है ,जिसमें उसके कुछ ज़रूरी सामान बंधे हैं,और नुक्कड़ के कूड़े से कुछ ना कुछ हरदम अपने लिये तलाशता,उसके बाल सुतलियों में बंटे,जिसकी कम से कम उसे परवाह नहीं,पता नहीं वो सोता भी है या नहीं पर ऐसे प्राणी को देखकर उनको जानने की उत्सुकता मन में हमेशा से रही है पर कभी सफल नहीं हो पाया,

कुछ ऐसा भी कि ऐसे आदमी को किसी भीड़ से अटे ट्रैफ़िक को बीच सड़क पर खड़े होकर संचालित करते देखा है, जाम हुए रास्ते में उसे कोई भाव भी नही दे रहा किसी को उसकी ज़रा भी चिन्ता नहीं ,जिसकी उसे चिन्ता भी नहीं है और वो अपनी तरफ़ से सब कुछ ठीक करने की कोशिश में लगा है, उसके चेहरे पर खीज भी झलक रही है

,अंग्रेज़ी बोलते पागल को तो अनेकों बार देखा ही है, और ऐसा आदमी किसी ढाबे पर खड़ा हो जाय तो तो खाने को कुछ मिल ही जाता है, और इसी तरह के व्यक्ति पर मोहल्ले के बच्चों को लिहो लिहो करते हुए अपने आपको बचाते हुए भी देखा है,

एक बार हम बनारस में किसी जगह नुक्कड़ नाटक कर रहे थे, नाटक खत्म करने के बाद हम दर्शकों से बात चीत में लगे थे थे,सब अपनी अपनी बातें रख रहे थे,उसी समय एक इसी तरह का मैला कुचैला आदमी, जो अपनी गोद में बठे कुत्ते को प्यार से सहला रहा था, उसने ज़ोर से कहा ’ कुछ नहीं होगा? मैने ये कहते सुन लिया था सो मैं उसके पास गया और मैने पूछा ’क्यों चचा, क्यों नही होगा ? आदमी कुछ भी ठान ले, तो वो उसे हासिल तो कर ही सकता है हां देर भले लग जाय.

तो उस आदमी ने कहा ,इस देश में ७४ का आंदोलन सही आंदोलन था, पर जो उस आदोलन को चला रहे थे उन्होने अपना झंडा जे पी को देकर गलत किया था,क्या हुआ उस आंदोलन का? आज जिनके खिलाफ़ लड़ रहे थे वही घूम फिर कर सत्ता पर काबिज़ हैं, तुम भी कम से कम जेपी जैसे लोगों को झंडा मत थमा देना, भईया इसीलिये मैं जानवर से बहुत प्यार करता हूं कम से कम ये धोखा तो नहीं देता उलटे इतना प्यार करते है कि मनुष्य इसकी बराबरी नही कर सकता, मैं ऐसे दीन हीन चेहरे से ऐसे शब्द सुनकर चौंक गया था,

मेरे दिमाग में उस समय कुछ सूझा भी नही पर आज कुछ ऐसे ही लोगों के बारे लिखते हुए मेरे कबाड़्खाने का ढ्क्कन खुल गया था और ये बात उसी कबाड़्खाने से है जो बरसों से बंद पड़ा था .

अभी मै एक गीत आपको सुनाना चाहता हूं, जो शायद ऐसे लोगों पर लिखा इस तरह का अनूठा गीत है, मुश्किल मेरी ये है कि मैं भी भाव ही समझता हूं, , पर आप सुनिये और किसी समझदार व्यक्ति जो बंगला जानता हो उससे इसका अर्थ समझ लीजियेगा, ये रचना कबीर सुमन की है जो पहले सुमन चक्रवर्ती के नाम से जाने जाते थे , कब अपना नाम बदल लिया मुझे मालूम नही,पर ये गाना उनको समर्पित जिन्हें दुनियाँ पागल समझती है !!!

पागोल साँप लूडो खेलेछे बिधातार शोंघे....{ कबीर सुमन }

4 comments:

इरफ़ान said...

पागलों के प्रति मेरा आकर्षण कभी कम नहीं हो पाएगा. मुझे हैरत होती है कि जो पोस्ट मेरे मन में पल रही होती है उसे आप जारी कर देते हैं, फिर ख़ुशी ये होती है कि इतने बरस बीत जाने पर भी हमारे आपके विचार कितने मिलते जुलते हैं!

आजकल दिल्ली का हर रास्ता प्रगति मैदान को जा रहा है. या यह कहना ठीक होगा कि हर आदमी नैनो देखना चाह रहा है. ऐसे में कल जब मैं आइटीपीओ के सामनेवाली रेडलाइट पर खडा था, एक अधेड आदमी आया. वह सडक पार कर रहा था और आइटीपीओ के सामने लगे रंग बिरंगे झंडों को देख कर ठिठक गया था. उसके पास पुरानी पतलून से सिला कपदे का एक थैला था जिसमें कपडे के दो हत्थे लगे होते हैं. थैला भरा हुआ था, उसकी चप्पलें कह रही थीं कि लंबी पैदल यात्रा करता हुआ वहाँ पहुंचा है. खिचडी बालों और एक पुराने स्वेटर से वह किसी अनथक चिंता में डूबा लगता था. उसने मुझसे आइटीपीओ की तरफ उंगली करके पूछा-"मनमोहन सिंह यहाँ रहता है?"
मैंने इनकार किया. मनमोहन सिंह का घर बताने से पहले मैंने उससे पूछा "क्या हुआ?" बोला "कुछ नहीं, यह अचार देना था." उसने थैले को हिलाते हुए कहा.

रही बात सुमन चट्टोपाध्याय (चटर्जी) की, मैंने अपने ब्लॉग की पहली पोस्ट उनकी चिंता में लिखी थी जिसके जवाब में प्रियंकर ने उनकी कुशलक्षेम भेजी थी. पिछ्ली बार जब मैं कलकत्ता गया था तो उनका तत्कालीन नया रिलीज़ टेप ख़रीदते हुए मैने शॉपकीपर से पूछा कि सुमन आजकल सुनाई नहीं देते. तो उसने बडी नफरत से बताया था कि सुमन ने सबीना यास्मीन नाम की बंग्लादेशी औरत से शादी करके धर्म भ्रष्ट कर लिया है और अब वो पतित हो गया है.

मेरा खयाल है यह बात 2000 की होगी. इन आठ बरसों में सुमन ने बंगाल की "धर्मनिरपेक्षता" को अपील करता हुआ अपना नाम कबीर बना लिया हो तो कोई आश्चर्य नहीं. मैं सुमन की संगीत यात्रा का समीपी गवाह हूं और जिस परिणति को वे प्राप्त हो रहे हैं उसे देखते हुए अशोक पांडे की भाषा में यही कहा जास सकता है कि इस देश पर टट्टी करो.

यशवंत सिंह yashwant singh said...

पता नहीं, मेरा पिछला कमेंट आप तक पहुंचा या नहीं। पर जो आप इस ब्लाग के जरिये काम कर रहे हैं, उसे जारी रखें। बेहद शानदार है। आपसे मिलने चाहूंगा। बतियाना चाहूंगा।
यशवंत

mayank said...

विमल जी क्या बात है लगता है अभी सब कुछ मारा नही है जान बाकी है वह कविता तो याद होगी

... नही कुछ सोचने और नही कुछ बोलने से आदमी मर जाता है ....

विकास कुमार said...

ज्यादा समझ तो नहीं पाया गीत को लेकिन मजा आया सुनने में. रही बात पागलपन की तो वो तो हम हैं ही!