Thursday, December 25, 2008

सुनना है तो इसे सुनें..फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की गलियों के आवारा कुत्ते

आज कुछ अलग सा सुनाने को मन है,एक समय था जब जनवादी गीतों को गाने वाले ग्रुप बहुत थे,अगर वो कभी कैसेट या सीडी निकाल भी लेते तो सही तरह से डिस्ट्रीब्यूट कर नहीं पाते थे..और ज़्यादा लोग उसे सुन भी नहीं पाते थे।जब इलाहाबाद में था तब हमने बिगुल नाम से जनवादी गीतों का कैसेट रिलीज़ किया था पर आज वो हमारे पास नहीं है शायद इरफ़ानजी के पास हो कह नहीं सकता,उन गीतों की मिक्सिंग अच्छी नहीं हो पाई थी,शायद इसलिये भी उसे हम सहेज के रख नहीं पाये हों कारण चाहे जो हो,पर जनगीतों में बहुत से प्रयास अतीत में हुए तो हैं पर लोगों के सामने सही तरह से नहीं आ पाये हैं, पंजाब गुरूशरण सिंह के ग्रुप का जो भी गीत सुना मैने मैं तो मुरीद हो गया उनका....गज़ब का कोरस और खुली आवाज़ एक दम मन तक पहुँचते थे वो गीत, पर कैसेट कभी मिला नहीं.....किसी के पास हो तो हमें बताए ,पटना हिरावल के साथियों ने भी बहुत से गीत गाये हैं पर उन्हें भी बहुत से लोगों ने सुना नहीं है।दिल्ली में हमने एक्ट वन के बैनर तले एक कैसेट निकाला था "हमारे दौर में" उसका इन्ट्रो नसीरूद्दीन साहब ने किया था,संगीत पियूष मिश्रा ने दिया था वो कैसेट भी कहीं धूल खा रहा होगा...पर प्रयास बहुत अच्छा था।

अभी पिछले दिनों समकालीन जनमत पर मैने कुछ गीत सुने सुनकर लगा कि अभी भी कुछ लोग तो हैं जो अपने आस पास की दुनियाँ कैसी है चेताते रहते हैं,,मुक्तिबोध का "अंधेरे में " और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का "कुत्ते" मैने सुना सुनकर , मैने झटपट छाप लिया अपने मोबाइल में मैने डाउनलोड करके बहुतों को सुनाया, "अंधेरे में " को सुनकर मेरा ये हाल था कि मैं गेटवे ऑफ़ इंडिया की प्रोटेस्ट गेदरिंग में शामिल हुआ,कुछ दिनों पहले मेरे मित्र उदय जिनके साथ मैने लम्बे समय तक रंगकर्म किया था उनके साथ अंकुर भी था जिसे मैने गोद में खिलाया भी है अब बड़ा हो गया है,ग्रैफ़िक आर्टिस्ट बन गया है,उनको देखकर मेरा उत्साह जागा और मैने उन गीतों को उन्हे सुनवाया आश्चर्य तो मुझे तब हुआ जब मुझे ये पता चला कि इन गीतों में कला कम्यून के अंकुर, बंटू और उनक्ले साथियों ने आवाज़ दी है,जिन्हें मैं एक अरसे से जानता था,और ये बात मुझे पता नहीं थी अंकुर से पता चला कि इन रचनाओं की धुन संतोष झा ने दी है, तो आज आप जिस रचना को सुनने जा रहे हैं संगीत संतोष झा ने दिया है..ये रचना फ़ैज़ साहब की है।

कुत्ते

ये गलियों के आवारह बेकार कुत्ते
के बख्शा गया जिनको ज़ौक़-ऐ-गदाई
ज़माने की फटकार सरमाया उन का
जहाँ भर की दुत्कार उन की कमाई ।

न आराम शब् को न राहत सबेरे,
गलाज़त में घर नालियों में बसेरे
जो बिगडें तो एक दूसरे से लड़ा दो
ज़रा एक रोटी का टुकड़ा दिखा दो

ये हर एक की ठोकरें खाने वाले
ये फ़ाकों से उकता के मर जाने वाले
ये मज़लूम मख्लूक़ गर सर उठाएँ
तो इंसान सब सरकशी भूल जाए

ये चाहें तो दुनिया को अपना बनालें
ये आक़ाओं की हड्डियाँ तक चबा लें
कोई इन को अहसास-ऐ-ज़िल्लत दिखा दे
कोई इन की सोई हुई दुम हिला दे.

galiyon ke awaara kutte.mp3 - Ankur and mandali.....music by santosh jha

Wednesday, December 24, 2008

१०८ है चैनल, फिर दिल बहलते क्यौं नहीं?

ये रचना नेट के माध्यम से मुझ तक पहुँची थी...मेरे मित्र अजय कुमार ने कुछ शब्दों में हेर फेर भी किया है..फिर भी कुछ कमियाँ ज़रूर हैं,ये किसकी रचना है मुझे मालूम नहीं। अब आप ही पढ़ें और बताएं कैसी है?


शहर की इस दौड़ में दौड़ के करना क्या है?
जब यही जीना है दोस्तों तो फिर मरना क्या है?

पहली बारिश में लेट होने की फ़िकर है
भूल गये बारिश में भीगकर टहलना क्या है?
सीरियल के किरदारों का सारा हाल है मालूम
पर माँ का हाल पूछने की फ़ुर्सत कहाँ है

अब रेत पे नंगे पाँव टहलते क्यौं नहीं?
१०८ है चैनल फिर दिल बहलते क्यौं नहीं?
इनटरनेट की दुनियाँ के तो टच में हैं,
लेकिन पड़ोस में कौन रहता है जानते तक नहीं

मोबाईल, लैन्डलाईन,सब की भरमार है,
लेकिन जिगरी दोस्त के दिलों तक पहुँचते क्यौ नहीं?
कब डूबते हुए सूरज को देखा था याद है?
सुबह- सुबह धूप में नहाये ये याद है

तो दोस्त शहर की इस दौड़ में दौड़ के करना क्या है?
जब यही जीना है तो फिर मरना क्या है?

Monday, December 22, 2008

अपने प्रियतम शहर इलाहाबाद की एक खूबसूरत सुबह.......भाग -2

आपकी बधाईयाँ मिंकी तक पहुंच चुकी हैं,कुछ तस्वीरें मिंकी के पास और थीं कुछ तस्वीरें जो मेरे मन को भा गई तो आप भी देखिये क्या नज़ारा है, पिछले पोस्ट में आपके उत्साह को देखते हुए मैं आपको एक बार फिर से संगम से रूबरू करवा रहा हूँ,वैसे सीगल ने तो संगम पर अपना कब्ज़ा जमा रखा है वो तो इन तस्वीरों को देखकर पता ही चल रहा है....पर सुबहे प्रयाग का जवाब नहीं!ये तो आप ज़रुर कह ही उठेंगे....










Sunday, December 21, 2008

अपने प्रियतम शहर इलाहाबाद की एक खूबसूरत सुबह......

अब साल २००८ अलविदा कहने को है....नये साल का आगमन होने को है...२००९ सबके लिये खुशियाँ लेकर आये अपनी तो यही चाहत है......अभी कुछ तस्वीरें इलाहाबाद की देखकर मन फ़्लैशबैक में डूब गया...इलाहाबाद से दूर रहकर इन तस्वीरों को देखना मेरे लिये एक सुखद एहसास है...कुछ गीत संगीत सुनवाना चाहता था पर आज इन तस्वीरों से काम चलाना होगा मेरा प्रियतम शहर इलाहाबाद आज मुझे बहुत याद आ रहा है.....बहुत कुछ दिया है इस शहर ने ऐसे भी मैं इसे याद करना चाहता हूँ.......इन तस्वीरों को मेरी भांजी मिंकी ने अपने कैमरे में कैद किया । तस्वीरें इलाहाबाद संगम की हैं....





href="http://2.bp.blogspot.com/_3MSltvTsPRY/SU5xgFCtaGI/AAAAAAAAAho/tmjNU5eAKHs/s1600-h/IMG_0654.JPG">

Thursday, December 4, 2008

बच्चों को सिखाना !

आज मैं अपने मित्र अजय कुमार की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ,और इस रचना को लिखते हुए अजय कहते है" विगत दिनों के आतंकी हमलों ने ऐसा कहने पर मजबूर कर दिया इसलिये मैं बुज़ुर्गों,बच्चों, और अभिभावकों से माफ़ी चाहता हूँ"




अब अपने नन्हें-बच्चों को पाठ विनम्रता का न पढ़ाना !
आने वाले कल की ख़ातिर सत्य -अहिंसा नहीं सिखाना !!

जब नेता हों चोर -उचक्के ऐसे मंज़र रोज़ ही होंगे,
अपनों में गद्दार छुपे हों दिल पर खंज़र रोज़ ही होंगे !
रोज़ ही होगा देश में मातम,ख़ूँ के समन्दर रोज़ ही होंगे
चोट लगे तो रोने देना ,गोद में लेकर मत बहलाना !!

आने वाले कल की खा़तिर सत्य - अहिंसा नहीं सिखाना

झूठ बोलना,फूट डालना,जगह जगह दंगे करवाना !
उसे पढ़ाना पाठ घृणा का ,सिखलाना नफ़रत फ़ैलाना !!
सिखलाना कटु शब्द बोलना ,मजहब की दीवार बनाना !
नहीं प्यार की थपकी देना,लोरी गाकर नहीं सुलाना !!

आने वाले कल की खा़तिर सत्य - अहिंसा नहीं सिखाना

कर डाले जो देश का सौदा,ऐसा सौदेबाज़ बनाना !
धर्म की ख़ातिर कत्ल करा दे,धर्म का धंधेबाज़ बनाना !!
उसका कोमल ह्रदय कुचलकर,पत्थर दिल यमराज बनाना !
लाकर मत गुब्बारे देना,हाथी बनकर नहीं घुमाना !!

आने वाले कल की खा़तिर सत्य अहिंसा नहीं सिखाना

ना भागे तितली के पीछे, किसी पार्क में नहीं घुमाना !
नहीं खेलने जाने देना ,उसे खिलौने नहीं दिलाना !!
मीठी बातें कभी न करना, परीकथाएं नहीं सुनाना !
ख़ूँन के मंज़र जब दिख जाएं,आँख हाथ से नहीं दबाना !!

आने वाले कल की ख़ातिर सत्य अहिंसा नहीं सिखाना

अजय कुमार

Tuesday, November 11, 2008

उनकी आवाज़ का जादू गज़ब है, पंडित छन्नू लालजी सबसे अलग हैं !!

