Sunday, September 16, 2012

कैरेबियन चटनी( Caribbean chutney) और भारतीय लोकगीत (Indian folk song)


सैकड़ों साल पहले हमारे देश के एक कोने से मज़दूरों के एक बड़े जत्थे को देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था ,गये तो वे मजबूरी में थे या यूँ कहें कि गये नहीं ज़बरन ले जहाज में ठेल ठेल कर ठूंस ठूंस कर अपने वतन से बेदखल कर दिया गया था ……अपने रिश्तेदारों, मित्रों, अपने-अपने साजो सामान के साथ,पर अब तो कई सौ साल गुज़र चुके हैं,उनके सीने में आज भी अपने देश की मिट्टी हरदम उन्हें अपने वतन की याद दिलाती रहती है | मैं जब भी इनके वीडियो देखता हूँ, इस दुनिया के बारे में सोचता ही रह जाता हूँ, आज भी उनका "लोक" जैसा भी है सुरक्षित है,भले ही इन सकड़ों सालों में न जाने उनका रूप किस किस तरह से बदल कर क्या हो गया ? पर आज भी उनका अपना समाज इन लोकगीतों को गाकर शायद अपनी जड़ो को सींच सींच कर बचाने की कोशिश कर रहे हों,आइये कुछ इसी दिशा में हो रहे उन प्रयासों से अपना दिल बहलाते है | एक पुराना गाना है जिसे राकेश यन्करण बड़े मज़े ले कर गा रहे हैं, अंदाज़ तो देखिये | "नज़र लागी राजा तोरे बंगले पर" फ़िल्म "मुझे जीने दो" पर यहां इस गाने को संदीप की आवाज़ में सुनिये मज़ा आयेगा| राम कैलाश यादव को हमने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कभी सुना था, आज तो हमारे बीच वे नहीं हैं,पर उनकी लोक गायकी और अंदाज़ गज़ब का था,उनकी आवाज़ में ज़रा इस लोकगीत को सुनें और बताएं कि यहां और वहां में अन्तर नज़र आता है ? एक लोकगीत (निर्गुन) का आनन्द लें |

5 comments:

स्वप्नदर्शी said...

धन्यवाद गाना सुनवाने के लिये..

सैकड़ो साल नही बस १७० साल पहले पहला जहाज कालकत्ता से गया अौर १९१८ के पास भारत से गिरमिटिया मजदूरों का जाना बन्द हुया. १९९० के बाद खासकर तकनीकी रूप से दक्ष मजदूरों की दूसरी खेप यूरोप व अमेरिका की तरफ...

चन्द्र प्रकाश दुबे said...

सबसे पहले आप को माटी से जुड़े सरोकार से ताना बाना जोड़ने के लिए हार्दिक शुभकामनायें.
अति आधुनिक दिखने और सांस्कृतिक विचलन के दौर में अपनी संस्कृति को हेय समझनेवाले लोगों के बीच इस तरह के पोस्ट गांव के पोखर से सटे बगीचे की पुरवाई हवा की तरह तिहा प्रदान करता है.

आप की कोशिश और मंशा को कोटिशः नमन....

हिंदी चिट्ठा संकलक said...

सादर आमंत्रण,
आपका ब्लॉग 'हिंदी चिट्ठा संकलक' पर नहीं है,
कृपया इसे शामिल कीजिए - http://goo.gl/7mRhq

shikha varshney said...

अच्छा लगा आपका ब्लॉग, अपनी मिटटी की खुशबू आई.

कंचनलता चतुर्वेदी said...

क्या बात है? काफी समय से कोई पोस्ट नहीं किया आपने....