Monday, December 31, 2007

जैसा मेरा गुज़रे, वैसा ही आपका भी गुज़रे॥ नया साल !!

नया साल मुबारक !!! जैसा मेरा गुज़रे वैसा ही आपका गुज़रे!! क्यो क्या सही नहीं है? क्यों भला? इस तरह के शुभकामनाओं से कुछ अच्छा संदेश नहीं जाता !! पर मैंने कहा लेकिन इसमें किसी को एतराज क्यों है, हर कोई एक दूसरे की मंगल कामना करते नज़र आ रहे है तो उनकी ही बात मैं कुछ अलग अंदाज़ से कहने की कोशिश कर रहा था अगर आपको अटपटा लगा तो वापस लेता हूं, खैर ये सब तो मैं ऐसे ही छोड़ रहा था, फिर भी मेरे कहने से आपका अगला साल मंगलमय हो सकता है तो मेरी भी बलैया ले लिजिये, हो सकता है आपका बिगड़ा काम बन जाय ।



ठुमरी पर आने जाने वाले हीत- मीत को ......... नव वर्ष की शुभकामनाएं ! ! !

दो पसन्दीदा गीत है मेरे, आज सुनियेगा दोनो किशोरदा ने गायें हैं, सुनने के बाद प्रतिक्रिया अवश्य दें

पहला गीत "आ चल के तुझे .........


और ये गीत सवेरे का सूरज तुम्हारे लिये है..

Sunday, December 30, 2007

एक ठुमरी........बाजुबंद खुल खुल जाय !!!

तो ये साल भी जाने को है, इस साल ये तो ज़रूर हुआ है कि बहुत से खट्टे मीठे अनुभव दे गया, कुछ को मैं हमेशा याद रखूंगा तो कुछ को हमेशा हमेशा के लिये रिसाइकिल बीन में डाल दूंगा,सबसे सुखद एहसास तो ये है कि अपने बहुत से मित्र ब्लॉग से जुड़कर उनकी ज़िन्दगी और समाज से जुड़े आड़े तिरछे,उल्टे पुल्टे,अच्छी बुरे विचार पढने का मौका मिला, जो कम से कम कम दिल से निकले उद्दगार ही थे जो अच्छे लगे,और बहुत से ऐसे भी ब्लॉग देखने को मिले जिससे ब्लॉग का चरित्र भी समझ में नही आ रहा था,मेरे लिये ब्लॉग पढना सिर्फ़ पढना ही नहीं बल्कि ये कहना ज़्यादा उचित होगा कि मेरे लिये ब्लॉग मानसिक आहार हैं,मन मुताबिक खुराक ना मिलने की स्थिति मे तो अपने ऊपर ही खीज होने लगती है,कुछ से अच्छी अत्मीयता मिली,जो मेरे लिये नितांत नया अनुभव है, जिनको मैं नही जानता और उनसे आत्मीय सम्बन्ध का बनना दिल के किसी कोने में लम्बे समय तक मीठी याद की तरह बने रहेंगे,

प्रमोद इरफ़ान,अनिल,अभय का शुक्रिया कि उनकी वजह से चिट्ठाजगत,नारद, ब्लॉगवाणी से जुड़ने का मौका मिला , सबके ब्लॉग पर जाकर उनके विचार पढ़ना और उनपर टिप्पणी करना और अपने भी टिप्पणी को छ्पे हुए देखना अद्भुत लगता था, , , मेरे लिये तो साल की उपलब्धि अगर कहा जाय तो तो ब्लॉग से जुड़ना ही है,बहुत सारे ब्लॉग जो मेरे ज़िन्दगी के हिस्सा बन गये हैं उन्हें सलाम !!

अज़दक का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं जिसने मुझे ठेल ठेल कर लिखने को प्रेरित किया और प्रतिक्रिया स्वरूप ठुमरी का जन्म हुआ !!! और बाते बाद में!

कुछ सुनाना चाहता हूं,प्यार से सुनिये

तो आज मेरी पसन्द की ठुमरी आपके सामने है सुनिये और आनन्द लीजिये !!!

आज जो आपको सुना रहा हूं बाजुबन्द खुल खुल जाय जिसे कभी बड़े गुलाम अली खान साहब ने सबसे पहले गाया था वैसे जितने भी शास्त्रीय गायक हैं वो इसे गा चुके है पर आज आपके सामने है आबिदा परवीन


और यही ठुमरी कुछ अलग ढंग से जगजीत सिंह ने भी गायी है उसे भी सुनें

Saturday, December 22, 2007

हीर सुनने का मन है?

भाई लोक संगीत को आज भी बजते देख यही लगता है कि भाई ये समाज जैसा भी है पर अपनी पुरानी चीज़ों को आज भी सम्हाले हुए है,आज मैं बहुत ज़्यादा लिखने के मूड में वैसे हूं नहीं, कुछ दर्द है जो आगे कभी मौका मिला तो बाटुंगा, पर एक बात ज़रूर हुई है इन दिनों कि कुछ हीर सुनने को मिली थी और मुझे लगा कि ठुमरी पर कुछ ना कुछ तो मैं सुनाता ही हूं तो क्यों ना आज हीर सुनी जाय, पहले वाली हीर में पहली आवाज़ मो. रफ़ी साहब की है और उसी में गुलाम अली साहब की एक गज़ल जो हीर की तर्ज़ पर ही गायी गई है शामिल है,और दूसरी मेहदी साहब की गाई हीर है तो तीसरी है गुलाम अली साहब की गायी हीर, और आखिर मे असा सिह मस्ताना की डोली चढ़ दे... तो आप भी इस दर्द भरे हीर को सुनिये और जिन्हें हीर के बारे में जानना है वो यहां देख सकते है


यहां प्लेयर के बांयी ओर दो बार क्लिक करके सुना जा सकता है।





Saturday, December 15, 2007

एक संवाद !!!

एक कमरा छोटा सा !

अन्दर कमरे में एक विद्यार्थी किताब बांच रहा है !

एक और बालक है जो बैठा बैठा भावशून्य है ! दिन का समय है !

देखकर लग रहा है कि हॉस्टल से कब के निकल चुके हैं दोनों !

अब भविष्य की किसी बड़ी तैयारी में लगे है !

तभी दोनों की तंद्रा टूटती है !

सामने एक आदमी ज़ोर ज़ोर से चिल्ला कर बोलने लगा !

सुन लो तुम दोनों, दो साल से तुम लोग से किराया बढाने को कह रहा हूं !

और तुम इस बात को गम्भीरता से ले नही रहे !

अब ये समझ लो ये महीना तुम्हारे लिये आखिरी है!

बिना बढा किराया दिये तुमको मै रहने नही दूंगा !

थोड़ी देर तक कमरे में सन्नाटा फिर

एक आवाज़ उभरती है !

सुनो मेरे बाप से बोलो कि वो तुम्हारा ही नही

मेरा भी पैसा !

यहां किताब के लिये तो पैसे हैं नहीं

इनको भी चाहिये !

सुनो अब दुबारा मत आना पैसे मांगने

क्योकि अगर रिज़ल्ट सही नही आया

तो हम तुम्हारा रिज़्ल्ट तो निकाल ही !

मालिक मकान अभी आंखे दिखा ही रहा था

कि एक विद्यार्थी कमरे से निकला !

उसके एक हाथ में एक चाकू था

और दूसरे हाथ में कलम

ज़ोर से बोला !

दोनो में से तुम क्या चाहते हो बोलो

मलिक मकान तेज़ी देख सकपका गया

उसने कलम की तरफ़ इशारा किया

और कहा कलम !

और तेज़ी से बाहर की तरफ़ जाने लगा

जाते जाते उसने कहा

हम समझ गये तुम क्या चाहते हो !

और वहां से चलता बना

दोनो लड़के मुस्कुराये !

और एक ने कहा

जो शब्द नही कर पाये

उसे हथियार ने कर दिया

शब्द हथियार कब बनेंगे !!!

उस्ताद राशिद खान को सुनते हुए !!

उस्ताद राशिद खान को तो आपने सुना ही होगा, अभी पारुल ने उनका गायन अपने ब्लॉग पर लगाया भी था जो आपको पसन्द भी आया होगा, राशिद खान को जब सुना तो वाकई उनके गायन शैली मुझे तो बहुत पसन्द आई, वैसे बहुतों को हमने लाईव सुना है,पर पसन्द तभी आता है जब उस आवाज़ को अपने भीतर भी गुनगुनाते हुए सुना जा सके, राशिद जी की यही खासियत है
आज भी आपको राशिद साहब की वो रचनाएं सुनने को मिलेंगी जिसे सुनने बाद भी कम से कम बोल तो आपकी जुबान पर होंगे ही.

शास्त्रीय संगीत के बारे में आम धारणा बन गई है कि बड़ा बोझिल होता है, झेल होता है, अरे इस पर तो एक चुट्कुला भी आम है कि एक जगह बढिया संगीत का जलसा हो रहा था एक शास्त्रीय गायक अपनी तान छेड़े हुआ था,

जिस सुर में वो गायक गा रहा था वो करूण रस ही था शायद ,तभी एक व्यक्ति ने देखा कि उसके बगल वाला व्यक्ति रो रहा है उसकी आंख से आंसू धीरे धिरे झर रहे हैं, उसे आश्चर्य हुआ क्योकि

वो अपने आपको शास्त्रीय संगीत का बड़ा मर्मग्य समझ कर ही रस ले रहा था उसे इस बात पर आश्चर्य हो रहा था जिन सुरों को वो समझता है पर उसके दिल में उस तरह तो नहीं उतर रही पर ये व्यक्ति गायक की तान पर आंसू बहा रहा है, ज़रूर कोई बड़ा पंडित है कोतुहल वश पूछ बैठा ' लगता है गायक के सुर ने आपके मर्म को छू लिया है आप शास्त्रीयता में वैसे ही इतने गहरे धंसे हुए च्यक्तित्व लगते है क्या मुझे भी समझाएंगे किस बात पर आपके आंसू निकल रहे है' तो सामने वाले व्यक्ति ने कहा कि 'वो बात नही है जहां मै बैठा हूं वहां पैर हिलाने की जगह नही है पैर की तकलीफ़ बढ गई है इसी से रोना आ रहा है', पर यहां मेरी मंशा रुलाने की कतई नही है

आज आप सुनिये राशिद खान की आवाज़ का जादू, आपको सुनाउं इसका मौका आज जाकर मिला है !!

पहला गीत फ़िल्म जब वी मेट से है !




ये दूसरी रचना नैना पिया से है



और ये तो आप सुन ही ले फिर बात करें

Monday, December 10, 2007

बंद हैं तो और भी खोजेंगे हम,रास्ते हैं कम नहीं तादाद में !!


ये गीत आपको नज़र कर रहा हूं,इसे सम्भवत: लिखा था देवेन्द्र कुमार आर्य ने और इस गीत की धुन भी अच्छी बन पड़ी थी, संगीत और कोरस के साथ गाने का मज़ा ही कुछ और था,इसे लम्बे समय तक दस्ता इलाहाबाद के साथी गाते रहे थे,हमारे लोकप्रिय गीतों मे ये गीत भी शामिल था, पता नहीं और कहां लोग इसे गाते हैं, गीत करीब बीस साल पुराना है, अब ही पढ़ कर बताएं कि ये गीत कितना प्रासांगिक है,विनीता और अंकुर की वजह से ये गीत मुझे मिल पाया जिसकी तलाश मुझे काफ़ी दिनो से थी !!

इधर इरफ़ान ने भी इलाहाबाद को कुछ अलग ढंग से याद किया है उसे भी देख सकते हैं !! तो पेश है ये लोकप्रिय गीत !!