पंडित छन्नू लाल मिश्र जी की आवाज़ के बारे बहुत कुछ लिखा जा चुका है, यूनुस जी ने अपने ब्लॉग पर उनके बारे में बड़े तफ़्सील से लिखा था, ,मैने भी उनके बारे लिखा था, पर उस समय तकनीकी मामले में अपना मामला थोड़ा कमज़ोर था तो सिर्फ़ एक पोस्ट ही लिख पाया था, पंडितजी की मधुर आवाज़ नहीं सुनवापाने का आज तक अफ़सोस है ,और बहुत दिनों से ये भी मेरे दिल में तीर की तरह चुभ रहा था कि पंडित जी की आवाज़ को अगर अपनी ठुमरी में शामिल नही किया तो अपनी ये ठुमरी अधूरी ही रह जाएगी....तो आज कुछ ऐसा करने की सोच रहा हूँ कि और भी मित्रों ने पंडितजी पर पोस्ट लिखी हो उसका भी लिंक इधर देता चलूँ कि एक ही जगह पंडितजी की ज़्यादा से ज़्यादा रचना आप सुन सकें....आपका जब भी मन करे इस पोस्ट को खोल कर पंडितजी की रचनाएं तसल्ली से सुन सकते हैं,अपने अविनाश जी के ब्लॉग दिल्ली दरभंगा छोटी लाईन पर भी आपने उन्हें सुना है,भाई युनूस के ब्लॉग रेडियोवाणी पर पंडित जी पर बहुत बढ़िया पोस्ट चढ़ाई थी उसका भी लिंक यहाँ देना ज़रूरी समझा,आज ठुमरी पर उनकी रचनाओं को आप तक पहुँचाने में एक अलग सा मज़ा मिल रहा है, उनकी तारीफ़ में लिखना कुछ लिखना मुझे बहुत यांत्रिक सा लगेगा बस इतना कि जब पंडितजी गाते गाते समझा रहे हों वो अदा भी मन में अंकित हो ही जाता है...............भोजपूरी अंचल का रस उनकी आवाज़ में है,खांटी गऊँठी आवाज़ जिसकी मिट्टी ही अलग किस्म की है आपके कानों तक पहुंचकर सुकून देते है, तो लीजिये रस पंडित छन्नू लाल जी की मधुर आवाज का....
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Friday, November 7, 2008

सभी मनोरंजन चैनल का फ़ैसला, नहीं दिखाएंगे नये कार्यक्रम सोमवार से...



पूरी दुनियाँ आर्थिक मंदी के दौर से गुज़र रही है,अपना देश भी इससे अछूता नही था पर टी वी देखने वाले दर्शकों को इस सोमवार पुराने प्रोग्राम देखकर ही संतोष करना होगा,हां भाई सारे मनोरंजन चैनल सोमवार से हड़तात पर जा रहे हैं,

पिछले कुछ दिनों से छोटे पर्दे की दुनियाँ में थोड़ी खटास सी आ गई है,मुद्दा पैसा है सभी तकनीशियन चाहते हैं कि उनका मेहताना बढ़ाया जाय पर, पर चैनल उनकी कोई भी मांग मानने को तैयार नहीं है और टेलीविज़न इंडस्ट्री से जुड़ी २२ यूनिय्नें भी झुकने को तैयार नहीं हैं, इसके फलस्वरूप सभी मनोरंजन चैनलों ने सामुहिक रूप से फ़ैसला लिया है कि सोमवार से उनके चैनल पर किसी भी सीरियल की नई कड़ियाँ प्रसारित नहीं होंगी,जब तक गतिरोध समाप्त नहीं हो जाता दर्शकों को पुराने कार्यक्रमों के रिपीट को देखकर ही संतोष करना होगा, शायद इस बार दर्शकों को नये कार्यक्रमों की झलक पाने के लिये थोड़ा ज़्यादा इंतज़ार करना होगा,सूचना ये है कि बिग बाँस के अलावा कोई भी चैनल अपने किसी भी कार्यक्रम की नई कड़ियाँ प्रसारित नहीं करेगा।

अगर आप और जानना चाहते हों तो यहाँ क्लिक करके जानकारी ले सकते हैं

Monday, November 3, 2008

आज सुनते हैं एक दादरा सुदीप बनर्जी से .....



आज आपको एक दादरा सुनाते हैं,आवाज़ सुदीप बनर्जी की है, वैसे सुदीप जी को यहां मुम्बई में कई बार सुन चुका हूँ, वैसे भी हमेशा मेरी ख्वाहिश रही है..जब भी कुछ संगीत गायन आदि को लेकर कोई बैठकी हो तो बड़ी सी जगह में खूब गद्दे वद्दे बिछे हों, गाव तकिये लगे हों,और आप सामने से बड़ी तबियत से दाद दे रहे हों और महफ़िल में कम से कम हर शक्स एक दूसरे को जानता हो तो उस महफ़िल की बात ही कुछ और होती है,ऐसे ही किसी दिन अपने मित्र संदीप को सुनने के लिये हम गद्दा बिछा कर इंतज़ार कर रहे थे ..जब तक संदीप नहीं आए तब तक मुझे ही गाना पड़ा लोग मजबूरी में वाह वाह कर रहे थे,और संदीप मियां जब आए तो अपने साथ सुदीप को लेते आये,वैसे संदीप भी अच्छा गायक है..पर उस दिन हमने पहली बार सुदीप को सुना और मस्त हो गये...बाद में पता चला भाई ये तो प्रोफ़ेशनल हैं और शान्ति हीरानन्द जी के चेले हैं और उन्हीं से पता चला कि शान्ति हीरानन्द की गुरु बेग़म अख्तर
रहीं है, तो रात भर हम सुनते रहे सुदीप और संदीप को ......सुदीप बनर्जी की आवाज़ मैने दूरदर्शन पर सुनी थी..॥

सीडी पर भी मैने सुदीप की आवाज़ सुनी....पर सुदीप की आवाज़ का जादू जब आप उन्हें सामने से सुनें तभी रस देगा....कुछ आवाज़े होती है जो माइक पर एकदम भिन्न हो जाती हैं,वैसे मेरी भी आवाज़ माइक पर आते ही बदल जाती है जो मुझे पसन्द नहीं है...पर आपको सुदीप का ये अंदाज़ ज़रूर पसन्द आएगा।

ये दादरा है जो किसी संगीत महफ़िल में सुदीप जी ने गाया था उनका परिचय भी आपको उन्हें सुनते हुए मिल जाएगा...मेरे पास एक रचना और है जिसे सुदीप ने गाया है पर वो मैं अभी नही बाद में सुनवाउंगा अभी तो आप इसे सुनें।

Saturday, October 25, 2008

ये कैसी दुनियाँ है.........मन बौरा रहा है

अजीब सी बात है......कि हम संगीत में डूबे रहे.....और इस बीच किसी परिवार ने बहत्तर क्रेडिट कार्ड रखने के बाद भी जीवन लीला समाप्त कर ली ........घर में चार सदस्य थे और सुबह का सूरज देख नही पाये, ये घटना मुम्बई के बोरीवली की है..... हम संगीत सुनते रहे... और इस बीच टाटा ने अपनी नैनों को बंगाल से सरका के गुजरात पहुंचा दी ममता बनर्जी और कम्युनिस्ट हाथ मलते रहे और मोदी गदगद है पर हम हैं कि संगीत सुनते है रहे.. .. इस बीच दुनियाँ में अपनी ही धौंस मे रह रहे अमरीका के बैंक दीवालिया होने लगे...चरमरा गई बुश की अर्थव्यवस्था........खुद तो डूब ही रहे थे ...पर दुनियाँ में जल्दी से धन पाने की होड़ मे लगे लोगों को इस मंदी से तेज़ का झटका लगा रहे हैं और हम हैं कि संगीत में खोये हैं .....बैंक से कर्ज़ ले के हमने भी बनाया था अपना आशियाना,घर का कागज़ बैंक के पास पड़ा है..जब तक कर्ज़ चुका नहीं देता तब तक बैंक के पास मेरा आशियाना रहेगा गिरवी, अब हालत ये है कि हम भी ब्याज के कम होने होने की राह देख रहे हैं इस दर्द से छुटकारा पाने के लिये संगीत सुन रहे हैं ।

मैं अपनी ठुमरी पर कोई भी पोस्ट चढ़ाते समय यही सोचता था कि दुनियाँ में कितना दर्द है.......कभी उड़ीसा में कोई मरता है धर्म के नाम पर तो मुम्बई भी कम है क्या इलाक़े के नाम पर हो रही है मार.....बच्चों कॊ पीटा गया....टैक्सी,ऑटो, और कमज़ोर लोगों पर की गई ज़ोर आज़माईश ..कलेजे में ये खबर बरछी की तरह धंस गई..........हम लाचार है.......क्या कर सकते हैं ?कुछ नहीं, अफ़सोस प्रकट करने और अपना गुस्सा ज़ाहिर करने के सिवाय हम कुछ नहीं कर सकते..... अभी मुम्बई में पिछले दिनों गणपति महोत्सव में बड़ी बड़ी गणेश की मूर्तियाँ दिखी.....खूब जश्न का माहौल था आस पास मोहल्ले खूब गुलज़ार थे गणपति के ख्त्म होने पर लाल बाग के राजा के पंडाल में शुरू हुआ चढा़वे का मुल्यांकन...किसी भक्त ने सोना चढ़ाया तो किसी ने डॉलर..किसी ने रूपया.....किसी ने गहना...इन सब का मुल्यांकन करोड़ो में आंका गया लगता ही नहीं कि हम एक गरीब देश हैं ...
अब आ रही है दीवाली और आर्थिक मंदी की मार अजीब सी है.....अब देखना है कैसी बीतती है दिवाली........लेकिन कुछ घटना जो अभी जुमा जुमा गुज़रीं हैं ......अभी कुछ ही दिनों की तो बात है जब आदमी उमरदार हो जाता था तो मालिक लोग वीआरएस देकर लोगों को घर बिठा देते थे पर इसका क्या करें कि जुमा जुमा जिन्हें एक साल भी नहीं हुए थे नौकरी किये...उनके लिये जेट ने एलान कर दिया कि भाई आप लोग जाँय...हम पचा नहीं पा रहे ..थोड़ा दबाब बना और सब लोग वापस..पर अबकी बार तनख्वाह में कटौती की शर्तों को मानकर फिर से बेचारे लोगों ने हवाई जहाज में उड़ना मंज़ूर कर लिया ......

वैसे भी संस्थाओं में हर कुछ महीने में दो चार की छटनी तो हो ही जाती है और अब इस आर्थिक मंदी के दौर में हम पर अब बिजली गिरने वाली है अब इतने बड़े आर्थिक संकट से मैं अकेले लड़ भी तो नहीं सकता ...तो अब आप ही बताइये कि संगीत सुनने के अलावा और क्या चारा है?

