न शास्त्रीय टप्पा.. न बेमतलब का गोल-गप्पा.. थोड़ी सामाजिक बयार.. थोड़ी संगीत की बहार.. आईये दोस्तो, है रंगमंच तैयार..
Monday, July 23, 2007
शर्ट उतरेगी सौरव की?
आज लार्डस टेस्ट का आखिरी दिन है, क्या आज वो सब हो पाएगा जो आम भारतीय" टीम इन्डिया" से उम्मीद करता है, सचिन और द्रविड़ तो आराम से पवेलियन में बैठ कर निश्चिन्त भाव से मैच का मज़ा लेंगे. क्या लगता आपको? या आप इन सब से बेज़ार हैं?
Saturday, July 21, 2007
चैन से सो रहा था मैं...
बड़ी अजीब बात है, अब मैं क्या बताऊं... पर बात सिर्फ़ इतनी सी भी नहीं है कि मै बार-बार क्या कहूं- क्या कहूं करता रहूं और अपनी बात भी पूरी तरह से न रख पाऊं... वैसे ये ज़रूर बता दूं कि मै एक लापरवाह और साथ- साथ आरामपसन्द व्यक्ति हूं! अब आप ना माने तो मै क्या कर सकता हूं? हां, तो बात ये है कि पहले बाबा आदम के ज़माने का एक शेर सुनिये, फिर कुछ कहने की कोशिश करता हूं, तो शेर अर्ज़ है -चैन से सो रहा था मै ओढे कफ़न मज़ार में !
यहां भी सताने आ गए किसने पता बता दिया !!
अब देखिये इस शेर को कालेज के ज़माने में, ऐसे टुच्चे जो हमारे अच्छे- खासे खेल को बिगाड़ने चला आता था उसके लिये हम ये शेर इस्तेमाल करके ठठा - ठठा के हंसा करते थे और जिसको हम सुनाया करते थे वो भी हममे शामिल हो जाता था और हम मिल्ली- उल्ली करके अपने-अपने रस्ते हो लिया करते... कुछ वही नज़ारा देख रहे हैं ब्लॉग की दुनिया में भी फैला हुआ है... कुछ बेचारे हैं वो एक दम जैसे वायरस की तरह कभी तो अच्छी बातें करके आपको लुभाने की कोशिश करेंगे और कभी तो उल्टी गंगा ही बहाने लग जायेंगे! तो आइए, ऐसे ही लोगों पर एक कथा कहने की कोशिश कर रहा हूं... ये उन पर है जो छद्म नाम से इधर-उधर हुडदंग मचाते... जिन्हें हर कहीं किसी के भी ब्लाग पर शरारत करते देखा जा सकता है और किसी ने जवाब में कुछ कह दिया तो समझिये उसका तो ये टिल्ली-बिल्ली कर-करके लिखना हराम कर दें, क्योंकि टिल्ली-बिल्ली करने के सिवा इनके पास कहने को कोई बात तो है नहीं... न करने को काम...
चिरकुट करे न चाकरी न टिल्ली लगाए दुकान!
दिन भर बोले बिल्ल-बिल्ल, हगना इसका मुकाम!
तो लीजिए ऐसे छद्म नामधारी पर एक कहानी पेश है... कथा किसी एक गांव की है.. भोर का समय था एक आदमीय या चलिये उसका एक नाम रख देते है- बेनाम- तो बेनाम महोदय हाथ में लोटा लिये खेतों- खलिहानों की तरफ चले जा रहा थे... सही जगह चुनकर किसी पेड़ के नीचे लोटा लेकर बैठ गये, अभी कुछ ही समय हुआ था कि अचानक या यूं कह लें पलक झपकते एक सांप उसके पीछे के रास्ते देह में के पेट के अन्दर घुस गया! और पेट के अन्दर घुस कर बाबू बेनाम को लगा करने परेशान... कभी पेट में इधर हो तो कभी उधर... बेनाम महोदय पसीने- पसीने... एक वैद्य के पास गये और कहानी बताई कि कैसे पलक झपकते सांप उनके अन्दर घुस गया और इस सांप की वजह से उनको बडी बेचैनी हो रही है जल्दी से निकालिये नहीं तो कहीं इसका ज़हर शरीर में फैल गया तो बडा अनर्थ हो जाएगा... खैर, वैद्यजी ने बेनाम महोदय को एक उपचार बताया कि अब जब भी दिशा मैदान जाओ तो अपने साथ एक दूध की कटोरी रखना और आप जानते ही हैं सांप को दूध पीना पसन्द है.. तो समझ लो जैसे ही सांप दूध पीने के लिये शरीर से बाहर निकले तो दबोच लीजियेगा जाइये इससे बढिया इलाज़ मेरे पास नही है!...