बंद है तो और भी खोजेंगे हम

रास्ते हैं कम नही तादाद में-२

आग हो दिल में अगर मिल जायेगा
हस्तरेखाओं में खोया रास्ता
बंद है तो और भी खोजेंगे हम
रास्ते हैं कम नही तादाद में-२

मुठ्ठियों की शक्ल में उठने लगे
हाथ जो उठते थे कल फरीयाद में
पहले तो चिनगारियां दिखती थी अब
हर तरफ़ है आग का इक सिलसिला


बंद है तो और भी खोजेंगे हम
रास्ते हैं कम नही तादाद में-२


टूटती टकराहटों के बीच से
इक अकेली गूंज है ये ज़िन्दगी
ज़िन्दगी है आग फूलों में छिपी
ज़िन्दगी है सांस मिट्टी में दबी

बन्द हैं तो और भी खोजेंगे हम
रास्ते हैं कम नहीं तादाद में

बनके खुशबू फूल की महकेंगे वे
जो किरण बन मिल गये हैं खाक में
बंद है तो और भी खोजेंगे हम
रास्ते हैं कम नही तादाद में

Friday, November 30, 2007

पल भर की पहचान !!

अभी जुमा जुमा कुछ ही दिन हुए हैं, आई आई टी के एक कमरे में हमारी मुलाकात हुई थी, मैं बात कर रहा हूं,उस यादगार शाम की जब थॊड़े से चिट्ठाकारों का मिलन हुआ था, मिलना सुखद था, अनीता जी और अभय ने इस पर विस्तार से लिखा है, मैं भी लिखने की सोच रहा था, पर ना मैं अभय की तरह लिख सकता हूं, और ना अनीताजी की तरह, तो लिखने की योजना मैने टाल दी, पर कुछ बात जो मेरे मन मे आईं उस मिलन के बाद उसे लिखने की कोशिश कर रहा हूं

बचपन में पेनफ़्रेन्डशिप का शौक था, हालांकि इसमें भी उतना नही धंसे जितना ब्लॉग में धंस चुके हैं,लेकिन उन पेनफ़्रेन्डशिप के ज़माने में किसी मगज़ीन में ऐसे पते नोट करने का शौक ज़रूर था जिनकी उम्र और शौक मुझसे मिलते जुलते थे, पर कभी ऐसे सम्बन्ध बन नही पाये उसकी कोई याद भी बची नहीं है, मै दूसरी बार किसी ब्लॉगर मीट का हिस्सा बना, कौतुहल तो था अनजान लोगों को जानने का, यहां अनजान शब्द थोड़ा ठीक नहीं लग रहा क्योकि हम तो उनके विचार उनके ब्लॉग को पढ़ कर जान ही लेते हैं,फिर भी जिनसे कभी नही मिला उनसे मुलाकात और उनके मुंह से अपना नाम सुनना या सबके प्रति उनकी आत्मीयता देखकर मन प्रसन्न तो होता ही है,

उन तमाम लोगों को जो ठुमरी पर आते हैं, अपनी टिप्पणियां देते है,शुभकामनाएं देते हैं ,सुझाव आदि देते हैं जिनसे मै कभी मिला भी नहीं और उन सबकी ऐसी अत्मीयता का मैं कायल हूं, उन सभी के लिये मन्ना डे का ये गीत समर्पित करना चाहता हूं, पर गीत सुनने से पहले मुझे फ़िराक साहब का ये शेर याद आ रहा है....

पाल ले एक रोग नादां

ज़िन्दगी के वास्ते

सिर्फ़ सेहत के सहारे

ज़िन्दगी कटती नहीं

उस पल को याद करते हुए ये मन्ना दा का गीत पेश है किसने लिखा और किसने दिया संगीत ये मैं जानता नहीं पर ये अवश्य जानता हूं कि ये दोनो गीत सभी चिट्ठाकारों को समर्पित है सुने और आनन्द लें ।


पहला गीत है पल भर की पहचान .......

और दूसरा गीत ये आवारा रातें दोनो गीत मन्ना दा ने गाये हैं।

Thursday, November 29, 2007

गज़ल और भजन के बीच गजन !!!

अनूप जलोटा साहब का नाम लिया जाता है तो भजनों की वजह से याद किया जाता है ,उन्होने तब भजन को उंचाई पर पहुंचाया जब गज़ल गाने वालों ने भी अपनी जगह बना ली थी, मतबल ये कि मेंहदी हसन, गुलाम अली,इकबाल बानो, फ़रीदा खानम,पंकज उधास,राजकुमार रिज़वी, रुना लैला,चन्दन दास.घन्श्याम वास्वानी,सतीश बब्बर आदि सभी कुछ ना कुछ गा रहे थे,

भजन गाने वालों में लता दीदी, मुकेश का सुन्दर कांड,हरिओम शरण ,ऐसे बहुत से नाम सुनाई दे रहे थे, पर जहांतक बात आती है अनूप जलोटा साहब की तो वो दौर ऐसा था जब अनूप जलोटा छाये हुए थे, मईया मोरी मैं नहीं माखन खायो, रंग दे चुनरिया,मैली चादर ओढ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊं, ऐसी लागी अगन मीरा हो गई मगन,क्या मंदिर और क्या घर और क्या गली गली चौराहे चौराहे तक खूब बजा करते थे ,


जब उन्होने उन्होंने देखा कि लोग गज़ल भी सुन रहे है तो उन्होने कुछ समय गज़ल भी गाया , आज मैं अनूप जलोटा ने जो गज़ल गायीं थीं उनका ज़िक्र करना चाहता हूं, उन्होंने कुछ बढिया गज़लें भी गाई थीं जिनमें ;चांद अंगड़ाइयां ले रहा है, तुम्हारे शहर का मौसम, और भी गज़लें थीं पर अभी याद नही आ रहा पर इतना ज़रूर था कि अनूप जी ने जो भी गज़ल गाया उसकी स्टाइल भजन जैसी ही होती थी,उसमे उन्होंने एक शैली भी बना थी जो वो भजन गाते समय भी उस शैली का इस्तेमाल बखूबी किया करते थे.... वही एक लम्बी तान लेते कि जनता अगर ताली ना बजाए तो वो रूकते ही नहीं थे, अगर आप उन्हे सुनते तो आपको लगता कि आप गज़ल नहीं भजन सुन रहे हैं, तो उस समय लोग अनूप जलोटा की गज़लों को गजन कहा करते थे।

तो आज मै आपको अनूप जलोटा ने जो गजन गाये है उसे सुनवा रहा हूं, और साथ साथ भजन भी सुनिये जो आज भी मंदिरों में सुने जा सकते।

तो पहले सुनिये अनूपजी द्वारा गाया भजन ऐसी लागी अगन मीरा हो गई मगन



और अब आप सुने वो गजन जिसे अनूप जी खूब गाया करते थे । तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे...



और इस गजन को भी सुन ही लीजिये.. आंखों से पी..

Wednesday, November 28, 2007

दोस्तों को समर्पित एक ब्रेख्त का गीत !!

आज ब्रेख्त का एक गीत आपको समर्पित करना चाहता हूं । इलाहाबाद में प्रवास के दिनो में हम(प्रमोद, अनिल,उदय और बाद में अभय भी) बड़ी तबियत से गाया करते थे, इन गीतों को कोरस के साथ सुनने का मज़ा कुछ और ही है, खैर गीत तो अनगिनत हैं,
पर अच्छे गीत कुछ ही हैं जिन्हें मै लिखने की कोशिश कर रहा हूं, याददाश्त के सहारे लिख रहा हूं, अगर किसी तरह की भूल हो तो तो आप मदद कर सकते है, अभय के कहने पर इसे अपने ब्लॉग पर चढा रहा हूं ।

गर आपकी प्लेट खाली है तो सोचना होगा

कि खाना कैसे खाओगे

गर आपका तसला खाली है तो सोचना होगा

कि खाना कैसे खाओगे

ये आप पर है कि पलट दो सरकार को उल्टी

जब तक कि खाली प्लेट नहीं भरती

अपनी मदद आप करो

किसी का इंतज़ार ना करो
यदि काम नहीं है और आप हों गरीब

तो खाना कैसे होगा ये आप पर है

सरकार आपकी हो ये आप पर है

(पलट दो सर नीचे और टांगे ऊपर)

ये आप पर है कि पलट दो सरकार को उल्टी

तुम पर हंसते हैं कहते हैं तुम गरीब हो

वक्त मत गंवाओ अपने आपको बढ़ाओ

योजना को अमलीजामा पहनाने के लिये

गरीब गुरबां को अपने साथ लाओ

ध्यान रहे कि काम होता रहे- होता रहे- होता रहे

जल्दी ही समय आयेगा जब वो बोलेंगे

कमज़ोर के आस पास हंसी मंडरायेगी हंसी मंडरायेगी

गर आपकी प्लेट खाली है तो सोचना होगा कि खाना

कैसे खाओगे गर आपका तसला खाली है तो ................. !!!!!!!!!

Sunday, November 25, 2007

जैसे सूरज की गर्मी से...... सुनिये भजन शर्मा बंधुओं का गाया !!

जब अज़दक ने मेरे जन्म दिन को सार्वजनिक कर ही दिया है तो अब बताने में कोई हर्ज़ नहीं है कि अब तो कुछ ही साल में पचासवां बसन्त भी आप लोग की दया से देख ही लूंगा, पर ज़रूर है कि मन बड़ा संयासी हुआ जा रहा है, मन तो कही रम ही नहीं रहा है, जन्म दिन भी ऐसा कि आकर चला गया एक दिन और कम हो गया इस बहुमूल्य ज़िन्दगी से, और अपने जन्म दिन के मौके पर देख रहा हूं कि बहुतों की फ़रमाइश आई कि कुछ गाना वाना हो जाय तो आज आपको एक भजन सुनाना चाहता हूं, सुनिये कम से कम इस भजन की धुन तो ऐसी है कि आपके अंदर एक नये ऊर्जा का संचार तो ज़रूर महसूस होगा और आपकी उम्र भी थोड़ी बढ जायेगी.

तो सुनिये शर्मा बंधुओं द्वारा गाया ये भजन जैसे शैलेन्द्र सिंह बॉबी फ़िल्म का गाना गा कर अमर हो गये, कब्बन मिर्ज़ा भी ख़ुदा ख़ैर करे गा कर अमर हो गये और भी बहुत से नाम है, वैसे नाम वाम में क्या रखा है, सुनिये इस भजन को, इस भजन की तासीर ही कुछ ऐसी है कि बार बार सुनने का मन तो करेगा ही.. और भी याद रहेगा कि किसी के जन्मदिन पर क्या सुनने को मिला था.!!!!

Friday, November 16, 2007

भुपेन हज़ारिका और उनके जनोन्मुखी गीत !!!!