कभी कभी आपको लगता होगा कि दुनियाँ में इतनी सारी घटनाएं घट रही है..पर विमल लाल की ठुमरी पर इसका रंच मात्र भी प्रभाव नहीं पड़ता, तो शायद आप मुगालते में है..कभी अपने पुराने दिनों को याद करता हूं... जब मैं दिल्ली में था इलाहाबाद और आज़मगढ़ मे था पर यहाँ दिल्ली की एक घटना याद आ रही है....एक आयोजन हमने किया उसका नाम हमने रखा "हमारे दौर में" ये वो समय था जब अडवानी रथ पर सवार थे और जब उतरे तो एक कांड हो गया जो आज भी लोगों को याद है..राम जन्म भूमि- बाबरी मस्जिद विवाद और इसके विरोध में हम नाटक करते करते हमारी नाटक मंडली अछूती रह न पायी और धीरे धीरे नाटक करते करते हम गीत रचने और और गाने लगे और गाते गाते हम सड़क पर कब आ गये ये पता ही नहीं चला पर लगता है पर तब की बात और थी... .आज बात ही कुछ और है अब हमारे पास खोने के लिये मेरी माँ है बीवी है मेरी बिटिया है, एक दम टिपिकल निम्न मध्यवर्ग टाइप हम हो गये है ........तो अब करें क्या, अब तो हमारे पास संगीत सुनने के अलावा कोई चारा भी तो नही है......दुनियाँ जैसी पहले थी वैसी आज तो नहीं है..वैसे ही संगीत जो पहले था आज नहीं हैं....हम भी पहले जैसे थे वैसे नहीं है .सब कुछ बदल गया है...पर इस बदले हुए रूप में भी हम अपने लिये मोती तलाशते रहते हैं....एक शेर याद आ रहा है मालूम नही ये किसका शेर है आज पता नहीं क्यों याद आ रहा है.....इस शेर को मैने पहली बार अपने अभय तिवारी जब इलाहाबाद के डीजे हास्टल में रहा करते थे तो उनके कमरे की दिवार पर मैने लिखा देखा था


ये सर्द रात ये आवारगी ये नींद का बोझ

अपना शहर होता तो घर गये होते

इसी बात पर कुछ जोड़कर लाया हूँ आपके लिये, अगर अच्छा न लगे तो भी अगली बार ज़रूर आईयेगा शायद कुछ अलग सा लगे पर आईयेगा ज़रूर

आज पंकज अवस्थी की कुछ रचनाएं खास आपके लिये ही लेकर आया हूँ पंकज की आवाज़ तो खांटी है ही और सुर का चढ़ाव उतार भी मस्त है.... पंकज अवस्थी उभरते हुए संगीतकार हैं,गाते हैं और संगीत भी देते हैं..भाई हम इनके उज्वल भविष्य की कामना करते हुए इन्हे सुने ज़्यादा मज़ा आयेगा..ये गाने फ़िल्म अनवर से हैं पर मुम्बईया गानों से अलहदा लगते है। ऊपर पंकज के लिंक दिये हैं उसे भी चटका लगा के पंकज के बारे में कुछ और जान सकते है।

तोरे बिन जियरा ना लागे.......



दिलबर मेरा दूर हुआ......


इस गाने को अभी भी समझने की कोशिश कर रहा हूँ अगर आप समझ रहे हों तो बताते जाँय


माफ़ी चाहता हूँ....कोई भी प्लेयर काम शायद कर नहीं रहा तो ऐसी स्थिति में पंकज पर क्लिक करें और वहां भी पंकज को आप सुन सकते हैं.....आपको असुविधा हुई उसका वाकई मुझे खेद है....

Sunday, October 12, 2008

एक आवाज़ अमानत अली साहब की.......

संगीत अकेलेपन का साथी है...और साथ साथ दोस्तों की महफ़िल में संगीत की बैठकी हो तो पूरा का पूरा हुजूम थिरक रहा होता है या अकेले हों तो भी संगीत आपका अच्छा साथी होता ही है,पर इधर बहुत दिनों से कुछ नया सुना भी नहीं है...और अब लगता है गुलाम अली,मेंहदी हसन,लता जी जगजीत सिंह, नैयरा नूर मुन्नी बेगम आदि जितना पहले हमारे करीब थे उतना ही करीब आज भी हैं,मौके बे मौके हम तो इन्हें सुन ही लेते है,अगर मैं ग़लत नहीं हूँ तो आज जो आवाज़ आप सुनेंगे वो आवाज़ अमानत अली खान साहब की है.....इसे सुने आपको भी अच्छा लगेगा...



अभी तो आपने इन्हें सुन लिया पर अगली बार आपको कुछ नई आवाज़ें जिन्हें मैं पसन्द करता हूं,वादा करता हूँ जल्दी ही आपको सुनवाउंगा...

Sunday, September 21, 2008

उम्र जलवों में बसर हो ये ज़रूरी तो नहीं........

कभी कभी ऐसा होता है कि बहुत पहले कही गई बातों का अर्थ वाकई कई बरसों बाद समझ में आता है...अब ये बात उठेगी कि इसमें कौन सी नई बात है....तो वाकई कुछ भी नई बात तो है नहीं...पर जैसे एक कहानी थी खरगोश और शेर की जिस कहानी के अंत में उस चतुर खरगोश ने भयावह शेर को कूंए में झांकवा दिया था...और शेर ने जब कूंए में अपना ही अक्स देखा तो उसे लगा कि कोई मुझसे बड़ा राजा हो कैसे सकता है और शेर ने कूंए में छलांग मार दी और सभी खरगोश खुशी खुशी रहने लगे.......कुल मिलाकर हम कभी बहुत उदास हो जाते हैं तो कभी दिन बहुत अच्छा बीत जाता है...कभी कहीं बम फटता है कुछ लोगों की दुनियां तबाह हो जाती है ...फिर भी ये दुनियाँ है जो चलती रहती है..हम नहीं थे तो भी दुनियाँ चल रही थी आज भी हम रहें या ना रहे दुनियाँ चलती रहेगी.....

बस हम अपनी रहती ज़िन्दगी में थोड़ी बहुत कोशिश करते रहते हैं कि हमारे आस पास की दुनियाँ जैसे हम चाहते हैं वैसे ही हो... पर ऐसा होता कहां है....


शेख़ करता तो है मस्ज़िद में ख़ुदा को सज़दे

उसके सज़दों में असर हो ये ज़रूरी तो नहीं..
.....असल में कहना तो बहुत चाहता हूँ पर बात निकलते निकले भटक सी जाती है....अपनी बातें फिर कभी कहने की कोशिश करुंगा अभी आप सुनिये जगजीत सिंह साहब से...उम्र जलवों में बसर हो ये ज़रूरी तो नहीं हर शबे ग़म की सहर हो ये ज़रूरी तो नहीं........

Saturday, September 6, 2008

मेरे लिये तो मानसिक आहार है ये ब्लॉग!

सोचा था कुछ गीत गज़ल ठुमरी सुनवाता, मुझे भी मज़ा आता और आप भी मज़े लेते.....अपने पिछले पोस्ट को देखता हूँ तो मेरे दिमाग में एक बात ज़रूर आती है कि आखिर मैं कर क्या रहा था आज तक...तो पता चला कि पुराने गीत गज़ल ठुमरी,नज़्म और फ़्यूज़न टाईप कुछ रचनाएं सुनवाकर मैं अपने काम पर लग गया....भाई घर चलाना है कि नहीं?इधर काम का बोझ सर पर इतना आ गया है कि ना दिन में चैन है ना रात में आराम...........अपने दफ़्तर में इन गतिविधियों पर रोक लगी हुई है...तो कुल मिलाकर जो मानसिक आहार ब्लॉग से प्राप्त होता था वो करीब करीब खत्म ही हो चला है.....वैसे भी लिखने के लिये मुझे अपने दिमाग की बत्ती जलाने में भी समय ज़्यादा लगता है....इसीलिये थोड़ा लिखता और थोड़ी इधर उधर की गज़लें,कुछ रचानाएं..सुनवाईं और निकल लिये, अपना काम खत्म....पर ब्लॉग लिखने वाले मित्रों को धन्यवाद देना चाहता हूं कि उनकी वजह से मैं अपने अन्दर बहुत परिवर्तन महसूस रहा हूँ, जिनकी वजह से ठुमरी मैने शुरू किया और पता नहीं क्या क्या लिखने में व्यस्त रहा, लिखते लिखते मुझे अपनी पसन्द नापसन्द के बारे में पता चला ये ही मेरे लिये बड़ी बात है, अभी भी बहुत कुछ जो मन में है यहाँ उतार नहीं पा रहा, फिर भी आप सबको शुक्रिया कि मेरे लिखे पर लोग मुझे उत्साहित करते और उनकी टिप्पणियों को पाकर मेरे अन्दर एक अजीब सा जोश आ जाता...और मैं अपनी ही उमंग में रहता ..बहुत कुछ पाया है आपलोगों से......आप आते रहें इसके के लिये जब भी मुझे मौका मिलेगा मैं आपके बीच ज़रूर आऊंगा..... पर अभी कुछ दिन मैं आपलोगों से दूर रहने वाला हूँ....

आज सिर्फ़ मैं इसलिये अपने मन की बात लिखने पर मजबूर हुआ कि बहुत दिनों से मुझे अपने ही ब्लॉग पर जाने की फुर्सत नहीं मिल पा रही थी और अब फ़ुर्सत मिलेगी इसकी उम्मीद कम ही है....

मेरे पास भी अभी कुछ भी नया नहीं है जो मैं आप तक पहुँचा सकूँ........वैसे जाते जाते एक पुरानी रचना जगजीत सिं की आवाज़ में सुनते जाइये जिसे कभी हेमन्त दा ने गाया था पर परिवर्तन के लिये आज जगजीत साहब की आवाज़ में इसे सुनिये ..... . .. ..है तो बहुत पुरानी पर एक बात तो है पुराने में दम है साथी!!

ये नयन डरे डरे.......ये जगजीत सिंह के अलबम close to my heart से है...

Wednesday, July 23, 2008

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ.....मेहदी हसन

मुझे याद है सब कुछ ...खासकर दिल्ली में तिलक ब्रिज और मदर डेयरी के पीछे जब हम रहा करते थे उस दौरान ऐसा बहुत बार हुआ है, किसी शनिवार इतवार या किसी छुट्टी के दिन बारह -पन्द्रह बैचलरों की महफ़िल सजी होती थी...हार्मोनियम,तबला. एक कोने में रखा होता.....गाने वाले और साज़िन्दे हमारे मित्र ही होते....गज़ल और गीतों से सजी महफ़िल देर रात तक चलती...सुनते सुनाते कुछ लोग सो चुके होते, पर इन्हीं में कुछ लोग ऐसे भी होते जो अभी भी ग्लास हाथ मे ले जाम छलका रहे होते, ऐसे लोगों के बारे मेरे दिमाग में एक बात ज़रूर आती कि इनके पेट मे कितनी जगह है कि शाम से पीये जा रहे हैं....और अभी भी प्यासे हैं......दारु खत्म हो गई है तो आवाज़ आती कौन चलेगा मेरे साथ बदरपुर वहाँ अभी दारु मिल सकती है...., चलो बदरपुर बॉर्डर से, और दारु ले आते हैं(शायद अब दिल्ली में आसानी से दारु उपलब्ध हो) गायक और साज़िन्दों ने अभी भी खाना नहीं खाया है...वो अभी भी गाये जा रहे है.....