बहुत दिन गुज़र गये जब बेनाम महोदय के बारे में वैद्य जी को कुछ पता नही चला तो एक दिन वैद्य जी ने सोचा कि चलो हम खुद ही पता कर लें कि बेनाम महोदय का क्या हाल-चाल है. आखिर मैने जो उपचार बताया था उसने काम किया कि नहीं.. तो वैद्य जी चल दिये बेनाम महोदय के घर और जब वैद्यजी बेनाम महोदय के घर पहुंचे तो देखते क्या हैं कि बेनाम भाई बडे आराम से कमप्यूटर पर बैठे है और उनके सामने किसी का ब्लाग खुला है और कुछ किसी के ब्लाग पर टिप्पणी कर रहे थे और वैद्य जी को देख कर अचकचा गये... वैद्य जी ने अपने आने का कारण बताया और पूछा कि सांप का जो उपाय हमने आपको बताया था उससे सांप बाहर निकला कि नहीं? तो बेनाम भाई ने अज़ीब- सा चेहरा बना कर मुस्कुराते हुए बताया कि क्या बताएं वैद्य जी, आपने जो उपाय बताया था उसे मैने कई बार किया... पर होता ये कि सांप बड़ा हरामी साबित हुआ! कितनी बार तो दूध की कटोरी लेकर बैठा... हरामी तड़ देना दूध पी लेता, और इसके पहले कि उसे दबोचूं, पड़ देना पीछे के रास्ते फिर देह में वापस! बीसियों दफे कोशिश की और बीसियों ही बार फेल हुआ... तब? बैद्य जी पूछे, तो छोड़ दिये हो सांप को?... इस पर बेनाम बाबू सिर झुका लिए और लजाये-से बोले- क्या करें, सर... अब ऐसा है कि इस क्रिया को रोज़-रोज़ करके अब मज़ा आने लगा है... अब तो मै रोज़ सांप को इसीलिए दूध पिलाता हूं कि वह अंदर-बाहर हो-होके हमको मज़ा देता रहे!..
तो कुछ वही सांप वाली कहानी यहां भी घट रही है... देख रहा हूं वही बेनाम जब तक लोगॊ को कुछ बुरा भला न कह दे तो कूद फांद मचाये रहता है और कभी इस ब्लाग पर कभी उस ब्लाग को टारगेट किये रहता है तो जब तक इसके अंदर का सांप बाहर नहीं निकलेगा तब तक इसकी शरारत यहां-वहां फुदक-फुदक के चलती ही रहेगी!... तो भाई, कोई है जॊ इनके अन्दर के सांप को बाहर निकाल सके कि ये बाबू चैन से रहें... और बाकी सबकॊ भी चैन से रहने दे?...