बात ८० के दशक की है , तब मैं आज़मगढ़ था, बम्बई जाने के लिये बनारस से ट्रेन पकड़नी थी, हमारे नाटक का प्रदर्शन मुम्बई में होना था, क्योकि बनारस से हमें महानगरी ट्रेन पकड़नी थीतो बनारस में थोड़ा दिन का समय गुज़ारना था, हमारी संस्था के भौमिकदा के जानने वाले किसी के घर हम लोग ठहरे थे मैं किसी को जानता भी नही था, बाहर के कमरे में मैं आराम कर रहा था कि अचानक एक मधुर आवाज़ ने मेरी तंद्रा को तोड़ दी, दूर से मेरे कान में एक आवाज़ के साथ कोरस भी सुनाई दे रहा था , गीत बंगला में था, पता करने पर पता चला कि जिस आवाज़ से मै इतना अभिभूत हूं वो आवाज़ तो रुमागुहा ठाकुरता की है और उनके बारे मे इतना कि वो गायक किशोर कुमार की पहली पत्नी थीं और अमित कुमार की मां....गीत था विस्तिर्ण नदो पारे अशंख मानुशे हाहाकार सुनी ओ गोंगा तुमी बोये छे केनो....पता चला कि कैल्कटा यूथ क्वायर नाम से ये कैसेट बाज़ार में उपलब्ध है, पर हम तो इस कैसेट को बनारस में तलाशते रहे बाद में मुम्बई और इलाहाबाद पर कही मिला नही,पर इसी बहाने भुपेन हज़ारिका को सुना, सुमन चटर्जी को सुना नोचिकेता को सुना ।

रुमागुहा की आवाज़ और उस गाने की धुन आज भी मै अपने अंदर बजता महसूस करता हूं, हां ये बात भी है कि कोलकाता से मेरे एक मित्र ने इस कैसेट को उपलब्ध कराया पर कुछ दिनो बाद कोई मित्र उस कैसेट को सुनने के लिये क्या ले गये आज तक वापस भी मिला , पर कसेट की वजह से पता चल पाया कि जिस गीत को इतना सुनने के लिये आतुर था उस गीत को भुपेन हज़ारिका का लिखा हुआ है और धीरे धीरे भूपेन दा को सुनने लगा , बाद में सुमन चट्टोपाध्याय का सुमनेर गान सुना और आनन्द आया ।

आज कुछ जीवनोन्मुखी गीतों के बारे में मै सोच रहा था कि आखिर हिन्दी में इस तरह के गीतों पर विशेष कुछ क्यों नहीं हो पाया जबकि बंगाल और आसाम आदि इलाकों में लोग पता नही कब से गा रहे हैं, वैसे अब आज के दौर में वाकई और कौन लोग गा रहे हैं ऐसे गीत, मुझे मालूम तो नही है, पर एक ज़माने में भुपेन हज़ारिका ने इस तरह के जन गीत खूब गाये है और लोगों ने उन्हें खूब सराहा भी पिछ्ले दिनो यूनुस जी ने भी भुपेन दा के गीत सुनाए थे ।
तो आज भुपेनदा की कुछ चुनी हुई रचनाएं आपके लिये ले कर आया हूं अगर बंगला ना आती हो तो किसी बंगाली जानने वाले से इसके अर्थ को समझने की कोशिश करियेगा.. वाकई इस तरह का प्रयोग हिन्दी में अगर हुआ हो तो आप सूचित ज़रूर करियेगा , तो सुनिये और सुनाइये भुपेन दा के वो रचनाएं जिनकी वजह से लोग भूपेन हज़ारिका को जानते हैं।

आज आपके सामने कुछ गीत पेश कर रहा हूं, जो भुपेन हज़ारिका, सुमन चट्टोपाध्याय, नचिकेता, अंजन दत्ता के गाये हुए हैं सभी गीत बंगला में हैं मै भी भाव तो समझ लेता हूं अज़दक की वजह से इन सारे गीतों को समझ पाया बंगला मुझे आती नहीं है. तो मुलाहिज़ा फ़रमाईये
Powered by eSnips.com

Tuesday, November 6, 2007

ये टेस्ट पोस्ट है...

सुनें हम देखेंगे इकबाल बानों को, एक चटनी और पता नहीं क्या है मै सिर्फ़ प्लेयर चेक कर रहा हूं ॥॥।।


पहले सुनिये इकबाल बानो को जिनकी आवाज़ का जादू तो देखिये लोग इनक्लाब ज़िन्दाबाद के नारे लगा रहे है मशहूर गज़ल हम देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे.. (फ़ैज़ अहमद फ़ैज़)

01 Hum Dekhege.wma


अभी सुनते हैं चटनी मुरलिया मुरलिया ( सैम बुधराम)



ये आवाज़ है नैय्यरा नूर की ऐ इश्क हमें बरबाद ना कर



ये भी सुने आनन्द तो आयेगा... कुमार गंधर्व॥॥


एक विडियो....


हिन्दी चटनी

Sunday, November 4, 2007

आपने अब तक लिया नहीं, करेबियन चटनी का स्वाद !!!!

तो अभी चटनी का सुरूर थमा नहीं है, अभी तक आपने बुधरामजी की चटनी का स्वाद लिया, पर हमारे मित्र अखिलेशधर जी को लगता है कि.... इसमें चटनी ही नहीं अचार भी है साथ ही साथ मिट्टी की हांडी में बनी दाल का सोंधा पन भी है...हां परोसने के तरीके में क्रॉकरी और स्टेन्लेस( संगीत) का बखूबी इस्तेमाल है, बेवतन लोगों में रचा बचा अस्तित्वबोध नये बिम्बों के साथ आधुनिक होता हुआ भी कहीं अतीत की यात्रा करता है। कहीं का होना या कहीं से होने के क्या मायने हैं इस संगीत से अयां हो रहा है।

तो अनामदासजी की ने कुछ इस प्रकार अपनी प्रतिक्रिया दी...गजबै है. आनंद में सराबोर कर दिया आपने, भौजइया बनावे हलवा सबसे अच्छा था लेकिन बाकी सब अच्छे हैं. इन गानों को सुनकर लगता है कि ऑर्गेनिक भारतीय संगीत, देसी संगीत सुनने के लिए अब कैरिबियन का सहारा लेना पड़ेगा, जहाँ भारतीय तरंग में बजते भारतीय साज हैं, और गायिकी में माटी की गंध है, सानू वाली बनावट नहीं है. मॉर्डन चटनी म्युज़िक में रॉक पॉप स्टाइल का संगीत सुनाई देता है, भारत में लोकसंगीत या तो बाज़ार के चक्कर के भोंडा हो चुका है या फिर उसमें भी लोकसंगीत के नाम पर ऑर्गेन और सिंथेसाइज़र, ड्रम,बॉन्गो बज रहे हैं. भारतीय इस अनमोल संगीत को बाँटने के लिए आपको बहुत पुन्न मिलेगा.

आखिर हम अभिभूत क्यों हैं ? क्या इसलिये कि जो यहां ज़िन्दा नहीं हैं उनमें यहां( देसीपन) वहां ज़िन्दा है और जो यहां ज़िन्दा हैं उनमें उनमें यहां मुर्दा हैं, एन्थ्रोपोलिजिस्ट के लिये शायद ये विषय ज़्यादा रुचिकर हो पर हमारे लिये तो यही सुखद है कि हम यहां भी है और वहां भी हैं, तो मुलाहिज़ा फ़रमाइये और आप भी गुनगुनाइये.... और सुनिये मौली रामचरन और रसिका डिन्डियाल को स्वाद लें चटनी का । ये जो पहला वा गीत है उसे गाया है मौली रामचरन ने और बोल हैं..अरे मन बैठे कर लो विचार......
और ये दूसरा वाला भी कम मस्त नही है इसे गया है रसिका डिन्डियाल ने जिन्हे वहां लोग रानी के नाम से भी पुकारते हैं
बोल हैं ... कोई नैना से नैना मिलाये चला जाय...

Saturday, November 3, 2007

कैरेबियन चटनी का स्वाद...भाग दो !!!

चटनी का रंग गज़ब का चढ़ा है,अपने मित्रों को पसन्द आया तो मेरा उत्साह भी दुगना हो गया है, अपनी महफ़िल में जब हम बैठका करते थे तो कुछ साथी नाक से सहगल का कोई गीत छेड़ देते हम उन पर खूब हंसते, पर उन गीतों को सुनते, क्या क्या गीत दिये कुन्दन लाल सहगलजी ने.... बुधराम की आवाज़ में सुनिये.. तो लगता है आज के समय में संगीत के धीम धड़ाक में सहगल साहब होते तो कुछ ऐसी ही धुन पर गा रहे होते... खैर मैं भी क्या लेकर बैठ गया.. सहगल साहब की बात बाद में करेंगे... अभी तो बुधराम की आवाज़ और कैरेबियन चटनी संगीत के जादू का मज़ा लीजिये । तो पेश हैं बुधराम के कुछ और गीत ।

दुलहा ब्याहे आए.. मोर मन लागा दुलहिनी से ....

घर घर बाजते बधईया ........

Thursday, November 1, 2007

कैरेबियन चटनी संगीत का स्वाद ! ! !


देखिये ना लोकगीत पर मेरा पिछ्ला पोस्ट तो आपने पढा ही होगा और इस पर पिछ्ले दिनो इरफ़ानजी और यूनुसजी ने कुछ अच्छी रचना भी हमें सुनवाई थी,पर पुरानी चीज़ें जैसे हाथ से फ़िसल फ़िसल जा रही हैं उसे हम सम्हाल ही नही पा रहे और जब कुछ नई चीज़ दिखती है तो राय बनाने में ही काफ़ी समय निकल जाता है.. पर मैं आज के गीतों के बारे में ये सब मगजमारी कर रहा हूं, अब आज के दौर में कुछ भी नया सुनने को मिल जाय तो नये लोग उसे बड़ी शिद्दत से देखते हैं पर वहीं कुछ पुराने मिल जायेंगे और बात यहीं से शुरू होगी कि अच्छा तो है पर वो बात नही है जो पहले हमने सुना था और फ़िर पुराने दिन की बातें शुरू होंगी और ओस में भीगे दिनो की बात होगी और मामला रफ़ा दफ़ा ।

कैरेबियन चटनी सुन रहा था और मै यही सोच भी रहा था कि गुयाना, फ़िजी,और मौरिशस, हालेंड आदि देशो में डेढ़ दो सौ साल से रह रहे हमारे पुर्वजो ने कितना कुछ बदलते हुए देखा होगा, जो भी अपने देश अपनी मिट्टी लेकर गये होंगे उसे कितना सहेज संजॊ के रखा होगा पर बदलते समय में वहां भी गीत संगीत में कितना कुछ बदला होगा और कितनों ने ये बात तो वहां भी कही ही होगी कि अब पहले जैसी बात नही है, पर हम तो उनके आज के अंदाज़ से ही अभिभूत है नही विश्वास होता तो आप भी सुनिये और सोचिये समय के साथ कितना कुछ बदला होगा पर उन्हॊने आज भी वो रस अपने संगीत में बचा रखा है जो आपको बरबस सुनने और समझने को मजबूर कर दे तो कुछ जुगाड़ से ये चट्नी आप तक पहुंचा रहा हूं, मज़े से इसका स्वाद लीजिये स्वाद जो जायकेदार तो है ही अपना सा रस भी आपको भरपूर मिलेगा ये मेरी गारन्टी है ।

इसके इतिहास पर कुछ जानकारी बांट सके तो सोने में सुहागा, मेरे दिमाग में तो अभी भी अमिताभजी द्वारा गाया कलिप्सो ही दिमाग में है ओ रे सांवरिया ससुर घर जाना... पर आपको लेकर चलते है कैरेबियन द्वीप और वहां का मज़ा लीजिये.. आप जो सुनने जा रहे हैं उसे गाया है सैम बुडराम( Sam boodram) ने जो ट्रेडिशनल चटनी किंग माने जाते है. गाने मै लिख नही पा रहा इसके लिये माफ़ी चाहता हूं।


सोनार तेरी सोना पर मेरी विश्वास है....





छ्ट्ठी के दिन भौजैईया बनावे हलवा .......

कुछ और उम्दा चीज़ें है परोसने के लिये पर ..... जो आपने सुना कैसा लगा ज़रूर लिखियेगा !!!!

Friday, October 12, 2007

क्या लोकगीत अब लुप्त हो जायेंगे ?