मेहदी हसन, गुलाम अली, मुन्नी बेग़म,फ़रीदा खानम,एहमद हुसैन -मो.हुसैन,रफ़ी,लता ,मुकेश,जगजीत-चित्रा...और बीच बीच में कुछ कविताऎं,ठुमरी,चैती, कजरी और ना जाने कितनों की गाई रचनाएं रात भर गायी जाती....अब कुछ एक लोग अपने सोने की जगह तलाश रहे हैं....कुछ लोगों को बीच से खिसका- सरका कर अपने -अपने सोने की जगह बना रहे हैं......रात काफ़ी हो चुकी है..अब कुछ लुढकने के मूड में दिख रहे हैं ...फिर भी इनमें से कुछ हैं, जो संगीत के मुरीद हैं, अभी भी मुस्तैदी से अपनी फ़र्माइश के गीत और गज़ल सुन रहे हैं , खास कर दर्द भरी गज़लें सुनने के मूड ज़्यादा हैं ,सन्नाटे में एक आवाज़ आती....वो वाली गज़ल आती है....."रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिये आ, आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिये आ.....मेहदी साहब ने क्या कमाल कर दित्ता यार, जब भी इस गज़ल को सुनता हूँ, लगता है मेरे लिये ही ये गज़ल लिखी गई हो" वैसे ये सिलसिला रात भर चलता.....

अब सुबह होने को है....अब बाहर से रोशनी छनकर घर के अंदर आने लगी है.. आसमान नीला हो चुका है अब जो आलम है उसमें कुछ तो सो चुके हैं,कुछ हैं जो अभी भी हारमोनियम पर अपनी उंगलियाँ टेरने में लगे हैं ,, रंजिश ही सही, आज जाने की ज़िद ना करो..चल मेरे साथ ही चल ऐ मेरी जाने गज़ल...... को चार पाँच बार सुनाने के बाद जिसे हमने खास मेहमान के तौर पर बुलाया था, रात भर की गहमा गहमी में और कई बार एक ही गज़ल को गाते - गाते थक सा गया है.......रात भर गाते -गाते वाकई उसे खाने का मौक़ा मिला नहीं ...वैसे अब उसके लिये खाना भी नहीं बचा है.....उसके पास गरियाकर सोने के अलावा अब कोई चारा भी नहीं है.....

और लो अब नया दिन भी सर पर आ गया .......सब अपने -अपने काम के जुगाड़ में अलग अलग दिशाओं में निकल पड़े हैं,कुछ तो कब निकल गये पता ही नहीं चला,अब कमरे के असली वशिन्दे अपनी नींद सो रहे हैं ..............पूरे कमरे को लौंग शॉट में देखा जाय तो बिखरे, अस्त व्यस्त कमरे को देखकर लगता था कि रात, ज़रुर किसी का कत्ल हुआ होगा...तो लीजिये पेश है् दिल्ली के उन क़ातिल रातों को याद करते हुए, मेहदी साहब की आवाज़ में एक गज़ल " रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिये आ....आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिये आ........ शायर अहमद फ़राज़ की लिखी इस गज़ल को मेंहदी साहब ने दो अलग अंदाज़ में गाया था, आप सुनिये और बताईये, कैसा लगा आपको उनका ये अंदाज़........








रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिये आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ,

पहल से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
-ओ -रहे दुनिया ही नीभाने के लिए आ

किस-किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम ,
तू मुझ से खफा है तो ज़माने भी लिए आ !

कुछ तो मेरे पिन्न्दार -ऐ -मुहब्बत का भरम रख ,
तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ !

एक उम्र से हूँ लज्ज़त-ऐ-गिरिया से भी महरूम ,
ऐ राहत-ऐ- जान मुझको रुलाने के लिए आ

अब तक दिल-ऐ-खुश-फ़हम को तुझ से हैं उम्मीदें,ये
आखरी शम्में भी बुझाने के लिए आ
(मरासिम : relationship; ,पिन्न्दार-ऐ-मुहब्बत : love's प्राइड,लाज्ज़त -ऐ गिरिया : joy of crying; महरूम : devoid; राहत-ऐ-जान : comfort of the soul)

इस गज़ल में दो शेर अहमद फ़राज़ साहब के नहीं हैं, इन्हे लिखा तालिब बागपती ने(Talib Baghpati) पर मेंहदी साहब इन शेरों को इसी गज़ल का हिस्सा मान कर गाते हैं ।

माना की मुह्हबत का छुपाना है मुहब्बत,
चुपके से किसी रोज़ जताने के लिए आ

जैसे तुझे आते हैं न आने के बहाने,
ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए आ

Monday, July 21, 2008

शोला था जल बुझा हूँ......उस्ताद मेंहदी साहब की कुछ चुनी गज़लें पेश कर रहा हूँ.....



एक आध दिन पहले ख्वाब दर ख्वाब में उस्ताद मेंहदी हसन साहब की सेहत से मुत्तालिक़ कुछ खबरें पराशर साहब ने अपने ब्लॉग पर दी थीं...और इससे अलहदा मैं भी मेहदीं साहब को लेकर कुछ ज़्यादा फ़िक्रमंद हुआ जा रहा था....बहुत दिनों से उनकी खबर भी मिली नहीं थी तो अपने अंदर एक अजीब सी बेचैनी महसूस कर रहा था.....८१ के हो चुके हैं......उनकी सेहत को लेकर चिन्ता बनी रहती है.....मैं काफ़ी दिनों से सोच रहा था कि कुछ मेंहदी साहब की अमर गज़लें आपको सुनाऊँ....पर उनके बारे में कुछ भी लिखना मेरे लिये वाकई मुश्किल हो रहा था...अभी मैं सोच ही रहा था कि मित्र अशोक पान्डे अपने सुख़नसाज़ में "सब के दिल में रहता हूँ.........मेंहदी साहब पर अच्छी पोस्ट लिखी.....मैं भी कुछ अलग तरीक़े से मेंहदी साहब को याद करना चाहता था...पर मुझ जैसे भी अब अगर मेंहदी साहब के तारीफ़ क्या लिख देंगे....कि कमाल की आवाज़....गज़ब है मेहदी साहब गाने के लिये गज़लो का इंतिखाब कमाल का करते हैं,इससे ज़्यादा हम लिख भी नहीं सकते...हम तो मुरीद हैं उनके..कहिये दीवाने हैं उनके......अभी मित्र संजय पटेल जी ने उनके बारे में सुख़नसाज़ में जो बहुत अच्छे से अपने विचार रखे, मुझे लगा अब मेरा लिखना बेकार है.....बस कुछ गज़लें जो मुझे पसंद है सुनवाता चलूँ..... मेंहदी साहब की यादागार ग़ज़लों की फ़ेहरिस्त तो वैसे बहुत लम्बी है.. आज तीन से काम चलाइये..कुछ और हाथ में हैं वो बाद में सुनवाता रहुंगा..............पहली गज़ल .........शोला था जल बुझा हूँ........शायर:अहमद फ़राज़



शोला था जल बुझा हूँ हवाएं मुझे न दो
मैं कब का जा चुका हूँ सदाएं मुझे न दो

जो ज़हर पी चुका हूँ तुम्हीं ने मुझे दिया
अब तुम तो ज़िंदगी की दुआएं मुझे न दो

ऐसा कभी न हो के पलट कर न आ सकूँ
हर बार दूर जा के सदाएँ मुझे न दो

कब मुझको ऐतराफ़\-ए\-मुहब्बत न था 'फ़राज़'
कब मैंने ये कहा था सज़ाएं मुझे न दो

दूसरी ग़ज़ल......एक बस तू ही नहीं.........शायर: फ़रहत शहज़ाद



एक बस तू ही नहीं मुझसे ख़फ़ा हो बैठा
मैंने जो संग तराशा था ख़ुदा हो बैठा

उठ के मंज़िल ही अगर आये तो शायद कुछ हो
शौक़-ए-मंज़िल तो मेरा आब्ला-पा हो बैठा

मसलह्त छीन ली क़ुव्वत-ए-ग़ुफ़्तार मगर
कुछ न कहना ही मेरा मेरी ख़ता हो बैठा

शुक्रिया ऐ मेरे क़ातिल ऐ मसीहा मेरे
ज़हर जो तूने दिया था वो दवा हो बैठा

जान-ए-शहज़ाद को मिन-जुम्ला-ए-आदा पा कर
हूक वो उट्ठी कि जी तन से जुदा हो बैठा

और ये तीसरी ग़ज़ल.....ज़िन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं...शायर हैं क़तील शिफ़ाई



ज़िन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं
मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा

तू मिला है तो ये एहसास हुआ है मुझको
ये मेरी उम्र मोहब्बत के लिये थोड़ी है
इक ज़रा सा ग़म-ए-दौराँ का भी हक़ है जिस पर
मैंने वो साँस भी तेरे लिये रख छोड़ी है
तुझ पे हो जाऊँगा क़ुर्बान तुझे चाहूँगा

मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा
ज़िन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं

अपने जज़बात में नग़मात रचाने के लिये
मैंने धड़कन की तरह दिल में बसाया है तुझे
मैं तसव्वुर भी जुदाई का भला कैसे करूँ
मैंने क़िस्मत की लकीरों से चुराया है तुझे
प्यार का बन के निगेहबान तुझे चाहूँगा

मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा
ज़िन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं

तेरी हर चाप से जलते हैं ख़यालों में चिराग़
जब भी तू आये जगाता हुआ जादू आये
तुझको छू लूँ तो फ़िर ए जान-ए-तमन्ना मुझको
देर तक अपने बदन से तेरी ख़ुशबू आये
तू बहारों का है उनवान तुझे चाहूँगा

मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा
ज़िन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं

अभी बस इतना ही.....अगले पोस्ट में मेहदीं साहब की और भी बेहतरीन गज़लें सुनाने की कोशिश रहेगी।

Tuesday, July 15, 2008

नाटककार बादल सरकार के जन्मदिन के बहाने....कुछ यादें



आज १५ जुलाई है आज के दिन मशहूर नाटककार श्री बादल सरकार ८४ साल के हो गये हैं.....उनके जन्म दिन पर हमारी हार्दिक शुभकामनाएं........वैसे तो बादल सरकार मूलत: बंगला में नाटक लिखते रहे हैं पर उनके सभी नाटकों का हिन्दी में अनुवाद हुआ और उनके नाटक खूब लोकप्रिय भी हुए, मैं तो उनको इसलिये भी याद कर रहा हूँ कि मेरे रंगमंच की शुरुआत बादल सरकार के थियेटर वर्कशॉप से हुई थी.....८० का दौर था तब मैं भी नया नया रंगमंच से जुड़ा भर ही था,बादल सरकार का नाम तो मैने सुना ही नहीं था और एक भी नाटक मैने न देखे थे न पढ़े थे, सबसे पहले तो मैं थियेटर वर्कशॉप होता क्या है इसी की पूछ ताछ में लगा हुआ था......तो समझिये बादल दा के बारे में मैं क्या जानता रहा होऊंगा.....खैर जब तक बादल सरकार आए तब तक मैने उनके लिखे काफ़ी सारे नाटक पढ़ लिये थे....... नाटकों को पढ़ के समझ में ये आया कि बादल सरकार कम से कम पी.सी सरकार के भाई नहीं हैं........और जब बादल दा आए तो एक नई बहस लेकर आए थे....वो था प्रोसीनियम थियेटर और उससे अलग थर्ड थियेटर...पता चला कि पोलेन्ड के ग्रोतोव्स्की और रिचर्ड शेखनर से प्रभावित होकर बादल दा थर्ड थियेटर के बारे में बड़ी गहराई से रंगप्रयोग मे लगे थे .मैं उस समय इन सब चीज़ों को नज़दीक से देख रहा था....मेरे लिये ये समय ऐसा था कि कुछ भी गम्भीर बात बोलते हुए मुझे डर लगता था.....सिर्फ़ सुनता था और सुनता ही था......करीब एक महीने के वर्कशॉप ने मेरा नज़रिया ही बदल के रख दिया था....लगा कि ये लोग मुझे पहले क्यौ नहीं मिले ......अपने अन्दर हो रहे परिवर्तन को मैं साफ़ महसूस कर रहा था......