Monday, July 16, 2007
नाक से गाने वालों को सलाम
पता नही इधर नाक से गाने वाले गायक को बार-बार विवाद में क्यों घसीटा जा रहा है, क्या नाक से इसके पहले कोई गाता ही नहीं था? नही, जबकि ऐसी बात नही है. पहला व्यक्ति कौन था ये तो शोध का विषय है, पर हिन्दी फ़िल्मी गीतों के शुरुआती दौर में चाहे नूरजहां हों या सहगल या मुकेश या पंकज मलिक या गीता दत्त हों यहां तक की लता मंगेशकर हों या आशा भोसले तक... एक तरफ़ से ये सारे नाक से ही गाना पसंद करते थे या शायद उस समय की कोई तकनीकी समस्या रही होगी... जैसी जिस भी वजह से इन्हें कुछ समय तक नाक से गाना पड गया होगा पर तब किसी ने उनके नाक पर कभी उंगली नहीं उठायी... और उठायी तो उसकी आज किसी को याद नहीं... फिर आज गायक से हीरो बने हिमेश के नाक से गाने पर इतना हो हंगामा क्यों? अब आप ही बताइये मुकेश के दर्द भरे नगमें अगर नाक से नहीं गाए जाते तो क्या हम पचा पाते? बर्मन दा, पंचम दा, गीता दत्त, भुपिंदर, मनहर उधास, जो अपनी नाक की वजह से प्रिय थे, कल्पना कीजिये ये अगर नाक छोड़ कर गाते तो कैसा लगता, फिर हिमेश पर इतना शोर क्यो? ज़रा सोचिये और बताइये…
आखिर बात क्या है जो हस्ती मिटती नहीं
सन्दर्भ फ़िल्मी-गैर फ़िल्मी गीतों को लेकर उठाना चाहता हूं. गीतों की बात निकलती है तो ५० और ६० के दशक के गीत हमारे मन-मस्तिष्क पर या यूं कहा जाय कि ज़ुबान पर आ ही जाते हैं. दिल पुकारे आ रे, आ रे, आ रे; अभी ना जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं, सुन सुन ओ ज़ालिमा प्यार हमको तुझसे हो गया, रात ने क्या-क्या ख़्वाब दिखाए- ये सब ऐसी रचनाएं हैं हमने जिन्हें याद करने की कोशिश भी नहीं की पर अनायास ही ज़बान पर जीवित हो उठते हैं, उनके बोलों से मन और मस्तिष्क गुंजायमान हो उठता हे!इनमें भी कुछ गीत ऐसे है जो सिर्फ़ और सिर्फ़ रेडियो पर ही सुनने में आनन्द आता है. पर रेडियो का आनन्द भी कुछ ऐसा है की कि इन गानों की सीडी भी अपने पास रखें तो भी रेडियो का जो आनन्द है उसका वह विकल्प नहीं बन पाता. ज़रा अजीब बात है... नहीं? साथ ही यह देखना भी मज़ेदार है कि ५०-५० साल पुराने गाने हमारे मन व होंठों पर बार-बार जिस तरह लौटते रहते हैं वही बात नये गानों के साथ नही होती. ऐसा क्यों है. क्या ये दिक्कत सिर्फ़ मेरे साथ ही है? क्या समझा जाय कि हम अतीतजीवी हो गये है या कुछ और बात है? ऐसा कैसे हो गया?
Sunday, July 15, 2007
हैं कहां जितू भइया?
