Friday, December 31, 2010

साल मुबारक़ ......


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ज़िंदगी में पुराने का जाना और नए का आना रिले रेस की तरह नहीं, समुद्र की लहरों की तरह चलता है। लेकिन हम पुरानी लहर के भीतर बन रही नई लहर को नहीं देख पाते और खामखां परेशान हो जाते हैं।

जिंदगी इतनी छोटी है कि इसे दुश्मनी या गलत कामों में जाया करने का मुझे कोई तुक नहीं नजर आता। ||अर्थकाम।।

Saturday, December 18, 2010

आरिफ़ लोहार की जुगनी

पाक़िस्तान के आरिफ़ लोहार एक शानदार लोक गायक है, लाज़मी है उनको सबने सुना हो, और आज ठुमरी पर उनकी मंडली द्वारा गाया ये लोकगीत जिसमें थोड़ी पश्चिम की झलक है फिर भी कर्णप्रिय तो है, आज सुनने का मूड ज़्यादा है वैसे भी मेरी लिखने की आदत नहीं तो कोक स्टुडियो के इस कार्यक्रम की झलक यहां देखते हैं और सुनते है आरिफ़ लोहार की जुगनी ।


शफ़क़त अमानत अली मेरी पसन्द

आज बहुत दिनों बाद थोड़ी फ़ुरसत मिली तो सोचा कि ठुमरी पर काफ़ी दिनों से जो सन्नाटा पसरा था उसमें कुछ हरक़त लाई जाय,तो सोचा क्यौं न कोक स्टुडियो की कुछ शानदार वीडियो से आपका और अपना मनोरंजन किया जाय, तो हाज़िर हैं कुछ नायाब ग़ायकी और वीडियो के नमूने। सुना तो सबने है ठुमरी पर भी ज़माने पहले शफ़क़त साहब को सुनाया था और आज फिर से इन्हें सुने तो कोई हर्ज़ नहीं है क्यौंकि अच्छी गा़यक़ी को जितनी बार सुनें आनन्द कभी कम नहीं होता। तो सुनिये और देखिये।

मोरा संइया मोसे बोले ना




आंखों के सागर होंठों के सागर, इसे भी शफ़क़त जी ने आवाज़ दी है सुनिये और दावा है ये आवाज़ आपको मुत्तासिर कर ही देगी।