पता नहीं क्या क्या करना चाहता हूँ, पर समस्या ये है की ऑफिस का भी काम इतना सर पर पड़ा रहता है की अपने काम से मुक्त होकर कुछ व्यक्तिगत चिन्तन जैसी बात तो सोचना भी मुश्किल सा हो गया है, आज बैठा था की अचानक अनिल सिह ( अपने एक हिन्दुस्तानी की डायरी वाले) याद आ गए उन्होंने अरसा पहले जब हम बलिया मे रहते थे,तब उन्होने एक लोकगीत "छाप के पेड़ छियुलिया, की पतबन गहबर हो" ये लोकगीत उन्होंने मेरे घर पर सुनाया था और इस गीत को सुनकर मेरी माँ के आँख में आँसू आ गए थे, काफ़ी देर तक तो माँ इस गीत को सुनकर कही, अपने में ही खो गईं थीं उनको देखकर लगा था की लोकगीतों में भी कितना दम है जब सम्प्रेषित करती है तो सीधे दिल से सम्वाद स्थापित करती है, हम भी जब किसी जलसे में समूह के साथ लोकगीत गाया करते थे, तो वो समां देखते ही बनता था ।

ये सोचकर भी की सैकड़ो साल से लोकगीतों की परम्परा, हमारे समाज में आज भी आख़िर जिंदा कैसे हैं? यही सोचकर आश्चर्य भी होता है , हाँ ये ज़रुर हुआ है की, शादी विवाह के मौकों पर गाँव जवार में जो लोकगीत गाए जाते थे, उनकी जगह फिल्मो की धुनों ने ले ली है, अब तो ये हाल है की भजन भी फिल्मी धुनों पर गाये जाते हैं, आज भी बहुत सी फ़िल्मो के गाने लोकधुन की वजह से ही हिट होते हैं, ये दिगर बात है कि लोकगीतों का स्थान हमारे यहां हमेशा महत्वपूर्ण होने के बावजूद, धीरे धीरे ख्त्म होता जा रहा है, अब नई पीढ़ी के लोग भी शादी विवाह के मौके पर फ़िल्मी धुनों का ही इस्तेमाल धड़ल्ले से कर रहे हैं, जिससे लोकगीतॊ को नुकसान ही पहुंचा है।

हमारे पुराने मित्र उदय ने पिछले दिनों एक फ़िल्म कस्तूरी बनाई थी, उस फ़िल्म मे एक ख़ास बात थी, कुछ ऐसे लोकगीत जो हम सुना करते थे बरसों पहले, उन लोकगीतों का इस्तेमाल उदय ने अपनी फ़िल्म कस्तूरी में किया, ये लोकगीत हमेशा लोकप्रिय रहे हैं, इस वक्त मैं आपके लिए दो गीत इसी फ़िल्म कस्तूरी चुनकर लाया हूँ, संगीत निर्देशन प्रियदर्शन का है, जिनकी ये पहली फ़िल्म थी । आप ज़रूर सुनें, पहला गीत है बाबा निमियां के पेड़ जिन काट्यु हो. बाबा निमिया चिरैय बसे......जिसे गाया है मराठी गायिका आरती अंकलीकर ने और दूसरा गीत है पछियुं अजोरिया ढुरुकि चली... ...आवाज़ है कविता कृष्णामूर्ती की,तो लीजिये पेश हैं यहां ये तो बता दूं कि ये दोनो गीत भी फ़िल्म से ही हैं, ज़रा आरती अंकलीकर की आवाज़ में इस लोकगीत को तो सुनिये.....


यहां आप कविता जी की आवाज़ में सुन सकते है... पश्चिम अंजोरिया ढुरुकि चली...

कभी हम खूबसूरत थे !! !!


नय्यरा नूर की आवाज़, एक ऐसी आवाज़, जिसमें कमाल की गहराई है, पता नही कब से सुन रहा हूं इन्हें , कहते है इस फ़न से से जुडना भी एक संयोग ही रहा नय्यराजी के लिये., यहां पर तफ़्सील से जान सकते है, लेकिन अभी मै जो, ग़ज़ल कहिये छेड़ने जा रहा हूँ, उसे मैंने जब से सुना है, तब से मै कई बार सुन चुका हूँ, और ख़ास बात कहीँ भी झेल नही है, मीठी सी आवाज़, और सही कह रहा हूँ बड़ी ही मधुर आवाज़ है , विश्वास ना हो तो ख़ुद ही सुने और बताएँ और जल्दी बताइये तो मै अपनी मुहिम में आगे बढूं, नही तो कुछ और ज़मीन तलाशी जाय, ये पोस्ट प्रयोग के बतौर माना जाय, सिर्फ़ दो गज़लें है, आज सुन लिया जाय, अब बहुत गायकी के बारे में इधर उधर की लिखे बगैर आगाज़ करते हैं ... तो पेशे खिदमत है नय्यरा नूर की आवाज़ में चन्द गज़लें, आपको अगर सन्दर्भ पता हो तो शिरकत कीजिये अच्छा लगेगा... बोल हैं कभी हम खूबसूरत थे...




दूसरी गज़ल कुछ यूं है .... ऐ इश्क हमें बरबाद ना कर ...


अभी तो मैं जवान हूँ !!!






जवानी की सतरंगी छाँव, जवानी का जोश, जवानी-दीवानी ,ढलती जवानी, और जवानी के बारे मे ना जाने क्या लिखा जाता है, अब मै अपनी जवानी के बारे मे पुराना किस्सा ज़रुर सुनाना चाहता हूं ...मै भी इसे अपने पुराने दिन के रूप में ही याद करना चाहुंगा, जवानी के दिन के रूप मे नही, क्योकि अभी तो मै जवान हूं, तो इलाहाबाद के दिनो की बात है, रंगकर्म अपने उफ़ान पर था, नाटककार ब्रेख्त का नाटक इनफ़ॉरमर हम कर रहे थे, तब मै बाइस साल का रहा होउंगा, नाटक का एक पात्र मुझे भी निभाना था, निर्देशक थे तिगमांशु धूलिया.. तो निर्देशक ने बताया कि जो चरित्र आप निभा रहे है, उसकी उम्र लगभग पैंतालिस की है..तो मैने उस चरित्र के बारे सोचना शुरु किया, पैतालिस का आदमी कैसा होना चाहिये कैसा दिखना चाहिये....थोड़ा गाम्भीर्य धारण करना चाहिये और साथ साथ चाल भी धीमी होनी चाहिये.. बोलना भी बड़ा तौलकर....उसकी कनपटी के दोनो तरफ़ बाल सफेद होने चाहिये, वो तेज़ी जो जवानी मे रहती है वो तो बिल्कुल नही होनी चाहिए, पर आज मैं पैतालिस का हूं और आज लग रहा है, जो मैंने पहले इस उम्र के बारे में कल्पना की थी, वो ग़लत थी, क्योकि अभी भी मैं जवान हूं...हां इतना ज़रुर है, अपनी जवानी को बरकरार रखने के लिये बस इतना हुआ है कि बालों का रंग अब काला नहीं रह गया, उसमे भी लोरियल का इस्तेमाल हो रहा है...... जवानी बरकरार है, जब एक आध महीने में बालों का रंग थोड़ा धूमिल होने लगता है तो अपने कुछ खास लोग बोलने लग जाते है कि लगता है, लोरियल आंटी बहुत दिनो से आई नही हैं बुला लीजिये भाई और मै लोरियल आंटी को बुलाता हूं और फिर से पहले जैसा जवान हो जाता हूं

एक बार मै अपने ऑफ़िस की सीढियो से नीचे उतर रहा था तो मेरे एक सीनियर रास्ते में मिल गये, मैने क्या देखा, कि उनकी मूंछ के बाल उनके सर के बाल से कुछ ज़्यादा ही काला नज़र आ रहा था मैने इसका राज पूछा, तो उन्होने बताया कि मेरी मूंछ की उम्र सर के बालो से सोलह साल कम है, लेकिन ये बताना कि ये कमाल किसी रंग का है, इससे कन्नी काट गये, अरे कुछ तो ऐसे भी है सर के बाल सफ़ाचट्ट कर रखे है तो सफ़ेदी का सवाल ही नही उठता.. तो कहना ये चाहता हूं कि अभी भी मैं जवान हूं और इसी बात पर मल्लिका पुखराज की एक रचना याद आ रही है हालांकि इस रचना को मेरे पिता भी बहुत पसन्द करते थे और आज मै भी कह रहा हूं कि मुझे बेहद पसन्द है. धुन तो साधारण ही है. पर आवाज़ ऐसी की बार बार सुनने का मन करे , रचना है हफ़ीज़ जलंधरी की .... गाया है, मल्लिका पुखराज ने, तो मुलाहिज़ा फ़रमाइये:



अगर पुरानी तस्वीर देखने में परेशानी हो रही हो तो यहां पर आप इसे बखूबी सुन भी सकते है: .....

उस मोड़ का वो पीपल, करता है कितनी बातें ...... तलाश बैंड की कुछ रचनाएं !!!!


मै तलाश के बारे मे बताना चाहता हूँ , हममे से अमूमन सभी ने अपने यहाँ के बैंड को सुना ही है, चाहे वो इंडियन ओशन हों या यूफोरिया या बोम्बे वाइकिंग हो या आर्यन हो या अग्नि हो, ये सारे बैंड किसी ना किसी रूप में बड़े शहरों से ही जुड़े हुए है पर इनमे छोटे शहर से जुड़े किसी बैंड का नाम नही सुना गया पर आज लखनऊ शहर से जुड़े एक बैंड से मैं आपका परिचय कराना चाहता हूँ छोटे शहर मे रह रहे ऐसे ही मतवाले समूह से आपका परिचय कराता हूँ, इस बैंड का नाम है तलाश , चार पाँच लोगो की टोली है युवा है, इनके बैंड मे जो गीत गाये जाते हैं जो उसे इनके समूह के ही रितेश लिखते है , कैसा लिखते है ये आप सुन कर बताइयेगा, यहाँ मैं इनके गाने पर वाह वाह नही करूंगा अगर आपको वाह वाह जैसी बात लगे इनकी रचनाओं में, तो अपनी प्रतिक्रिया दीजियेगा, राहुल संजय, विभोर, अनीता, इनसे ही बना है तलाश, और सबसे बड़ी बात है की ये सभी लखनऊ के है, फिलहाल इन्होने हाल मे ही पुणे शहर को अपना आधार बनाया है और वही रहकर संगीत की सेवा में लगे हुए हैं, ये समूह अपना लिखा ही गाता है और संगीत रचना तो इनकी है ही, तो बिला वजह तारीफ न करके काम की बात करते है इनकी दो तीन रचनाएँ आपको सुनाता हूँ शायद आपको मज़ा आए , तो लीजिये सुनिये पहली रचना उस मोड़ का वो पीपल, करता है कितनी बातें........


अब सुनिये इस गीत को और अपने कॉलेज के दिनो की कैन्टीन तो याद आ ही जाएगी ..... चाय ज़रा सी ........




और ये रचना हर सुबह है परेशां .......



सुनने के बाद अपने अनुभव ज़रूर बांटिये कुछ सुझाव भी हो तो दीजियेगा आपके सुझाव तलाश तक ज़रूर पहुंच
जाएंगे!!!!

Monday, October 1, 2007

कैसे समाज मे हम रह रहे हैं ?

आज शुरू करता हूँ, बशीर बद्र की कही बातो से, कोई हाथ भी ना मिलाएगा जो गले लगोगे तपाक से, ये नए मिजाज़ का शहर है, ज़रा फासले से मिला करो!! कैसा समाज हो गया है?पता नहीं क्यों, जब भी मैं कुछ मूड मे आता हूँ की ऐसा लिखूं, जिसमे मज़ा आए पर पता नही लिखते समय अन्दर की कड़वाहट सतह पर आ जाती है और पता नहीं क्या लिखने लगता हूं की मन दुखी हो जाता है....भाई हमेशा उस समय की सोचता हूँ जब नई -नई आजादी मिली थी, लोग आपस मे आजादी की खुशियों में सराबोर थे, और ऐसे समय में गुरुदत्त की इस "प्यासा" फ़िल्म में इस गीत को, क्या सोच कर रखा गया होगा ?



यही नहीं, साहिर या उनकी तरह कुछ और लोग जो विज़नरी थे, पहले ही आने वाले समाज की शक्ल देख लेते थे तभी तो इस तरह का गीत उन्होंने उसी समय रच दिया, जैसे मुक्तिबोध ने अंधेरे मे सब कुछ देख लिया था, जो आज हम भी अपनी नंगी आंखो से देख सकते हैं.