मै तो बादल दा के बगल में बैठ कर अभिभूत भाव से यही सोचा करता कि " देखो कितने बड़े नाटककार के बगल में बैठा हूँ" क्यौकि अभी भी मेरी समझ कच्ची थी....तो वैसी स्थिति में बादल दा से बातचीत कर पाना मेरे लिये मुश्किल ही था समाज,रंगमंच इन सब पर हो रही बहस कोबहुत ध्यान से सुनता ज़रूर था।.स्पार्ट्कस,भोमा,पगला घोड़ा,एवम इंद्रजीत,बाक़ी इतिहास,बड़ी बुआ जी,सारी रात,जुलूस,बल्लभगढ़ की रूपकथा,घेरा इतने सारे नाटक समझिये एक सांस में पढ़ गया था, सबकुछ जल्दी से जान लेने की इच्छा थी...तो उस हड़बड़ी की वजह से उनके नाटक की कुछ बातें समझ में आयीं कुछ ऊपर से निकल गयीं.......पर पढ़ने को मैं सब पढ़ता चला गया था......!

तब के दौर में प्रोसीनियम, नॉन प्रोसीनियम की बहस ज़ोरों पर थी...हमारे निर्देशक को भी थर्ड थियेटर ही भविष्य का वैकल्पिक थियेटर नज़र आता था.....प्रोसीनियम रंगमंच के विरुद्ध लोगों का मानना था कि प्रोसीनियम रंगमंच में जिस तरह के ताम झाम होते हैं वो अपने जैसे इस गरीब देश के लिये तो एकदम ही सम्भव नहीं है...लिहाज़ा थर्ड थियेटर ही उसका विकल्प बन सकता है....तब समय था जब लोग कथ्य से अलग रंगमंच के "रूप" पर बहस में लगे थे...लीविंग थिएटर कलकत्ता के प्रबीर गुहा, बारबा से प्रेरणा लेकर फ़िज़िकल थियेटर में संलग्न थे....तो लखनऊ की लक्रीस से जुड़े शशांक बहुगुणा अपने साइको फ़िज़िकल थियेटर में प्रयोग करते रहे........


बादल दा जनता के बीच चर्चित नाटक मिछिल(जुलूस) करते हुए

एक बार लखनऊ में मैं शशांक बहुगुणा के साईको फ़िजिकल थियेटर वर्कशॉप करने गया....मेरे दिमाग में ये तो साफ़ था कि बिना मन और शरीर के कोई भी थियेटर सम्भव नहीं है...फिर भी ये साइको फ़िज़िकल थियेटर आखिर क्या बला है ? जानना चाहता था...एक महीना गुज़ारने के बाद मैने शशांक जी से पूछा कि "आप आपने रंगकर्म को साइको फ़िज़िकल थियेटर का नाम देते है.......पर क्या बिना साइक और बिना शरीर के क्या नाटक सम्भव है? तो शशांक जी सिर्फ़ मुस्कुरा भर दिये..........खैर एक समय था जब आज़मगढ,इलाहाबाद और लखनऊ में एक नाटक का समारोह हुआ था ....जिसमें बादल सरकार अपने नाट्य दल शताब्दी के साथ.....बासी खबर,और मानुषे-मनुषे,प्रबीर गुहा अपने लीविंग थियेटर ग्रुप के साथ अब्दुल हन्नान की मौत, शशांक बहुगुणा अपनी मंडली लक्रीस के साथ बाकी इतिहास,तुगलक,इलाहाबाद की दस्ता ने जुलूस,आज़मगढ़ की समानान्तर संस्था अनिल भौमिक के साथ भोमा और स्पार्टकस नाटक के प्रदर्शन किये थे,इस समारोह की खास बात थी सारे नाटक मंच को छोड़्कर दर्शकों के बीच किये गये थे ....इन नाटकों में दर्शक भी एक पात्र होता था... उस दौरान मैने भीबादल दा का लिखा नाटक भोमा और स्पार्टकस नाटक में मैने भी काम किया था.....पर सुखद ये था कि बादल दा को मैने भी नाटक में अभिनय करते देखा था....सारी प्रस्तुतियाँ अच्छी थी पर शशांक बहुगुणा जी ने जिस तरह बाकी इतिहास किया था वो नाटक तो आज भी स्मृतियों में ज़िन्दा है ..........वर्कशॉप से अलग बादल दा के इतने सारे नाटकों को देखना मेरे लिये सुखद एहसास था.......और खरदा बंगाल के प्रबीर गुहा की प्रस्तुति अब्दुल हन्नान को देखकर अचम्भित रह गया था जिस सर्कसी अंदाज़ में नाटक की प्रस्तुति की गई थी, वो देखने लायक थी...पर उस नाटक को देखकर पहली बार एहसास हुआ था कि कैसे किसी नाटक की प्रस्तु्ति पर" रूप "बुरी तरह हावी हो जाता है......और कैसे एक नाटक अपने" रूप" की वजह कहीं खो जाता है...........तो आज बस इतना ही ..............बादल दा के बहाने पुरानी यादें ताज़ा हो गईं .......


बादल दा को जन्मदिन की ढेर सारी बधाई!!

Wednesday, June 25, 2008

नसीरुद्दीन शाह साहब का ये जलवा देखा है आपने?


नसीरूद्दीन शाह के अभिनय के बारे में कहा जाय तो किसी भी चरित्र को वो पर्दे पर निभाएं उनके अभिनय में गज़ब की गहराई होती है...अलग अलग भुमिका करने में नसीर साहब का जवाब नहीं........जिस भी चरित्र को निभाते हैं उसमें इतना धंस जाते हैं कि लगता ही नहीं कि वो अभिनय कर रहे हैं.......समझ में नहीं आता कि फ़िल्म के साथ साथ नाटक के लिये भी समय कैसे निकाल लेते हैं....नसीर साहब ने एक से एक चरित्रों को अपने अभिनय से यादगार बना दिया ....बेहतरीन अभिनय तो अनेकों फ़िल्म में उन्होंने की है अब गिनाने लग जाय तो पोस्ट थोड़ी लम्बी हो जाएगी..जो मैं चाहता नहीं....आज उनके अभिनय की मिसाल देखना हो तो ज़रा इस वीडियो को देखिये ये पाकिस्तानी फ़िल्म खु़दा के लिये का एक टुकड़ा है अभी इस विवाद में बिल्कुल नहीं पड़ना चाहता कि नसीरूद्दीन शाह,पंकज कपूर,ओम पुरी जैसे अभिनेताओं को बॉलीवुड में जितना सम्मान मिलना चाहिये था वो उन्हें नहीं मिला....इन पर कभी और .अभी नसीर साहब का जलवा देखिये उनके अभिनय का नज़ारा देखना है तो इस वीडियो क्लिप पर क्लिक करके आप देख सकते हैं.......

Thursday, June 12, 2008

ये टैंगरिन ठुमरी क्या है?

आज कल रीमिक्स का ज़माना है,किसी गाने की चर्चा हुई नहीं की बाज़ार में उसका रीमिक्स ज़रूर उतर आयेगा,पर ठुमरी का रीमिक्स ? अब भाई प्रयोग का तो कोई अन्त नहीं है,प्रयोग की कोई सीमा भी तो नहीं है,पर मैने भी जब ये रचना सुनी तो धुन तो अच्छी थी..पर कुछ अखर भी रहा था कुछ और नाम भी दिया जा सकता था खैर इस प्रयोग को अंजाम दिया प्रेम जोशुआ साहब के साथ साथ मनीश ने, जो फ़्यूज़न जैसा कुछ कुछ बजाते रहते हैं, इनकी रचना किशन - कन्हईया की भक्ति पर ही आधारित रहतीं हैं, जिसमें भारतीय और पश्चिमी वाद्ययंन्त्रों का इस्तेमाल रहता है,पर कोई ऐसी रचना जिससे आत्मविभोर हो जाँय, ऐसा इनसे तो सुना नहीं,पर यहाँ उनकी टेंगरीन ठुमरी नामक रचना खास आपके लिये लाया हूँ.... सुनिये और बताईये कि ये क्या है? इस रचना के बारे में जो अंग्रेज़ी में शीर्षक दिया गया है वो कुछ ऐसा है( Maneesh-de-moo- tangerine-thumri-orange-turban-remix).तो अब आपके सामने पेश है ऑरेन्ज -टर्बन रीमिक्स...........टैंगरिन ठुमरी अब आप इसे सुनिये और सुनकर बताइये कैसा लग रहा है, वैसे जहाँ तक मेरी राय है तो इस रचना को ठुमरी से जोड़ने की कोशिश करेंगे तो कन्फ़ूज़न होगा, तो इसे आप फ़्यूज़न मान कर सुने यही ठीक रहेगा....लोग कहते हैं संगीत में फ़्यूज़न के साथ कन्फ़्यूज़न का गहरा रिश्ता है.....



और नीचे के प्लेयर से दूसरा रीमिक्स भी आप सुनिये अभी कुछ समय पहले मैने कैरेबियन चटनी सुनाई थी...वो तो मूल थी,अब वहां पर भी चटनी का रीमिक्स बनता है ऐसे तो बहुत से रीमिक्स हैं, पर आज जो रीमिक्स आप सुनेंगे उसे गाया है चटनी गायक रिक्की जय ने.....त्रिनीदाद और आस पास के कैरेबियन संसार का पहचाना नाम है.तो सुनिये.....मोर तोर...मोर तोर....
boomp3.com
इस प्लेयर के साथ थॊड़ी समस्या है कई बार क्लिक करने पर बफ़र होने के बाद सुने तो बेहतर होगा

Monday, June 9, 2008

फिर दर्द उठा दिल में और आँख भी नम है.........

