Saturday, November 14, 2009

नन्हें मुन्हें बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है ?



कल तक जिन गीतों को मेरे पिता गुनगुनाते थे उनके बाद उन गीतों को हमने भी गाया गुनगुनाया .... अब हमारे बाद आने वाली पीढ़ी भी उन्हें गुनगुना और गा रही है,जब भी इन गीतों को पहले पहल गाया या सुना गया होगा सोचिये कैसा लगा  होगा...आज गीत वही है समय और समाज बदल गया है,और गीतों के अर्थ भी बदल गये हैं,हम बाल दिवस मनाते हैं.... सरकार डाक टिकट छापती है....कुछ समारोह हो जाते है आज के दिन, पर बच्चों का बचपन और उनकी हंसी थोड़ी जुदा होती जा रही है..बच्चा का समय से पहले बडा़ होते जाना ...बच्चों के भारी बस्ते अभी भी भारी है....बच्चों की एक बड़ी आबादी आज भी होटलों,स्टेशनों,अनाथालयों और सड़को पर ठोकरें खाती फिर रही है..क्या उन्हें पता है हमारे यहां बच्चों से सम्बन्धित योजनाएं सिर्फ़ कागज़ पर ही बन कर रह जाती है.....खैर लिखने को तो बहुत कुछ है पर इन सदाबहार गीतों को सुनिये और सोचिये हम कैसे हो गये हैं.....नन्हें मुन्हें बच्चों की  मुट्ठी में आज सचमुच क्या है....... .सब सपना हो गया है..क्या?




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