कहते हैं जीवन बहुत ख़ूबसूरत है, एक बार ही तो ये जीवन मिलता है, छक के जी लेने में जाता क्या है भला ?पर लोग कहाँ चुप रहने वाले.... कहने वाले मिल ही जाएंगे की ख़ूब पैसा हो, तो जीवन भी खूबसूरती से जीं सकते हैं, पर पैसे वालों का क्या हाल है, परिवार में एक डॉक्टर भी जुड़ जाता है.. कुता लेकर सुबह सुबह टहलते देखे जाते हैं तो क्या लगता है वे खुश है, कुता पाल रखा है सुबह सुबह कुत्ता टहला रहे है बताइये कितना सुखद है ये सब इनके लिए पर आप जानते नही की सुबह सुबह कुत्ते को नही कुता इन्हें टहला रहा होता है, की सुबह सुबह डॉक्टर ने टहलने के लिए कहा और ये भी कहा है नही टहलोगे तो जल्दी टपक जाओगे.. कितना टेंशन है(भाई कुत्ते का उदाहरण यूं ही दे दिया है)

लोग तो ये भी कहते हैं की पैसा रिश्ते की मिठास तय करता है ओफो, ये क्या भाई,मै अनाप शनाप लिखने लगा दार्शनिक बातें मुझपर जंचती नही है, लगता है मैं ज़मीन से ऊपर उठकर ऊंची ऊंची छोड़ रहा हूँ पर कहना ये चाहता हूँ की, इसी समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो आने वाले समय को पहले ही भांप लेते हैं,इस पर मै तो चकित रहे बिना रह नही पाता..

अब बताइये कब लिखा था बुल्ले शाह ने बेशक मन्दिर मस्जिद तोड़ो बुल्ले शा ये कहता, पर प्यार भरा दिल कभी तोड़ो, इस दिल मे दिलवर रहता... आज देखिये आज के दौर मे ये गाना कितना फिट बैठता है,और बहुत से गीत होंगे पर मुझे ये गीत आज के दौर मे बड़ा सटीक लगता है मुकेशजी का गाया ये गीत, लगता है जैसे अभी अभी लिखा गया है. साहिर ने लिखा था आसमां पे है खु़दा और ज़मी पे हम ......


फ़िल्म है "वो सुबह कभी तो आएगी"... गायक हैं मुकेश


शायद मैं अपनी बात ठीक से नही रखा पाया, क्योकि इसके लिए लम्बे पोस्ट की दरकार है, जो मेरे लिए नितांत मुश्किल है, पर इतना जरूर है, कि जिस समाज मे हम रह रहे हैं कुछ ऐसा हो, की हमे अपने समाज पर गर्व हो, और हम सर उठा कर कहे, ऐसे ख़ूबसूरत समाज से जुड़कर हम गौरवान्वित महसूस करे, जो वाकई दुरूह है.इस खूबसूरत गीत से, मै आज की पोस्ट समाप्त करना चाहता हूं ... इस गीत को सुनिये, मज़ा भी है, और दर्द भी, इस फ़िल्म का नाम है नई उमर की नई फसल फ़िल्म तो कूड़ा थी, पर करते क्या, गाने के चक्कर में पूरी फ़िल्म देखनी पड़ी ... अब सोचिये ना, गाने के चलते हमने वैसे बहुत सी फ़िल्में देखी है जो बाद में पता चला गाने पर ही पूरी फ़िल्म टिकी है. पर ये गीत जो आप सुनने जा रहे है. आज भी सुनता हूं तो सिहर उठ्ता है मन, तो देखिये वीडियो
नीरज जी का है ये गीत ... कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे गाया है रफ़ीसाहब ने, .. तो सुनिये, आज बस इतना ही .... !!!!!

Saturday, September 29, 2007

सपनों की रानी का सच !!!

मै फ़िल्म आराधना की शूटिंग से जुड़ा एक मज़ेदार किस्सा आपको सुनाता हूं वाकई आपको बड़ा मज़ा आएगा.. तो हुआ कुछ ऐसा कि आराधना फ़िल्म के इस लोकप्रिय गाने मेरे सपनो की रानी की शूटिग दार्जिलिंग में होना तय हो रहा था तभी इस फ़िल्म के निर्देशक शक्ति सामन्त ने ये तय कर लिया था कि इसकी शूटिंग में हिरोइन शर्मिला टैगोर को तो वो कतई नहीं ले जाएंगे क्योकि एक तो शर्मिला को ले जाने का मतलब था कि उनकी मां को भी ले जाना और शर्मिला के नखरे अलग झेलना और... गवारा नहीं था शक्तिदा को .तो उन्होने तय ये किया कि सिर्फ़ राजेश खन्ना और सुजीत कुमार को दार्जिलिंग ले जाकर शूट करेंगे और बाकी की शर्मिला वाली शूटिंग मुम्बई में ही करेंगे.. और यही किया इसमें शर्मिला वाला हिस्सा आखिरकार दार्जिलिंग में शूट नही किया और सिर्फ़ राजेश खन्ना और सुजीत कुमार के ही सीन फ़िल्माए गये.. तो शक्ति सामन्त ने हिरोइन को दार्जिलिंग ना जाकर अपनी फ़िल्म का पैस बचाया समय भी खूब बचाया और जहां तक इस फ़िल्म का सवाल है तो अपने समय की ये हिट फ़िल्म तो थी ही और उससे भी ज़्यादा इस फ़िल्म के गाने गज़ब हिट हुए थे आज भी सुनते है तो मन खिल उठता है. तो इस गीत को देखिये और मज़ा लीजिये!!

Sunday, September 23, 2007

बीते दिनो की बात और हलका हलका सुरुर नुसरत जी की कव्वाली !!!


आजकल क्रिकेट का सुरूर चल रहा है पर ये एक हवा की तरह आया है और उसी तरह चला जाएगा, पर ब्लॉग का सुरुर तो कमाल है, इन दिनो ब्लॉग का सुरूर है जो सर चढ़कर बोल रहा है, हर बार कुछ नया करने की चाहत से मन तो लबरेज़ रहता है ., क्या करें जब कुछ सोचता हूं ,तो लगता है कि मेरे लिखे अनुभव पर किसी को पड़ी ही क्या है, पर बार बार रोकने के बाद भी बीते कल की सुहानी यादें हमेशा घुमड़ कर पीछा करती रहती है,

जब इलाहाबाद या दिल्ली में था तो वहां महफ़िल अपने आप ही जम जाती थी ... साथ में संगीत के मुरीद लोग तो साथ थे ही.. वो चाहे अज़दकजी हो, चाहे हिन्दुस्तानी डायरी वाले अनिल सिह हो तो क्या निर्मल आनन्द वाले अभय तिवारी हों, या टूटी हुई बिखरी हुई वाले इरफ़ान हो या पहलू वाले चन्दू हो...या पंकज श्रीवास्तव हो साथियो के साथ अपनी मंडली दस्ताऔर जन संस्कृति मंच के साथ अनगिनत नाटको और गीतों के प्रदर्शन घूम घूम कर पूरे देश में करना, याद आता है.

दिल्ली की मंडली इससे अलग थी.. वहां भी हारमोनियम तबले से रात भर क्या धमा चौकड़ी मची रहती थी.. कितना मज़ा आता था... एक बार तो दिल्ली मे गज़ब हो गया, हमलोग तो वहां मंडी हाउस में एक्ट वन के लिये नाटक किया करते थे.हम नाटक करते करते कब गायन मंडली में तब्दील हो गये पता ही नही चला.. और बाद में कब हम कैसे सड़को पर उतर आये और देखते देखते हमने सिर्फ़ कोरस गीत तैयार किये और उसके देश भर में खूब सारे प्रदर्शन किये जो मैं तो कभी भूल ही नही सकता .

तब भाई पीयूष मिश्र, आशीष विद्यार्थी, मनोज बाजपेई, निर्मल पांडे, गजराज राव, भाई निखिल वर्मा, अनीश, अनुभव सिन्हा, गुड्डा, विजय बाबू ,अरविन्द बब्बल और हमारे निर्देशक एन के शर्मा,पत्रकार राजेश जोशी, पत्रकार अरूण पान्डे और भी बहुत से नाम थे .दिन भर तो हम साथ ही साथ रहते थे और रात में हारमोनियम के साथ जब बैठते थे तो समझ नही आता था कि इतनी जल्दी रात खत्म कैसे हो जाती थी पर अब ब्लॉग रूपी नई बयार ने हमें चारों तरफ़ से घेर लिया है अगर कहें तो बहुत अकेला भी कर दिया है कि ऑफ़िस करने बाद घर से निकलना भी तो नही चाहते..पर ये जो ब्लॉग की दुनिया जो है उसने भी बहुत सारे अजनबी मित्रों से मिलावाया है और धीरे धीरे ये अजनबियत भी गुम होती जा रही है.... हम मित्र बनने की ओर अग्रसर है...

इसी से आज आपके सामने नुसरत साहब कि कव्वाली पेश कर रहा हूं और जो भी ऊपर मैने लिखा वो चाहे आपको बुरा लगे या भला झेलिये और मुझे अपने नॉस्टेल्जिया में खो जाने दीजिये...तो आज की ये कव्वाली अपने दोस्तो को नज़र करता हूं तो गौर फ़रमाइयेगा... ये जो हल्का हल्का सुरूर है सुनिये और मज़ा लीजिये इस बेहतरीन कव्वाली का, तो पेश है !!!!


इस कव्वाली को सुनने के बाद अपनी प्रतिक्रिया अगर देना हो तो अवश्य दें !!!! इस कव्वाली के सुरूर को ब्लॉग से जोड़कर सुनियेगा तो शायद और मज़ा आये !!!!

आसमा से उतारा गया ज़िन्दगी देके मारा गया..... मुन्नी बेगम की कुछ गज़लें!!


आज आपके लिये एक पुरानी अवाज़ लेकर आया हूं. अब हमारे साथी कहने लगेंगे कि क्या भाई कब तक पुरानी यादों में खोये रहेंगे? पर क्या करें मन है कि मानता ही नही, जब से ब्लॉग से जुड़ा हूं तबसे हाल ये है कि हर बार किसी ना किसी के ब्लॉग पर कुछ देख कर कहना पड़ता है कि आपने तो पुरानी याद ताज़ा कर दी..

तो अब मैने भी सोचा कि जो भी हो अपने पास पुरानी यादों का पिटारा जब तक समाप्त नही हो जाता तब तक कुछ तो उन सारी चीज़ों को अपने साथ लेकर चलना ही है क्योकि वो पुरानी यादे तो हमेशा अपने साथ रहेंगी ही. तो आज एक ऐसी ही कुछ फ़ड़कती हुई गज़ल सुनावाई जाय अब आप कहेंगे ये फ़ड़कती हुई का क्या मतलब हुआ भाई?

तो आज मैं बात कर रहा हूं मुन्नी बेगम की. मुन्नी बेगम ने जो भी गाया उस समय की लोकप्रिय शायरी हमेशा उनके साथ रही. एकदम महफ़िली आवाज़,और उनकी गज़लें सुनकर वाकई बार बार कहने को मन करता है जानते हैं क्या? वाह वाह मेरे पास इतना समय नही है कि मैं उन गानो को लिखूं यूनुस भाई अभी बोल उठेंगे कि ये गज़ल अच्छी तो थी पर आप नीचे लिख देते तो आपका क्या जाता, तो अब बिना हील हुज्जत के सुनिये मुन्नी बेगम की ये मस्त गज़ल. इस गज़ल को लिखने वाले हैं इकबाल सफ़िपुरी. गज़ल है आसमं से उतारा गया...



और ये भी गज़ल सुनें और आनन्द लें और वाह वाह करें. गज़ल है लज़्ज़ते गम बढ़ा दीजिये....



मुन्नी बेगम की खासियत भी यही रही है कि हमेशा चलती गज़लों को उन्होने आवाज़ दी है तो इस गज़ल मे भी वो बात है सुनिये: और बताइये मज़ा आया की नहीं . गज़ल है कब मेरा नशेमन एहले चमन..