बहुत पहले जगजीत सिंह साहब ने अपने पसन्दीदा गज़ल गायकों को चुनकर एक कैसेट रिलीज़ किया था,किस नाम से ये अलबम था मुझे याद नहीं, वो अलबम तो समय के साथ पुराना पड़ गया पर आज लम्बे समय के बाद भी सुमीता चक्रवर्ती की आवाज़ ज़ेहन में अपनी जगह बराबर बनाए हुए है ,सुमिता की गायी ग़ज़ल "फिर दर्द उठा दिल में और आँख भी नम है.".......दर्द भरी मीठी सी आवाज़ में इस ग़ज़ल को सुनना वाकई एक अनुभव है.....इस ग़ज़ल के अलावा मैने सुमीता की आवाज़ में कोई दूसरी रचना कभी सुनी नहीं...अगर आपने सुना हो तो बताएं.....तो पेश है सुमीता की आवाज़ में एक ग़ज़ल, संगीतकार है जगजीत सिंह।

Saturday, May 31, 2008

प्यार नहीं है जिसका सुर से वो मूरख इंसान नही.....

ये रचना उन्हें समर्पित है जिन्हें संगीत और सुर से परहेज है, जो संगीत की महत्ता को नकारते हैं, पर संगीत की ताक़त से अंजान हैं, तो पेश है .....उस्ताद अमानत अली खाँ और उस्ताद फ़तेह अली खाँ साहब.....की गायी ये रचना ।


उस्ताद अमानत अली खाँ-उस्ताद फ़तेह अली खाँ

प्यार नहीं है जिसका सुर से वो मूरख इंसान नही...........




प्यार नहीं है सुर से जिसको वो मूरख इंसान नहीं है,

जग मे गर संगीत न होता, कोई किसी का मीत न होता,

ये एहसान है, सात सुरों का, ये दुनियाँ वीरान नहीं,

सुर इंसान बना देता है, सुर रहमान मिला देता है,

सुर की आग में जलने वाले परवाने नादान नहीं।

Wednesday, May 28, 2008

एक लोकगीत की चटनी.....

हिन्दोस्तान के प्रसिद्ध लोक गायक राम कैलाश यादव एक ऐसी शक्सियत हैं, जिनके बारे में बहुतों को पता नहीं है..पर उन्होने लोकगीतों के माध्यम से समाजिक कुरीतियों पर बहुत व्यंग भी किये है, पर आज मैं उनकी गायी प्रसिद्ध कजरी सुनाता हूँ,कौने रंग मूंगवा कवनवें रंग मोतिया ..... साथ साथ आपको वही लोक गीत करेबियन चटनी गायक राकेश यनकरण की आवाज़ में उसी कजरी को सुना, तब से यही सोच रहा हूँ कि ये गाना कब लिखा गया होगा...और आज भी कैरेबियन द्वीप समूह में पूरे ताम झाम के साथ गाया जा रहा है....तो पहले सुनिये राम कैलाश जी की आवाज़ में इस कजरी को...


और इसी कजरी, कौने रंग मुंगवा कवनें रंग मोतिया ...को चटनी के अंदाज़ में गा रहे हैं राकेश यनकरण.....

Monday, May 26, 2008

नैना मोरे तरस गये....उस्ताद मुबारक अली खाँ

उस्ताद मुबारक अली खां साहब के नाम की तारीफ़ मेरे मित्र मयंक राय बहुत किया करते हैं, तो खोज खाज कर निकाल लाया हूँ आपके लिये.... तारीफ़ में बहुत कुछ कह जा सकता पर किसी की तारीफ़ में जो शब्द आप खर्च करे वो मैं आप लोगों से सुनना चाहता हूँ... तो इस रचना को सुनिये, आवाज़ है, पाकिस्तान के उस्ताद मुबारक अली खां साहब की.....आप ही बताइये सुन कर कैसा लगा. इस रचना को उस्ताद मुबारक अली खाँ साहब ने लाहौर के चित्रकार गैलरी के जलसे में कभी गाया था, उसी कि रिकार्डिंग है....

नैना मोरे तरस गए......

Saturday, May 24, 2008

मेरा मन भी गरियाने को कर रहा है....पर गरियाउँ किसे ?

हां मेरा मन भी गरियाने को कर रहा है....पर गरियाउँ किसे ? इन दिनो तो ब्लॉग जगत में फ़िर थोड़ी हलचल सी मची है...ब्लॉग जगत की साहित्य मंडली में बह्स छिड़ी हुई है,पर हम गाने बजाने वालों को इससे क्या ? इस पचड़े में जिन्हें पड़ना है पड़े...........ऐसी स्थिति में हम शुरू से वो वाले रहे हैं,लड़ाई झगड़ा माफ़ करो, कुते की लेंड़ी साफ़ करो......तो अब आप भी इसी उम्मीद में इधर आए होंगे कि गरियाने की बात कर रहा है ज़रूर किसी के समर्थन में बात कर रहा होगा चलो देखा जाय आज ठुमरी पर क्या है.?.तो मेरे मित्रों आज आपको मायूस भी नहीं करना चाहता ,मै तो बीच बीच में कुछ मनबहलाव के लिये कुछ गीत ग़ज़ल सुनवाने के मूड में ही रहता हूँ,
आज बहुत दिनों बाद उस्ताद राशिद खान साहब की पकी हुई आवाज़ में राग अहिर भैरव में एक रचना लेकर आया हूँ , इसे सुने....और बताएं कि चकल्लस, जो ब्लॉग जगत में मची हुई है इससे इतर ये रचना सुनकर आपके मन को सुकून पहूँचा की नहीं?
अलबेला साजन आयो रे........

Friday, May 16, 2008

रात भी है कुछ भीगी भीगी....

एक फ़िल्म मुझे जीने दो आई थी,उस फ़िल्म में सुनील दत्त साहब का रोबीला चेहरा और काला लिबास और माथे पर तिलक....घोड़े पर सवार सुनीलदत्त साहब का वो रूप आज भी मुझे याद है,इसी फ़िल्म में वहीदा रहमान ने भी काम किया था,फ़िल्म तो देखे ज़माना हो गया, कुछ भूली बिसरी यादें ही रह गईं हैं....पर गाने इस फ़िल्म के आज तक याद है...साहिर लुधियानवी के लिखे गीतों को संगीत में पिरोया था संगीतकार जयदेव ने...कमाल की धुने थी कि आज भी सुने तो मज़ा आता है...एक गाना था नदी नारे जाओ श्याम पईयाँ पड़ूँ, जिसे लता जी ने गाया था...एक गाना था अब कोई गुलशन न उजड़े अब वतन आज़ाद है जिसे मो. रफ़ी साहब ने गाया था...एक गाना और था तेरे बचपन को जवानी की दुआ देती हूँ.पर इसी फ़िल्म का एक और गीत जो आज मेरे हाथ लगा है वो है रात भी है कुछ भीगी भीगी......तो आज इसे सुना जाय और मज़ा लिया जाय..


सुनील दत्त साहब का वो चेहरा

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मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा.....अहमद हुसैन- मोहम्मद हुसैन.....

इस गज़ल को सुनता हूँ तो बहुत सी पुरानी यादों मे खो सा जाता हूँ, अहमद हुसैन मोहम्मद हसैन साहब की जोड़ी कमाल है, गायकी में गज़ब की हारमनी पैदा करते हैं,दोनों की आवाज़ का सुरूर ही कुछ ऐसा है कि इनकी कुछ गज़लों को बार बार सुनने का मन करेगा... आज सुनिये इनकी गायी ग़ज़ल,ये उन ग़ज़लों में शामिल है जिन्हें मैने पहली बार रेडियो पर सुना था....तो पेश है गज़ल मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा



बच्चों को संगीत की बारीकियाँ बताते एहमद हुसैन-मोहम्मद हुसैन


Thursday, May 15, 2008

चंदन दास की एक गज़ल.....

आज चंदन दास की एक गज़ल सुनिये,वैसे चाहता तो था कि और भी गज़लें जो मुझे पसंद हैं चंदन दास की वो सुनवाता पर आज एक ही ग़ज़ल सुनिये....चंदन दास की आवाज़ दमदार है पर ना जाने क्यौं उनकी गज़लों की फ़ेहरिस्त बहुत छोटी है....कुछ ही गज़लें मुझे पसन्द आयीं थी....जिसमें एक तो खुशबू की तरह आया, वो हवाओं में.. मुझे बहुत पसन्द है, आज भी कभी सुनने को मिल जाता है तो मज़ा आ जाता है। आज उनकी एक ग़ज़ल सुनिये और आनन्द लीजिये....



न जी भर के देखा न कुछ बात की....

Friday, May 9, 2008

एक ठुमरी सेक्सोफ़ोन पर....

खास बात है कि आपको आज सेक्सोफ़ोन पर ठुमरी सुनाने का मन कर रहा है वैसे भी शहनाई पर तो उस्ताद बिस्मिल्लाह खां साहब ने तो बहुत सी यादगार धुनें सुनाई हैं....पर सेक्सोफ़ोन पर आज राग भैरवी में ठुमरी का आनन्द लीजिये,ये रचना चुंकि नेट सर्च पर मिली है इसलिये बहुत कुछ बताने की अपनी स्थिति है ही नहीं...अब जो जानता हो हमें बताए...बस मुझे इतना पता है कि राशिद खा़न ने इसे लाहौर में कहीं बजाया था..अब मुझे तो ये भी नहीं पता कि ये अपने उस्ताद राशिद ख़ान हैं या पाकिस्तान के कोई राशिद खा़न हैं...सेक्सोफ़ोन पर ठुमरी सुनना सुखद लगा तो आपके लिये भी परोस रहा हूँ...कैसा लगा? बताईयेगा ।

Sunday, May 4, 2008

आ गया मनोरंजन का बाप.....

आ गया मनोरंजन का बाप अगर नहीं देखा हो तो इस वीडियो को ज़रूर देखें,कम समय में इसने सास बहू को छ्ठी का दूध याद दिला दिया.... मनोरंजन चैनलों को पसीना छुडा दिया है जिसने....खबरिया चैनल इसकी आग में रोटी सेक रहे हैं....इसका बुखार तेज़ी से अपने पाँव पसार रहा है,बड़े बड़े सितारे मिट्टी में मिलते जा रहे है...पैसे की नदी बह रही है.....लोग जीत और हार में उमंग महसूस कर रहे हैं, अरे नहीं समझे तो इस वीडियो को क्लिक करके खुद ही देख लीजिये.....

Sunday, April 20, 2008

नारी तेरे रूप अनेक या एक?