अच्छा हुआ मैंने मुम्बई-दिल्ली का टिकट नहीं बनवाया. बनवाया होता तब तो अच्छा बेवक़ूफ़ बनते! इतने महीनों से सुन रहे थे कि जतिन्दर चौधरी दिल्ली पहुंच रहे हैं. बता-बता के हमारा हाज़मा बिगाड़ा हुआ था. हर चौथे दिन सबको ख़बरदार करते रहते थे कि दिल्ली पहुंच रहा हूं, ई-मेल से तुम भी अपने आने की ख़बर कंर्फ़म कर दो. और हुआ ये कि सब दिल्ली पहुंच गए और सबको दिल्ली बुलानेवाले का ही पता नहीं? ये कोई बात हुई! आखिर जतिन्दर भइया दिल्ली पहुंचे क्यों नहीं? क्या उनको डर था कि उनकी फार्चुनर पर कोई खरोँच के अपना नाम लिख देगा? कि कहीं कानपुर में ज्यादा खाने से पेट खराब तो नहीं हो गया? कमाल दसहरी का था कि चौसे का? या हो सकता है इसके पीछे हाथ लंगड़े का हो. इस मौसम में लंगड़ा खाना वैसे भी ख़तरे से खाली नहीं. या ऐसा तो नहीं कि फार्चुनर का कागज़-पत्तर सही नहीं था और आपको बाघा बॉर्डर पे रोक लिया गया? भइया, कहीं आप अभी तलक बाघा बार्डर पे तो अटके हुए नहीं? एनडीटीवी में किसी को ख़बर कर दिये होते तो आज ये दुख का दिन नहीं देखना पड़ता. वैसे चलिए, कोशिश कीजिएगा कि बाघा में ही एक छोटी सी ब्लॉगर मीटिंग कै डालिए! कि कहीं ऐसा तो नहीं सबको दिल्ली पहुंचाते-पहुंचाते, रास्ता दिखाते आप खुदे दिल्ली का रास्ता भूल गए और दिल्ली आते-आते दिल्ली से आगे निकल गए? कहां पहुंचे हैं जितु भइया? जहां भी पहुंचे हैं जल्दी से ख़बर भिजवाइए क्योंकि हम आपसे सिर्फ़ एक ई-मेल की ही दूरी पे हैं. कि कहीं आपकी फॉर्चुनर कोई मार तो नहीं दिहिस! हमको तो इसीका बड़ा डर लग रहा है!
Saturday, July 14, 2007
छन्नूलाल मिश्र को सुनने का मतलब
आवाज़, मिठास, कर्णप्रियता... और सबसे बड़ी जो बात है वो ये कि स्पीकर के सभी रंध्रों से वह आवाज़ निकलती है. वाह, वाह! ऐसा संगीत कि सुनकर हय, दिल बाग़-बाग़ हो जाए... जिसे सुनकर स्वर की वह उठान, वह तरावट याद रहे.. और देर तक मन में धीमे-धीमे बजता रहे. बजते समय ही नहीं... बंद हो चुकने के बाद भी वह संगीत जज़्ब दीवारों से छन-छनकर हवा में फैली रहती है... मन को नहलाती रहती है. आपने सुना है कि नहीं? ऐसा कैसे हो सकता है कि इतना सुनते रहते हैं और छन्नूलाल मिश्र को अब तक नहीं सुने? तकनीकी जानकारी हमारी कम है नहीं तो अभी ही आपको अपने ब्लॉग की मार्फ़त सुनवा देते. ख़ैर, बाद में फिर कभी... तब तक आप अपनी तरफ़ से बतायें अच्छा और सुनने को क्या-क्या है...
याद रखना ज़रूरी है
क्या ग़ुलाम अली को हम भूल रहे हैं? क्या यह भूलना सही है? इस तरह आख़िर हम क्या-क्या भूलते रहेंगे? मेंहदी हसन को भी इतिहास बना दिया है. जगजीत सिंह को रहने दीजिए, हालत तो यह हो गई है कि अब सुनने को सिर्फ़ हिमेश रेशमिया बचे हैं. क्या यह अच्छा है? क्या आनेवाले समय में हम सिर्फ़ रेशमिया जैसे लोगों को ही सुनते रहेंगे? क्या यह हमारे कानों और हमारी आत्माओं के हित में होगा? आप क्या सोचते हैं? और नहीं सोचते हैं तो सोचना शुरू कर दीजिए. संस्कृति का सवाल है आपको सोचना चाहिए. जब सब खत्म हो जाएगा तब सोचना शुरू कीजिएगा? अजीब आदमी हैं!
Subscribe to:
Comments (Atom)
आज की पीढ़ी के अभिनेताओं को हिन्दी बारहखड़ी को समझना और याद रखना बहुत जरुरी है.|
पिछले दिनों नई उम्र के बच्चों के साथ Ambrosia theatre group की ऐक्टिंग की पाठशाला में ये समझ में आया कि आज की पीढ़ी के साथ भाषाई तौर प...