Thursday, September 20, 2007

एक फ़्युज़न ये भी, पुराना तो है पर तासीर गज़ब की है


कुछ दिनों पहले अजित भाई और भाई अनिल जी ने नया कुछ डालने को कहा था तो इस पर मैं इतना ही कहुंगा कि संगीत मे प्रयोग हमेशा मुझे अच्छे लगते रहे हैं, बहुत पहले आनन्द शंकर की रचनाएं सुनने में मज़ा आता था,पर धीरे धीरे वो मज़ा जाता रहा और अब उसकी जगह नॉस्टेल्जिया ने ले लिया है, अब सुनता हूं तो पुराना कुछ कुछ याद आता रहता है बस । पर कुछ संगीत रचनाएं ऐसी भी होती है जो धीरे धीरे पूरे वातावरण को और मोहक बना देते हैं तो अब ज़्यादा लिखना मुनासिब भी नही है, क्योकि सुनने के बाद ही कुछ बात की जाय तो अच्छा रहेगा, तो मन्द मन्द संगीत का आनन्द लें हां यहां ये बताना उचित होगा कि ये रचना पुरानी ज़रूर है पर एक समय गज़ब का जलवा था,पूरब और पश्चिंमी संगीत का मिलन का एक साथ मिलन तो देखिय्रे... मज़ा लीजिए.. सुनने के लिये दो तीर के बीच में दो चट्का लगाएं इस रचना में थोड़ी समस्या है.. खेद है आप ठीक से सुन नही पा रहे।

Powered by eSnips.com

Wednesday, September 19, 2007

टिप्पणियां जीवन रक्षक दवाएं हैं !!


अब क्या बताया जाय, मुम्बई का ब्लॉगर मीट उधर खत्म हुआ और जब निर्मल आनन्द की रपट आई तो सारे ब्लॉगर पिल पड़े टिपियाने...और बीस पच्चीस टिप्पणी के बाद साथियो की स्याही खत्म हो गई इसीलिये शायद और ज़्यादा टिप्पणी नहीं आ सकी और क्या समझा जा सकता है . और पिछले कुछ समय से ये बात भी नोट की गई है कि पूरे ब्लॉगिया समाज की चिन्ता सिर्फ़ दो विषयो पर ही ज़्यादा केन्द्रित रही है , किसी भी तरह की साम्प्रदायिकता और दूसरी ब्लॉगर मीट, लगता है सारे लोग इन्ही विषयों का इन्तज़ार कर रहे होते हैं और तब आप टिप्पणी देखेंगे तो लगेगा वाकई सबको इन सब की कितनी सामाजिक चिन्ता रहती है .. पर इसके अलावा कोई ऐसा विषय जिसने खूब टिप्पणिया बटोरी हों मुझे याद नही आती, एक तरफ़ पूरा माहौल बना हुआ है कि एक हज़ार से ज़्यादा चिट्ठे की संख्या पार हो चुकी है और ना जाने क्या क्या पर ज़रा अपने ब्लॉगिया समाज के बेहतरीन चिट्ठे पर जाइये तो लगेगा कि यहां लिखने वाले अधिक है पढने वाले कम और ये भी सम्भव है कि इतने सारे ब्लॉग पर जाकर टिप्पणी करना आसान भी नहीं है फिर भी देखा तो यही जा रहा है कि अलग अलग बिरादरी बनती जा र्है जो एक दूसरे की तारीफ़ के पुल बांधने में ही लगे रहते हैं .. और बहुसंख्य चिट्ठेकार दूसरों के ब्लॉग पर जाते ही नहीं.. तो टिप्पणी कहां से करेंगे. और जहां तक मुझे लगता है टिप्पणिया किसी भी ब्लॉग के लिये जीवन रक्षक दवाओं की तरह हैं.. इस बात से भी इंकार नही किया जा सकता कि कुछ अच्छे चिट्ठे भी है जो अपनी पहचान भी बनाने में कामयाब भी हो रहे हैं पर इन सब के बावजूद लोग चिट्ठो की बढती संख्या पर खुशी भी ज़ाहिर की जाती है पर आप किसी भी एग्रीगेटर पर जाकर देख सकते हैं तो सक्रीय चिटठों की संख्या डेढ सौ से ज़्यादा लगती नही .. तो ऐसी सूरत में आप चिट्ठेकार साथियों से लोगों से निवेदन है कि नये ब्लॉग पर जाकर कुछ अच्छे सुझाव ही दिया करें.. तो शायद कुछ चिट्ठों की उम्र बढ जाय.. हां यहां मै एक बात और कह ही दूं, कि ये सारी बाते कह कर मै ये तो एकदम साबित नही करना चाहता कि मै पाक साफ़ हूं...मैने भी इन चिट्ठों के उपवन मे से कुछ फ़ूल चुन लिये है, उन्ही को पूरा पढ़ना मेरे लिये दुरूह होता है... पता नही क्या मै सवाल से भटक गया क्या? मेरी बात आपके समझ में आ रही हो तो कुछ आप भी रास्ता दिखाएं...

Monday, September 10, 2007

इक बरहमन ने कहा है...ये साल अच्छा है...


शुरू शुरू में जगजीत चित्रा का अलबम "माइलस्टोन".. अनफ़ॉर्गेटेबल, और उसके बाद आया उनका लाइव कंसर्ट.." जिसमें उन्होने सरकती जाय है रूख से नाक़ाब.. गाया था और उस अल्बम में दर्शकों की वाह वाह भी कुछ ज़्यादा ही सुनाई पड़ रही थी..उसके बाद तो हर तरफ़ जगजीत सिंह ही सुने जाने लगे, अपनी आवाज़ के जादू से जगजीत सिह ने हमारे दिलों में ऐसी जगह बना ली कि पूछिए मत । कमाल की आवाज़, ऐसी आवाज़ जिसे एक बार सुन लें तो बार- बार सुनने का मन करेगा............

लेकिन उनकी गाई कुछ गज़लें आज भी सुनते है तो तरावट सी पर जाती है, और आज ही आज तलाशते तलाशते कुछ चीज़ें मिली है, आप भी लुत्फ़ उठाइये, तो सबसे पहले राजनीति पर व्यंग करती इस रचना को सुनिये....इक बराहमन ने कहा है ...

फिर इस नज़्म को सुने ऐसी बहुत सी रचनाएं जगजीतजी ने गाईं हैं जो मस्त लगतीं हैं.....बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी...

और ये ज़रूर सुनिये ..ये दौलत भी ले लो.. इसे तो हम दोस्तो की महफ़िल में बार बार सुनते हैं और आह आह कहते हैं.

Friday, September 7, 2007

उस्ताद मेहदी हसन साहब को सुनते हुए!!!!


मेहदी हसन साहब का ज़िक्र आते ही ना जाने कितनी ग़ज़लों के टुकडे़ मेरे ज़ेहन में गुनगुनाते लगते हैं, ना जाने क्या याद आने लगते हैं .पर अब काफ़ी दिनों से मेंहदी साहब गा नही रहे.. कहते है लकवा मार गया उन्हें. पर यहां तो हम अपाहिज़ हुए जा रहे है उन्हें सुने बगैर.....अब जब उन्होने गाना छोड़ दिया है.. पर हमारी यादों में तो वो हमेशा बने रहेंगे... .अरे अब उनकी क्या बात करें, अब तो अच्छी गज़ल और अच्छी आवाज़ सुनने को मन तरसता ही रहता है क्योकि एक समय था जब पूरे बाज़ार पर इन्हीं लोगो का ज़ोर था पर अब धीरे धीरे समय के साथ साथ बहुत कुछ बदल गया है पर आज भी उन्हें सुनने वालों की कमी नही है, .

मेहदी साहब ने हर किस्म की ग़ज़लें गाईं हैं जिन्हें सुनकर हम हमेशा मुत्तासिर होते रहेंगे.. ...यहां मेंहदी साहब की चन्द ग़ज़लें पेश हैं ....तो पहली गज़ल मुलाहेज़ा फ़रमाएं.. बोल हैं: देख तो दिल की जां से उठता है..



मेंहदी साहब का अंदाज़ तो देखिये...




मोहब्बत करने वाले कम ना होंगे.. इसका तो जवाब नहीं





जीत के पल और राहुल द्रविड

पिछले एक दिनी मैच में सचिन और सौरव के अलावा जिसके खेल ने प्रभावित किया वो थे रोबिन उथप्पा ऐसा खेल देखने को मिला था जिसमें सांस थम सी गई थी..अन्त तक नही पता चल पा रहा था कि दोनो टीमों में से आखिर जीत किसकी होगी..पर इन सब के बावजूद कप्तान राहुल द्रविड़ ज़्यादा प्रभावित भी नही कर पाये. शायद इसीलिये हमारे मित्र अजय कुमार का ये चुट्कुला आजकल बाज़ार में ज़्यादा सुना जा रहा है आप भी सुनिये ....एक क्रिकेट प्रशंसक राहुल द्रविड़ से मिला और उनकी जीत पर बधाई देने लगा कहने लगा कि मुबारक हो सर क्या खेलते है आप, आपकी टीम भी बहुत अच्छा खेलती है.. सर आप तो टीम के मुखिया हो..आप एक काम क्यों नही करते...एक अच्छा कप्तान भी रख ही लेते..... खैर रोबिन उथप्पा के धैर्य को अगर देखना है तो इस लिंक को ज़रूर देखें...कुछ मैच ऐसे होते है जो लम्बे समय तक आप याद रखते है इस मैच को भी उसी तरह याद किया जायेगा.. देखिये आखिरी २ ओवर...

Tuesday, September 4, 2007

क्या बता सकते है ये आवाज़ है किसकी ?

बहुत दिनों से इस रचना को मैं सुन रहा हूं पर इस मीठी आवाज़ के मालिक को अभी तक जान नहीं पाया हूं क्या आप मेरी मदद कर सकते हैं ? इनकी रचना है जो कबीर पर आधारित है जो मन को भा रही है . आप भी सुनिये.. और मज़ा लीजिये और हमारी मुश्किल को दूर कीजिये , आखिर ये रचना किस अलबम से है..ज़रूर बताइयेगा तो पेश ए खि़दमत है.. !!!!

समीर भाई ने मेरी शंका को दूर कर दिया है...... ये संरचना मुम्बई के "अग्नि बैंड" की है..... समीर भाई आपको दिल से शुक्रिया.... तो आप अब सुनिये और देखिये......!!!!

Monday, September 3, 2007

बिक्रम घोष का तबला

भाई, फ़्युज़न संगीत के बारे में क्या सोंचते है?... मेरी तो इस विषय में यह राय है कि संगीत मे प्रयोग जितना भी हो कम है.. आखिर असली संगीत तो वही है जो आपके मन को भेद कर बात करे और एक ऐसे संसार में पहुचा दे जो आपकी कल्पना से परे हो... अपने यहां भी इस दिशा में काफ़ी काम हुआ है पर उसका बाज़ार बन नही पाया है.. फिर भी कुछ नाम अगर लिये जांयेंगे तो.. चाहे आनन्द शंकर हों, ज़ाकिर हुसैन हों या फिर रंजीत बारोट हों.. और भी बहुत से नाम है पर यहां मेरा मकसद नाम गिनवाने का नहीं है... ख़ैर, तो बात ये है, दोस्‍तो, कि कुछ नये मोती हैं... जिनकी दस्तक बहुत झन्नाटेदार है.. अब ये ज़रूर देखना है इनमें नया और क्या है? तो इन्‍हीं नये नामों में एक नाम है बंगाल के बिक्रम घोष का.. जिन्होने बहुत कम समय में देश के बाहर भी ख्याति अर्जित की है .

तो सोचना क्या है? बिक्रम घोष के बारे में सिर्फ़ इतना कि मूलत: तबलानवाज़ हैं लेकिन रचना जो है आपका मन तो मोह ही लेंगी! तो यहां टिपियाइए, और आनंद लीजिए तबले के तक-धिड़ाक का...