आज का टेलीवीज़न चैनल महिलाओं को खलनायिका बनाने पर उतारू है,जितने भी मनोरंजन चैनल हैं, वो महिलाओं को केन्द्र में रखकर अपने कार्यक्रम बना रहे हैं,शादी,बहू,बहूरानियाँ,दुल्हन, मायका,ससुराल, बिटिया,सास..... सबकी सांसत है, चाल चौकडी चलते चलते ये थकतीं भी नहीं हैं,ऐसा लगता है जैसे मानो अपने देश की माँ ,बेटी ,सास बहू,जेठ जेठानी, सब मक्कारी में लिप्त हैं , एक दूसरे को नीचा दिखाना इनकी फ़ितरत है...

अनैतिकसम्बन्ध,ईर्श्या,बदचलनी,षडयंत्र....आज की कहानियों का आधार हैं, धारावाहिकों को देख कर तो लगता है कि सकारात्मक विचारों की महिला अपने देश में हैं ही नहीं,और मर्द... बेचारा नपुंसक ! ,किसी काम का नहीं. बस उसका काम पैसा कमाना है और औरतें चाल चलचल कर सम्पत्ती हड़पने,या किसी दूसरी औरत को नीचा दिखाने में ही लगी पड़ी हैं, और आंकड़े कहते हैं कि औरतें ही है जो ज़्यादा टेलीवीज़न देखतीं हैं,और औरतें देखना भी यही सब ज़्यादा चाहती हैं,और उनको सबसे ज़्यादा सास-बहु,देवर देवरानी,जेठ जेठानी के रिश्ते की खटास वाला पक्ष ही सबसे अच्छा लगता है.....

मनोरंजन चैनलों से जो कार्यक्रम खास तौर से परोसे जा रहे है उनके नाम तो देखिये.. हमारी बेटियों का विवाह,.राजा की आएगी बारात,मेरा ससुराल,मायका,घर की बेटी लक्ष्मियाँ ,बाबुल का अंगना,डोली सजा के रखना,नागिन,सात फेरे,सुजाता,तीन बहुरानियाँ, आदि...... और भी बहुतेरे नाम हैं, इन सारे धारावाहिक में औरतें एक से एक नई डिज़ाइन के कपड़े,गहने,में सजी धजी गुनाह पर गुनाह किये जा रही है और रोती रहती हैं एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगी रहतीं हैं,बदला लेती औरत,प्यार करती औरत....क्या औरत के नाम पर यही सब अधकचरी चीज़ें रह गईं हैं दिखाने को? तो क्या हमें मान लेना चाहिये कि जो ये मनोरंजन चैनल हमारे सामने जो परोस रहे हैं...... यही हमारा समाज है?



पुरुष, बेचारा बेचारा सा दिखाता है, औरतों के इस फ़रेब के सामने असहाय बना कितना लाचार दिखता है, क्या ऐसा है?क्या कुछ ऐसा हो गया है कि पुरुष प्रधान समाज में औरतें कुछ इतना बढ़ गईं है कि पुरुष कमज़ोर होता दिख रहा है,या औरत,औरत के खिलाफ़ किसी भी साजिश को देखना सबसे ज़्यादा पसंद करतीं हैं?

एक मित्र कह रहे थे कि जब बहू अपनी सास को अपनी किसी चाल से मात दे देती है तो घर में बैठी बहू अपनी सास की तरफ़ विजयी मुस्कान से देखती है,जो बहू घर में बोल नहीं सकती उनकी आवाज़ ये चैनल होते हैं...क्या इतनी गहराई से देखा जा रहा है ये सब कुछ?

और दूसरी तरफ़ हिन्दी फ़िल्म इन्डस्ट्री का हाल ये है कि औरतो (हिरोईन) का काम एक दम स्टीरियो टाइप्ड ही रहता है...हीरो वो सब कुछ करता है जो एक आम इंसान नहीं कर सकता...

तो क्या मान लेना चाहिये कि जिसकी लाठी उसकी भैंस........टेलिवीज़न औरतों का माध्यम है और फ़िल्म पुरुषों का? आखिर कौन है जो इन्हे सही तस्वीर दिखाने से रोक रहा है?

जनता? टीआरपी?

Thursday, April 10, 2008

पहचान कौन ? ? ? ?


आज सुबह सुबह मेरे मित्र विपिन ने क्वेस्ट वर्ड का लिंक भेजा, वहाँ मुझे ये जानमारू तस्वीर हासिल हुई है,तो इस तस्वीर के लिये क्वेस्ट वर्ड का मैं, हौले हौले, लाहे लाहे शुक्रिया अदा करता हूँ...उस फोटोग्राफ़र का भी शुक्रिया जिसने ये फोटो खीचते हुए खींची है। फ़ोटो देखकर एक गाना याद आ रहा है
चेहरा क्या देखते हो दिल में उतर कर देखो ना !! कहिये कैसा रहा?

मोरा संइयाँ मोसे बोले ना..शफ़क़त अमानत अली की आवाज़..

कभी अखबार से जुड़े पत्रकार मित्रों को खबर के लिये कितना कुछ करते देखा,पर अपना मन तो सुमड़ी में समाया पता नहीं क्या क्या चाहता है?बहुत दिनों से समय भी नहीं मिल पा रहा था कि कुछ मन की बात लिखूँ,पर मन भी तो है उड़न कबूतर की तरह यहाँ वहाँ उड़ता फ़िर रहा है पर काम का कुछ भी मामला लगता नहीं,
आज बहुत दिनों बाद कुछ फ़्युज़न संगीत सुनाने का दिल हो रहा है......पर कुछ कहने से पहले ये तो बता देना ही उचित है कि जब भी ब्लॉग पर कुछ लिखना चाहता हूँ हमेशा मैं अपने आपको अतॊत में झाँकता पाता हूँ, अब देखिये ना आज आपको पाकिस्तानी बैंड फ़्युज़न की कुछ रचनाएँ सुनाने का मन कर रहा था पर मन में पता नही क्या क्या चल रहा है.....ये फ़्युज़न का कन्फ़्युज़न भी गज़ब रंग दिखाता है..जैसे कुछ लोगों को सागर किनारे डूबते सूरज को देखना बहुत भाता है...रोज़ चले जाते हैं डूबते सूरज को देखने पर उनसे पूछा जाय कि भाई रोज़ रोज़ सूरज का डूबना देखना आपको क्यौ पसन्द है तो उसका जवाब देते बनता नही है कहेंगे अच्छा लगता है....लाल सूरज को इस तरह चकरघिन्नी की नाचते नाचते पानी में समाते देखना मन को भा जाता है..और भी जवाब हो सकते हैं पर जहाँ तक संगीत की बात है तो उसके बारे में ये ज़रूर कहना चाहुंगा कि पसन्द अपनी अपनी खयाल अपना अपना, मुझे भी संगीत में डूबे रहने में बड़ा मज़ा आता है अगर क्यौं आपने पूछ दिया तो मैं भी यही कहुंगा कि ’अच्छा लगता है",तो आज यही सोच के बैठा हूँ कि आपको एक बेहतरीन रचना सुनवानी है तो और कुछ सूझ भी नहीं रहा.
अपनी पसन्द की कोई चीज़ आप तक लाना और आपका सुनना, वो मुझे भी बहुत भाता है..पर इस बात का दर्द भी है मेरे भीतर है कि आज के समय में जहाँ तक संगीत की बात करूँ तो ऐसा कुछ भी सुनने को नहीं मिल रहा जो दिल तक जाकर बात करे, क्या आपको नहीं लगता कि आज के दौर में शब्द पर संगीत पर भारी पड़ रहा है,मिलोडी में सब कुछ खो सा गया है,कुछ धुने पसन्द भी आती हैं पर शब्द मुँह से फूटते ही नहीं, इस मामले में शायद कुछ गाने अपवाद हो सकते हैं पर आज कल संगीत का मौसम ठीक तो नहीं चल रहा,तो बात यहाँ से करे कि आज जो रचना आप सुनने वाले हैं उसे सुनवाने के लिये इधर उधर से कुछ लिंक भी जुगाड़ कर लिया है,

मोरा संइयाँ मोसे बोले ना.....मैं लाख जतन कर हार रही....इसकी धुन अहा अहा मज़ा आ जायेगा जब आप सुनेगे तो! इसे गाया है शफ़कत अली खान ने खमाज नामक ये रचना सागर अलबम से है,है थोड़ा पुराना, मतलब कोई आठ दस साल पुराना, पर इसकी तासीर ऐसी है कि मन को छू लेगी इसको मेरे मित्र जे।पी जो दिल्ली में रहते हैं पहली बार इस गीत को उनसे सुना था तभी मस्त हो गये थे,जे।पी भी इस गाने को बौत खूबसूरती से गाते हैं,कभी मौका मिला तो जे।पी की आवाज़ भी आप तक ज़रूर पहुँचेगी...पर अभी तो ये वीडियो देखिये और बताते जाइये कि कैसा लगा? वीडियो ज़रा पुराना है बफ़र करने में समय लेता है धैर्य रखियेगा। इस वीडियो को पहले देखा है तो बात नहीं,पर इस वीडियो को देखकर गुरुदत्त साहब की याद ज़रूर आती है।
आवाज़ है शफ़क़त अमानत अली की.


अगर सिर्फ़ ऑडियो भी ्सुनना चाहें तो यहाँ प्लेयर पर क्लिक करके सुना जा सकता है.

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Tuesday, April 8, 2008

आख़िर ब्लॉगवाणी में हो क्या रहा है?

"अब ब्लॉग में वो बात रही नहीं" शीर्षक से कोई लेख आया क्लिक करने पर खुला भी नहीं,और मज़े की बात है आज की पसन्द में सबसे ऊपर भी है,तो भाई लोग ऐसी खबर जो ब्लॉग की आलोचना, किसी की भी आलोचना से जुड़ी हो, तो देखा गया है कि उसे सभी पढ़ना चाहते हैं,चाहे इन मुद्दों पर कूड़ा ही क्यौं ना लिखा गया हो, आखिर कब हम सुधरेंगे? कब तक हम सनसनी से अपने आपको सहलाते रहेंगे?

Thursday, April 3, 2008

ब्रेकिंग न्यूज़ !!

खबरिया चैनल में लगता है खबरों की दरिद्रता है तभी तो ये हाल है, आखिर मीडिया का स्तर जा कहाँ रहा है?
नाटक था जिसमें किसी का कुत्ता खो जाता है,और कुत्ते के पीछे पूरा नाटक भागता है, यहाँ उसी खोये कुत्ते को आखिरकार चैनल वालों ने खोज निकला, बानगी के लिये देखिये नीचे की तस्वीर.......ये क्या हो रहा है?


ऐसी खबरों को ब्रेकिंग न्यूज़ कहेंगे ?
कुत्ते के बारे में जानकारी देते समाज के वॉच डॉग (चित्रानुसार हिन्दी अनुवाद स्वंय कर लें)

Wednesday, April 2, 2008

सपने में आयीं इंदिरा...

