Saturday, May 22, 2010

ग्रामोफोनीय रिकोर्ड के कबाड़खाने से कुछ रचनाएँ

बात बहुत पुरानी है, इतिहास में  झांकियेगा तब पता चल  ही जाएगा...   समझिये ग्रामोफ़ोन भारत में आया ही था, उस ज़माने में कितनों के पास ग्रामोफ़ोन रहा होगा ? सन १९०० के आस पास की बात है,  उस ज़माने में महिलाओं का घर से बाहर निकलाना कितना मुश्किल होता होगा, उस समय और शहरों की तो नहीं जानता पर  इलाहाबाद, बनारस, आगरा, लखनऊ की तवायफ़ें ही बड़े नवाब और धन पशुओं और संगीत के मुरीदों का मनबहलाव करती थीं, ग्रामोफ़ोन जब भारत में आया तो उसकी रिकार्डिग तब कलकत्ते में हुआ करती थी, १९०२ के आस पास की कुछ रिकार्डिग तो आज भी महफ़ूज़ हैं और १९०६ के आस पास जानकी बाई और दूसरी गायिकाओं भी आज मौजूद है, हाँ  स्तरीयता की दृष्टि   से तो कुछ कह  नहीं सकते पर ऐतिहासिक दृष्टि  से उनको सुनना महत्वपूर्ण है,जानकी बाई, गौहर जान, मलका  जान ऐसी बहुत सी गायिकाएं थी जिनकी रिकार्डिंग उस समय हुई थी, जानकी बाई (1875-1934)के चाहने वाले उन्हें "बुलबुल" उर्फ  "छप्पन छुरी" भी बुलाते थे, कहते हैं एक चाहने  वाले   ने जानकी बाई पर  56 बार चाकू से हमला कर घायल कर दिया था तभी से उनको लोग "छप्पन छुरी" के नाम से पुकारते थे, जानकी बाई के बारे में  बहुत कम जानकारी उपलब्ध है बस इतना कि  १९०० के आस पास जानकी बाई अपनी गा़यकी की वजह से बहुत प्रसिद्ध हो चुकी थी,  दादरा, ठुमरी, गजल, भजन ही नहीं बल्कि  बल्कि एक शास्त्रीय गायिक़ा के रूप में उस ज़माने में प्रसिद्धि मिल चुकी थी, १९०२से १९०८  के आस पास की रिकार्डिंग जो मिलती है उनमें जानकी बाई का नाम आता है और कहते हैं उनके   क्रेडिट में  लगभग 150  रिकॉर्ड है.उस ज़माने में एक दिन की रिकार्डिंग का जानकी बाई ३००० रुपये लेती थीं,इससे ही ये अंदाज़ा लगता है कि जानकी बाई की शख्सियत  कैसी रही होगी, आज उन्ही   ग्रामोफोन रिकार्ड के कबाड़खाने से कुछ रचनाएं आपको समर्पित हैं | कुछ ग़लती हो गई हो तो क्षमा करेंगे |


रसीली तोरी अंखियाँ........ जानकी बाई की आवाज़ 

  
जानकी बाई की आवाज़ में इस रचना कों भी सुनें |



मलका जान की आवाज़ में ये रचना |








Tuesday, May 18, 2010

एक अफ़गानी की आवाज़ में ....जब दिल ही टूट गया

आज आपका परिचय कराता हूँ एक अफ़गानी ग़ायक  सादिक़ फ़ितरत (NASHENAS)से जो कंधार में पैदा हुए लेकिन काबुल में अपने जीवन में सबसे ज़्यादा रहे । वैसे NASHENAS अफगानिस्तानी भाषाओं, दरी और पश्तो और साथ ही उर्दू में दोनों में
गाते हैं . ।
1970 के शुरुआती दशक में सोवियत संघ में NASHENAS मॉस्को के  एक विश्वविद्यालय से पश्तो साहित्य में डॉक्टर की उपाधि से सम्मानित भी हुए।
NASHENAS अफगानिस्तान और पाकिस्तान दोनो देशों में बहुत लोकप्रिय हैं, विशेष रूप से क्वेटा और अफ़गान  और पश्तो भाषी क्षेत्रों में में तो काफ़ी लोकप्रिय हैं । भारत से बाहर रहकर भी NASHENAS सहगल और मन्ना डे के गाये गीतों को खूब दिल से गाते है। सादिक़ साहब पर सहगल का असर बहुत दिखता है और खूब गज़ब  गाते भी हैं,  आज ये पोस्ट सादिक़ फ़ितरत NASHENAS को नज़र करते हैं,नशेनस तो  मैं अंग्रेज़ी में लिख रहा हूँ ..पर नाम कों लेकर   भ्रम अभी भी बना हुआ है , नशेनाज़ लिखूं या नशेनस या नशेनास पता नहीं मालूम नहीं  ...फिर भी आप सुनियेगा तो सहगल साहब की याद तो ताज़ा हो ही जाएगी | कुछ और अच्छी तरह सुनने के लिए यहाँ  क्लिक करें |




ऐ मेरी जोहरा जबीं

तुम बिल्कुल हम जैसे निकले - फ़हमिदा रियाज़

तुम बिल्कुल हम जैसे निकले अब तक कहां छुपे थे भाई? वह मूरखता, वह घामड़पन जिसमें हमने सदी गंवाई आखिर पहुंची द्वार तुम्हारे अरे बधाई, बहुत ब...