Sunday, September 2, 2007

शुभा मुदगल का जादू...

शुभा मुदगल को पहले आपने सुना है या नहीं? कोई अलबम सुना ही होगा, या किसी वीडियो पर निग़ाह गई होगी. पर इससे अलग भी एक बड़ी उनकी दुनिया है. उतनी ही बड़ी और खनकदार जैसी कि उनकी आवाज़ है... आमतौर पर टीवी और रेडियो पर अक्‍सरहां उनकी आवाज़ से हमारी जो मुलाक़ातें होती हैं, उनमें चालू पॉपुलर म्‍यूजिक का काफी सारा तमाशा भी घुसा रहता है.. लेकिन शुभाजी की स्‍वर और सुर की जिन उत्‍तंग शिखरों तक पहुंचने की जो सहज काबिलियत है, उसके दिलअज़ीज़ मोती हमारे आगे नुमायां होते कहां हैं? मगर यह दुश्‍वार काम हमने किया. किसके लिए? हुज़ूर, मेरे करीब, आपके लिए! यहां भटके, वहां पहुंचे, अंतरजाल में कहां-कहां अटके... और तब कहीं जाकर हमने यह ख़ज़ाना हासिल किया है... लीजिए, नोश फ़रमाईए, ठुमरी की ठुनक- कान्‍हा तोरी बांकी चितवनिया, हे रे सांवरिया...

Get this widget Share Track details


लगे हाथ शुभाजी की गायिकी के कुछ अन्‍य नमूनों का भी आनन्‍द लीजिए..

पहले राग देस में यह सुनें:

Get this widget Share Track details


फिर यह ज़रा चालू, धीम-धड़ाम वाली बंदिश सुनें:

Get this widget Share Track details


और यह एक कजरी:

Get this widget Share Track details


और आखिर में एक सावनी:

Get this widget Share Track details

Friday, August 31, 2007

जीतते जीतते हार गये !! !!



अरे कल का मैच तो मैंने पूरा देखा...और सुबह सुबह तैयार होकर ऑफ़िस भी आ गया.. कुछ भी कहे ये टीम इंडिया के लिये तो बुरा ही था.. पर एक अच्छा खेल देखने को मिला, मैच अभी शुरू भी नही हुआ था साथियों के एस.एम एस पे एस.एम.एस आते रहे..क्या था उन एस एम एस में चलिये इस एस एम एस की कुछ कड़िया जोड़ने की कोशिश करता हूं..हम भारतीय जीत के प्रति कितने लालाइत रहते हैं ये आपको इन एस एम एस संदेश से पता लगेगा....

* भाई टॉस जीत गये हैं अब ये मैच भी अपने हाथ है.

* जीतना है.

* जीत अपनी सुनिश्चित है

* देखा सचिन को ,५० लगाते ही ठंडे

* अरे ये क्या कार्तिक को भेज दिया?

*लग रहा है लो स्कोरिंग मैच है.

* अरे सब आउट होते जा रहे हैं सबकी चर्बी बढ गई है.

* अरे ये साले खिलाड़ी नही है स्टार हैं.

* बड़ा कम स्कोर बना है अब बॉलर ही कुछ कर सकता है..

* इंगलैण्ड ये मैच बचा नही पायेगा अपना ज़हीर फ़ॉर्म में है.

* स्पिनर तो अभी बाकी हैं ये मैच अपना है..

*अरे ये आगरकर को भी विकेट मिल गया

* जब गला फ़ंसता है तभी विकेट लेता है...

* ए भाई इस पवरवा का बाल बहुत बढ गया है इसे कटवाओ भाई

*अब तो मैच हाथ में है आज सोईयेगा नहीं

* गुरु नींद आ रही है

*सोना मत कुछ भी करो पर जगते रहो

* देखना कुछ तो चमत्कार ज़रुर होगा.

* अब बॉलिंग में मज़ा नही आ रहा

* ये रवि बोपारा अगर आउट हो गया तो समझिये मैच हमारी झोली में है..

*ये साला स्टुअर्ट ब्रॉड भी साला जमा हुआ है अब लगता है अब जीत मुश्किल है
* दोनों दिमाग से खेल रहे हैं.

* अरे इनको कोई आउट नही कर पा रहा अब हम सोने जा रहे हैं

* भाई एक बात तय करके मैं तो सो जाउंगा..कि अब से ये क्रिकेट सिरकेट देखना बन्द. फ़ुट्बॉल इससे अच्छा है कम से कम ९० मिनट में खत्म तो हो जाता है.

* भाई आपको भारत की हार मुबारक, मैं तो सोने जा रहा हूं.. वैसे भी मैं हार देख नहीं सकता..

*ये साला द्रविड़ बेहूदा कप्तान है...

* ल्ल्ल्ल्ल्ल गई भैंस पानी मॆं

* चलो सो जाते हैं साले रात खराब कर दिये.

भाई क्रिकेट एक ऐसा खेल है जो वाकई खेल भावना से देखो तो मज़ा है, नही तो सज़ा , तो भाई खेल देखो और खेल की धार देखो... .....ये ज़रूर है कि यहां खेल से बड़ा खिलाड़ी होता जा रहा है जो चिन्ता की बात है.. हां अगर कोई और खेल हो दिल लगाने का तो अवश्य बताएं.. अंगरेज़ों का खेल कह कर भागिये नहीं.....!!!!!!

Monday, August 27, 2007

झमाझम बरसात में !!


मुम्बई में झमाझम बरसात का आलम है. ज़माने पहले ऐसी बरसात में भीगने में मज़ा आता था, पर अब बहुत कुछ बदल गया है अब बरसात को खिड़कियों से या अपनी बालकनी से देखते हैं और इस बरसात का मज़ा लेते रहते हैं. बचपन में ऐसे मौसम में खूब धींगा मस्ती होती थी जो अभी भी हमें याद है. हम अपने दोस्तों के साथ बरसात के इंतज़ार में दौड़्कर छत पर या कहीं सड़क पर शुरू हो जाते और खूब ज़ोर ज़ोर से सम्वेत स्वर में जो गाते थे. उसी में ऐसा लगता कि जीवन तर गया हो.....
दो पैसा के हल्दी!
पानी बरसे जल्दी!!

पर आज मैं अपने मित्र अजय कुमार की कविता आपके लिये लेकर आया हूं अजय अपने को कवि भी मानते नहीं हैं पर अलग अलग मौकों पर वो कुछ ना कुछ लिख ही देते हैं और हम सुनकर वाह वाह भी करते हैं. ये कविता आज ही ताज़ा ताज़ा लिखी गई है. मेरे पास उनकी कोई फोटो भी नही है जो इस मौके पर लगा देता, लीजिये पेश है अजय कुमार की कविता ......

घिर आई घनघोर घटायें !
बैठा हूं तन्हाई में!!
कैसे तेरी याद न आये!
सावन की पुरवाई में!!
तेरी पायल छनक रही है!
या सावन की रिमझिम है!!
सौ प्यालों का नशा छुपा है!
तेरी इक अंगड़ाई में !!

Thursday, August 23, 2007

काहे की मुक्ति...

मुक्ति....मुक्ति.....मुक्ति...आखिर आदमी मुक्ति क्यों पाना चाहता है, किस चीज़ से मुक्त होना चाहता है.... शरीर से, समाज से, या इस पूरे ब्रम्हांड से... जब उसे पता ही नहीं कि कहां से आया है और जाना किधर है.. तो मुक्ति पाकर वो सिर्फ़ इस संसार से मुक्त होना चाहता अगरचे ये कहा जाय तो जीवन के इस झमेले से भागना चाहता है.. जहां नित नये रेले पेले में अपनी ज़िन्दगी गर्त में जाते देखता रहता है... पर अभी भी सही इलाज़ नही ढूढ पाया है. पर मेरा उद्देश्य यहां किसी मुक्ति की सुक्ति ढूढना कतई नही है, क्योंकि मेरे लिये भी ये सारी चीज़ें मगज में खाली पीली बूम मारने जैसा ही है...

अरे, आप इस दुनिया को समझना चाहते हैं तो पता नहीं कितने जन्म लें फिर भी समझ पाना मुश्किल ही है.. अगर आप समझ भी गये तो हमारा क्या भला होने वाला है? अपने उमर के आखिरी पल में आपको सत मिल भी गया तो किसी को क्या लेना देना......अब मेरे लिये भी इस विषय पर ज्ञान देना भारी पड़ रहा है.... असल में मेरा ये विषय भी तो नहीं है.... असल में मुझे पता भी नही कि किस क्षेत्र में मैं अच्छा दखल रखता हूं.. जीवन से मुझे क्या चाहिये बस ये.... कि मेरे पास सारी ऐशोआराम की चीज़ें हों..सिर पर कोई ज़िम्मेदारी न हो..बात करने के लिये ढेर सारे दोस्त हों..तो शायद ये दुनियां मुझे भी सुन्दर लगने लगे...मैं यहां से जाना ही ना चाहूं और रही बात मुक्ति की तो उसकी इच्छा भी न रहे... अरे, कुछ बात बन भी रही है कि मैं ऐसे ही लिखे जा रहा हूं?....

मन अजबजा गया हो तो इस पेज के सबसे नीचे मुक्ति को चट्काइये देखिये मुक्ति नाम की छोटी सी फ़िल्म जिसे बनाया है साथी गजराज ने..देख कर मन भारी हो जाय या आप खुल कर समाज पर हंसिये और सोचकर बताइये कि आखिर इन सब चीज़ो से मुक्ति मिलेगी की नही?.. या सब वैसे ही चलता रहेगा...

Monday, August 20, 2007

तो मुन्ना भाई को मिल गई जमानत


तो मुन्ना को जमानत मिल गई क्यों नही मिलती बताइये, अरे बताइये भाई, अरे आप नहीं जानते तो जान लें, पूरे घर की ज़िम्मेदारी भी तो मुन्नाभाई पर ही तो है ,साल में थोड़ी सी फ़िल्म मिल जाती है और किसी तरह से आठ दस करोड़ कमाकर घर का गुज़ारा चल जाता है..एक बहन है जो बहुत ही गरीब सांसद है, पिता भी अभिनेता और सांसद दोनों रह चुके ,वोअब इस दुनियां में नहीं हैं,बेटी है जो अमेरिका में है, एक कन्या है मान्यता कहते हैं मुन्नाभाई उससे शादी का इरादा रखते हैं,बताइये मुन्नाभाई कितने अच्छे आदमी हैं एक अच्छे इंसान होने के एवज में या यूं कहें सीबीआई की सहायता से न्यायालय से जमानत आखिर मुन्ना भाई को मिल ही गई..उसके पास से टुइयां सी एके ५७ ही तो मिली थी और कुछ ग्रेनेड मिले ,पर मुन्ना भाई तो ये सारा जखीरा, कहीं दंगा फ़साद ना हो जाय इसलिये बचाव के लिये रखे थे, एक दम निर्दोष हैं बेचारे हां, अगर यही काम किसी और ने किया तो वो देश द्रोही? सही है, सही है बेडू ,अपना हिन्दोस्तान सही जा रहा है .... अब कम से कम बेचारे प्रोड्युसरों का पैसा बर्बाद होने से तो बचा.. सबके साथ कितना न्याय करती है ये न्यायालय... खैर मनाईये कि मुन्ना के चक्कर मे कुछ लोगों को जमानत मिल गई... नही तो सब के सब पडे रहते जेल मे और पीस रहे होते चक्की का आटा...अच्छा है अच्छा है लगे रहो मुन्ना भाई...

Friday, August 10, 2007

आखिर आज़ादी का मतलब क्या है?

स्वतंत्रता दिवस की तैयारी में सरकार व्यस्त है, जनता अपने में बेहाल है। मस्त है। बाज़ार का सूचकांक चढ़ना उतरना बना हुआ है। झुग्गियों मे रह रही जनता जैस तैसे बरसात में जहां-जहां से छत टपक रही है वहाँ प्लास्टिक लगाती-चढ़ाती त्रस्त है। नौनिहाल अपने स्कूल के ड्रेस को धो रहे हैं, अपने सफेद जूतों में और खली लगाकर उसको चमकाने की जुगत में है। स्कूल का प्रिन्सिपल स्कूल के स्टोर से किसी बक्से के कोने मे पड़े तिरंगे को ढुढवा रहा है। मीडिया हमे टीवी पर बता रहा है कि दिल्ली विधान सभा मे एक आदमी कैटीन चला कर पांच हज़ार से ज़्यादा प्लाट खरीद लेता है, गाड़ि‍यां ऐसी जो मर्सिडिज़ से भी मंहगी है। उसका मालिक बना काफ़ी समय से इतरा रहा था, आखिरकार कानून के हाथ चढ़ा। नेताओं की खरीद-फ़रोख्त संसद और विधान सभा मे धड़ल्ले से हो रही है, इसी में कुछ हैं जो मुजरिमों को सज़ा पर सज़ा दिये जा रहे है। ऐसा लगता है कि सारी व्यवस्था मानो सही चल रही है। कुछ इस बात में शान देख रहे हैं तो कुछ को लगता है कि साम्प्रदायिक नेता और संसद और विधानसभा से जुड़े जननायकों के किस्से इन न्यायालयो की दीवारों मे दफ़न हैं। एक छोटा सा वर्ग है जो धन के अकूत, बडे हिस्से पर काबिज़ है, इसकी कभी सुध होती है कभी भूले रहते हैं, जो नहीं भूलते हैं वह यह कि अगस्‍त महीने में नियम से स्वंतन्त्र्ता की वर्षगांठ की तैयारी करने लगते हैं!

आखिर आज़ादी का मतलब क्या है?
तिरंगा ऐसा क्यों हो गया है जो सिर्फ़ क्रिकेट के मैदान में ही लहाराया जाता है, और हार हो तो मैदान से गायब, ऐसा क्यों? शहर के चौराहे पर गरीब बच्चा हाथ में छोटे-बड़े झन्डे बेच कर उस दिन की कमाई से किसी तरह अपना पेट पाल ले, ऐसा क्यों है? आज आज़ाद देश में ऐसा भी हो रहा है कि एक विकलांग अपनी छोटी सी मांग के पूरा नही होने पर आत्महत्या करने पर मजबूर है। ये कौन लोग हैं जो विकलागों को बेबस और मजबूर बना रहे हैं, ऐसा क्यों है? क्या हम इस सबके आदी हो गये हैं? सब चलता है इस वाक्य को हमने अपना ब्रम्ह: वाक्य बन जाने दिया है? और इसी ब्रह्म: वाक्‍य की छतरी के नीचे प्रेम से देशभक्ति का गीत भी गाते रहते हैं, और हमें शर्म भी नहीं लगती? आइए, फिर से गाने या रेंकने लगें: जहां डाल डाल सोने की चिडिया करती थी बसेरा ये भारत देश है मेरा ये भारत देश है मेरा....

Tuesday, July 31, 2007

मन बड़ा किनकिना रहा है!

अरे इस तरह गदहे-सी नौकरी कर-कर के तो उबिया गया हूं... संकट बड़ा विकट है मगर करें क्या?...

दिल बहलाने के लिये हम क्या नहीं किये! सब किये। पहले बचपन में पढाई के साथ लुक्का छिप्पी, गेंद तड़ी, इक्खट दुक्खट, सब खेल खेल के देख लिये। आखिर मन था पता नहीं उसे क्या क्या चाहिये! इनसे सबसे मन भर गया फिर आया ज़िन्दगी में क्रिकेट का मौसम। फास्ट बौलर से स्पिनर बन गये क्योकि दाल भात भुजिया खाके क्रिक्रेट और वो भी फ़ास्ट बालर? बहुत बाद में दिमाग में घुसा कि ये तो कभी हो ही नही पायेगा... पर तब तक स्कूल में ड्रामा में पार्ट लेना शुरु किया तो लगा हां, ये है जिसकी हमको तलाश थी... पर ये भी कुछ दिन का ही मेहमान रहा.. घर में किसी को पसन्द नहीं था। कहा गया कि अब ये हाल कि बेटा हमारा भांड़ बनेगा? किसी को मंज़ूर नही था तो फिर यहां से भी मन भटक गया। अब तो पढाई ही माता और पढाई ही पिता...

पर आदमी कभी जानता है कि ज़िन्दगी कहां लिये जा रही है? मुकद्दर को कुछ और ही मंज़ूर था... जब घर से थोड़ा अलग जाके मौका मिला खूब धान के नाटक, नौटंकी शुरू! ये सिलसिला लंबा चला... पर भाई ये मन है कि कहीं रमे-टिके तब ना? माने ही नहीं... तो एक दिन ये सब भी हाथ से धीरे-धीरे छूटता गया और चुपचाप पकड़ी नौकरी, दो जून के भोजन की व्यवस्था हो गई और यही से शुरू हुआ बंटाधार! अब क्या बताएं जो नही करना था वो करना पडा और धीरे धीरे अब हम परिवारजीवी हो गये!

अब हमारी एक बेटी है और हम भी उससे वही उम्मीद पाले हुए हैं जो एक समय हमारे माता-पिता ने हमसे पाल रखी थी! हम तो इधर उधर भटकते हुए नौकरीपेशा आदमी हो गये पर अब वही चिन्ता बनी हुई है कि हमारी बिटीया वही करेगी जो हम सोचेंगे? जब देखो टीवी देखती रहती है। हमेशा खेलना-खेलना... ये कोई जीवन है? ठीक से पढो, अच्छे बच्चे बनो! इतना खेलना-वेलना अब ठीक नही है तुम्हारे लिये! चलो, निकालो किताब और अपना होमवर्क पूरा करो...

फिर देखते है कि वाकई दिल लगा के पढ़ रही है... या हमें दिखा दिखा कर पढने का नाटक कर रही है? मन बड़ा किनकिना रहा है! कभी चैन मिलेगा कि नहीं?

Friday, July 27, 2007

ऐसे तो न सोओ

नाक से जो ध्वनि निकलती है हमारी तरफ़ उसे खर्राटा कहते हैं। ये खर्राटे तरह-तरह के होते हैं- इसका नज़ारा रात में देखते ही बनता है। आपको नज़दीक से देखना है तो किसी सूनसान रेलवे स्टेशन के प्लेट्फ़ार्म या किसी रेलवे के विश्राम ग्रृह में या किसी शादी में थककर सोती पूरी की पूरी बारात... इन सब जगहों पर खर्राटे की अलग-अलग झांकियां आपको देखने को मिल जाएंगी। सफ़र मे बस, ट्रेन या कार में भी आपको खर्राटे लेने वाली अलग-अलग किस्‍म की श्रेणियां आपको देखने को मिल जायेंगी...

फिर कभी ये भी होता है कि यह घटना आपही के साथ घटित हो तो आप चकित रह जाते हैं। एक घटना बताऊं क्या हुआ कि मित्रो के साथ बस में कही घूमने जा रहे थे... गन्तव्य तक बस को चार से पांच घण्टे मे पहुंचना था। बस भी बड़ी आरामदेह थी.. कुछ ही पलों मे नींद पलकों पर सवार... कब सोया पता ही नही चला। बगल मे बैठे मित्र ने कुहनी मार के जगाया और कहा "बहुत तेज़ खर्रटा है आपका" मैं सोचने लगा कि घर में छोटी सी खटकन से नींद टूट जाती है और ये कह रहे हैं "खर्राटा बहुत तेज़ है तुम्हारा"... इस बात पर चकित था कि आज तक मैने तो अपने आप को खर्राटे भरते देखा ही नही और इन्होने देख लिया ये कैसे हो सकता है? तभी किसी ने अपना मोबाइल फ़ोन निकाला और उसका वीडियो ऑन कर दिया जो मैने दृश्‍य देखा तो बड़ी शर्मिदगी महसूस हुई। वीडियो मे जो मैने देखा कि मेरा मुंह अजीब तरीके से खुला हुआ है जाती-आती सांस से अलग-अलग ध्वनियां निकल रही है और मै चैन से सो रहा हूं। उस सीन को देख कर ये पता चला कि दूसरों के खर्राटे पर मज़ाक बनाने वाला खुद भी खर्राटा लेता है... वह भी ऐसा? वीभत्स रस हो जैसे.. वाकई मुझे ये तो आजतक पता ही नहीं था कि मै भी सोते समय खर्राटे भरता हूं... वो भी भर्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र... शिट्त्त्त्त्त्त!!!

जागते रहो सोनेवालो!

तो भाई न्यूज़ चैनल को लेकर मोहल्ला पर तो गरमा गर्म बहस चल ही रही थी... अब देख रहे हैं ताज़ा-ताज़ा अनामदास जी भी उसी बहस को गरमाने में लगे हुए हैं। यहां इन सब की बातो पर सहमति- असहमति का मुद्दा मेरे लिये नहीं है... मेरी चिन्ता तो मनोरंजन चैनल में जो-जो दिखाया जाता है उसके बारे में दो-एक बात अलग से जोड़ने भर की है... रोज़ जो दिखता है, उसे देख कर तो यही लगता है कि सारे फसाद की जड़ औरते ही हैं। घर में सज-धज कर घर तोड़ने की योजना बनाते रहते से अलग जीवन की और कोई योजना इनके पास नहीं है। घर बैठ कर ये सब अपनी डाल कमज़ोर करने पर तुली रहती हैं और इन सब की नेता हैं एकता कपूर। इन स्थितियों को देखकर लगता है कि आने वाले दिनों में इस देश के जितनी भाभियां, देवरानियां, चाचा, ताऊ, बूआ, मौसी, मामा कहीं मुंह छिपाते घर के किसी कोने में पडे रहेंगे... उन्हें शर्म आयेगी जब उन्हे इन नामो से बुलाया जायेगा! जितने भी चैनल है उन सब का शीर्षक देखियेगा तो समझ में आ जायेगा कि सीरियल का नाम चुनने में इनकी प्रतियोगिता आजकल फ़ैशन में चढ़े भोजपुरी फिल्मों से है। मर्द बेचारा ऐसा जैसे कि नामर्द, सारी चीज़े उसकी आंखो के सामने घटित हो रही होती हैं और वो खामोश लुंजपुंज हाथ-पैर हिलाने, कुछ करने-धरने में पूरी तरह, बुरी तरह फेलियर।

वैसे इधर स्थिति थोड़ी बदली भी है... एकता कपूर का साम्राज्य थोड़ा लड़खड़ाया है। उनके नये प्रयोग सफ़ल होते दीख नहीं र्हे। इस मामले मे प्राइम टाइम बैंड ज़ी टीवी स्टार टीवी के बनिस्पत मजबूत दिखाई दे रहा है। पर वो भी वही सब कर रहा है जॊ एकता कपूर पहले कर चुकी है। न्यूज़ चैनल पर लिखने वाले लिख रहे हैं पर जिन चैनलों के पास ज़्यादा दर्शक हैं उनका भी हाल न्यूज़ चैनल से बहुत बेहतर नहीं है। भाई, यह ऐसी दुखती नस है कि इस पर लगातार हल्‍ला मचाये रखने की ज़रूरत है। मगर ये भी जानता हूं कि आप हमारा लिखा पढ़कर पतली गली से सरक लेंगे... चैनलवालों को उनकी मनमानी करते रहने देंगे? अपना मुंह खोलिये, कुछ तो बोलिये... एक शेर सुना कर अपनी बात पर विराम लगाना चाहुंगा:

सुबह होती है शाम होती है!
उम्र यूं ही तमाम होती है!!
और जिन्हें पं. छ्न्नूलालजी और राशिद खान को सुनना है वो इस पेज़ के एकदम नीचे चले जायें.. आनन्‍द ही आनन्द आयेगा.

हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में मुनीर नियाज़ी हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात क...