पने भी अजीब होते हैं,पहले आते थे सपने पर अब दिखते ही नहीं हैं,क्या सपनों का ना आना अपशकुन होता है? पहले मेरे सपने रंगीन होते थे, थोड़े समय बाद में ब्लैक ऐन्ड वाइट में आने लगे, ऐसा मेरे साथ ही होता था ये मुझे मालूम नहीं,पर कभी बुरा सपना देखने से नींद उचट जाती तो फ़िर से अच्छे सपने देखने का मन बना के सोते,और इन्हीं सपनो के आने के इंतज़ार में कब नींद आ जाती पता ही नहीं चलता था,पर अब सपनों ने साथ लगता है छोड़ दिया है मन बैचेन तो नहीं है पर सपने देखने की उम्मीद लगा कर सोता ज़रूर हूँ, वैसे मेरे मित्र हैं संजय उनके सपनों में विवेकानन्द,इंदिरा गाँधी,राजीव गाँधी,चार्ली चैपलिन,और भी महान लोग आते हैं

संजय ने एक बार बताया कि उन्होने सपना देखा कि वो एक बहुत बड़े मैदान में अकेले खड़ा है और पूरे मैदान में दूर दूर तक कूड़ा ही कूड़ा फैला हुआ है, कहीं कहीं तो कूड़े का पहाड़ सा बना है...इसी दौरान वो देखता है एक महिला अपने बड़े से दल बल के साथ उसी की तरफ़ चली आ रही है,पास आने पे वो इस चेहरे को पहचानने की कोशिश करता है और पास आने पर उस चेहरे को देख कर चौंक उठता है अरे ये तो इंदिरा गाँधी हैं!

इस बीच इंदिरा गाँधी हाथ में एक बुके लिये हुए उनके पास आतीं हैं, पास से देखने पर पता चलता है इंदिरा जी के हाथ में जो बुके है वो कूड़े का बना है,इंदिराजी के चेहरे की तरफ़ देखता है पूछ बैठता है, आप और यहाँ? इंदिराजी संजय को देख कर मुस्कुराते हुए कहती हैं,"हाँ मैं राजीव गाँधी की मज़ार पर प्रार्थना करने आयी हूँ",मित्र कहते हैं "इन कूड़े के ढेर में उनका मज़ार कहाँ तलाशेंगी आप ?" मुझे पता है" वो देखो इंदिरा जी कहती हैं....संजय ने देखा एक जगह कूड़े का टीला बना हुआ है,इंदिराजी कहती हैं "इसी कूड़े के नीचे मेरा राजीव दफ़न है,मैं उसकी आत्मा की शान्ति के लिये ऊपर वाले से दुआ मांगती हूँ,औरचल कर उस कूड़े के टीले के नज़दीक जाती हैं और देखता है इंदिरा जी ने कूड़े का बुके उस कूड़े के टीलेनुमा स्थल पर चढ़ा कर प्रणाम किया,चारों तरफ़ फ़ैले कूड़े के संसार में इंदिराजी, कूड़े मे से रास्ता बनाती एक ओर चल देतीं हैं और टाटा करतीं नज़रों से ओझल हो जाती है। मित्र अब अपने को इस कूड़ारूपी इस संसार में अकेला पाता है तभी उसकी नींद टूट जाती है।

आखिर ऐसे सपने आते क्यौं हैं?इन सपनों का राज़ क्या है? क्या जिस समाज को हम बेहतर बनाने में लगे हैं क्या वो कूड़े में तब्दील होता जा रहा है?



Monday, March 31, 2008

खुली चिट्ठी, अज़दक और अनामदास के नाम.....

आजकल दो लोग बकलमखुद की सरकलम करने मे लगे हैं दोनों लोगों ने अपने अपने हिस्से का थोड़ा थोड़ा सच लिख कर अजित जी को जताया कि अब अपने बारे में जो कुछ भी लिखने की सोच रहे है, उससे पढ़ने वाले तो परेशान होंगे ही लिखने वाले की भी नींद हराम ही रहेगी ,अब यहाँ सवाल ये उठता है कि कौन कौन सी बात वो आम करना चाहते है ये तो वो जाने पर वाकई यहाँ किसे फ़ुर्सत है कि थोड़ा समय निकाल कर सबके जीवन को विस्तार से पढ़ सके,अब ऐसी सूरत में मुझे तो यही लगता है कि इतना हो हल्ला से बढ़िया है कि कुछ ना कुछ तो सामने लायें ही।

ये तो सही ही है कि अभी हम एक दूसरे को ठीक से जान भी नहीं पाये हैं,थोड़ा बहुत जो लिखते हैं उनका एक चेहरा हम देख पा रहे हैं,अनामदास जी की तो बात ही अलग है,यहाँ ब्लॉगजगत में अनामो बेनामों का जो हाल है ऐसे में अनाम का भी एक चेहरा बना लेना कम बड़ी बात है क्या ? अनामदास के लिखे को सभी सर आँखों पर लेते हैं,ऐसा भी नहीं कि अनामदास, धारा के विरूद्ध कुछ सनसनी टाइप लिखते हों किसी भी तरह चर्चा में बने रहने की जुगत में लगे हों या विवादों से घिरने की वजह से हम उन्हें जानते हों ऐसा तो कम से कम नहीं ही है, कौन कहता है कि आप अपना अतीत खोल खोल कर बताइये,आप उतना ही खुलिये जितना खुले हैं,अब जब से दोनों की पोस्ट बकलमखुद पर आयी है, मतलब अज़दक और अनामदास की तब से देख रहा हूँ और जो लोग लिखने का मन बना रहे थे वो भागने की तैयारी में है, जो कहीं से भी उचित नहीं है..


तो आपसे गुज़ारिश है कि आप अपने जीवन का जो भी अंधेरा उजाला है, जो भी अतीत में गुज़रा है, उसमें से जो आपको प्रसंग उचित हो हमसे बाँटिये ज़रूर, एक तो ऐसे ही ब्लॉग जगत पर आरोप लगते रहते हैं कि एक अजीब सी वर्चुअल दुनियाँ है, जिसमें कोई किसी को ठीक से जानता भी नहीं है,अपने पड़ोसी तक से मिलने से बचता है वो मानुष किसी भी ब्लॉग पर अहा अहा, वाह वाह और क्या बात है! और ना जाने किस किस तरह की टिप्पणी करता है,इन्हीं मे से कुछ विश्वासी दोस्त बने रहते है,कुछ तो खाना पीना छोड़कर,किसी नये विषय पर लिखने की सोचते रहते हैं, जिन्हें जानते नहीं उनके ब्लॉग पर नि:संकोच टिप्पणी करतेहै, किसी को बचपन याद आ जाता है,किसी के लिये नई जानकारी के लिये धन्यवाद लुटाता रहता है आखिर ये कैसी दुनियाँ हमें मिली है?या हम बना है?

इस दुनियाँ से किस किस तरह के लोग जुड़े है, ये तो हमे जानना चाहिये,और अगर अजितजी आप से मुख़ातिब होकर अपने अनुभव बाँटने की बात कर रहे है, तो क्या गलत कर रहे हैं,ये मेरी समझ के बाहर है... भाई कोई मुझे समझाएगा?

Thursday, March 27, 2008

धीरे धीरे मचल ऐ दिले बेक़रार.....ब्रायन सेलेस

हने को तो बहुत सी बाते हैं कहने को,पर आज कुछ भी करने का मन नहीं है, जब कुछ भी करने का मन ना करे तो, संगीत आपको अंदर तक तर करने की कूवत तो रखती ही है,आज एक गीत सुनाने का मन कर रहा है जिसे लता जी ने अनुपमा फ़िल्म के लिये गाया था, मेरे बेहद पसंदीदा गीतों में भी ये गीत शामिल है...धीरे धीरे मचल ए दिले बेकरार कोई आता है......आज इसी गीत को ब्रायन सेलेस से सुनते हैं प्यानों पर...वाद्य यंत्रों में खास कर प्यानों पर इस गीत को सुनने का एक अलग ही मज़ा है....तो सुने और आनंद लें....

Sunday, March 9, 2008

खोया हुआ बच्‍चा, खांसता बूढ़ा और आंसू बहाती मीना कुमारी

इतनी सारी उलझनें कि किसी का घर खो जाता है, बुड्ढा खांसता है और खांसता चला जाता है... दोनों अपनी-अपनी जगह अकेले हैं... सिर पर मुसीबतों के भारी-भारी ऐसे तकलीफ़देह ढेले हैं... कौन करेगा इनकी मदद? कोई करेगा?



ठुमरी पर पॉडकास्‍ट: एक प्रयोग

सब हसरतों का खू़न किये जा रहा हूँ मैं..कव्वाली रिज़वान-मुअज़्ज़म की


नुसरत साहब को सुनना वैसे भी सुखद रहता है...पर अभी इरफ़ान की टूटी बिखरी में सुना तो मुझसे भी रहा नही गया,आज नुसरत साहब को सुन कर रिज़वान मुअज़्ज़म की कव्वाली आपको सुनाने का मन है,रिज़वान-मुअज़्ज़म नुसरत साहब के भतीजे हैं,कहते हैं कि नुसरत साहब की विरासत को सम्हालते हुए इन्हें कामयाबी भी खूब मिली है..बहुत से शो इन लोगों ने पाकिस्तान से बाहर भी किये है, रिज़वान- मुअज़्ज़म के बारे में इतना ही कि नुसरत साहब के जाने के बाद उनकी परम्परा को बड़ी सफ़लता से आगे बढ़ा रहे हैं,इनकी कव्वाली दमदार हैं अंदाज़ के क्या कहने, पर आप भी सुने और आप खुद ही फ़ैसला करें,अगर आप खरीदने के उत्सुक हैं तो यहाँ पर क्लिक कर के जानकारी ले सकते हैं.तो पेश है उनके एलबम डे ऑफ़ कलर्स से दो चुनी हुई कव्वालियाँ..पिछले दिनों यूनुस जी ने मखदूम पर विशेष पोस्ट चढ़ाई थी उसे भी सुने..

मोरे मख़दूम बाजे मधुर बंसुरी.....



सब हसरतों का खून किये जा रहा हूँ मैं....

Monday, March 3, 2008

कौवा बोला काँव- काँव


अस्सी के दशक में हमने नाटककार मणिमधुकर का लिखा एक नाटक किया था, जिसका

नाम था.... रस गंधर्व, अब तो इस नाटक की स्मृतियाँ ही शेष रह गई हैं, फिर भी इस नाटक से

जुड़ी कुछ पंक्तियाँ आज भी मुझे कुछ कुछ याद हैं.......... जो भी याद आ रहा है लिखने की कोशिश कर रहा हूँ

अब अगर कुछ अधूरा रह गया हो जो मुझे लगता है, तो भूल चूक लेनी देनी मानकर पूरा भी कर दीजियेगा,

इतने सालों बाद भी ये पंक्तियाँ भूले भटके मेरे जेहन में आती जाती रहती हैं तो आज मैने सोचा ठुमरी पर डाल ही दूँ . जिन्हें ये अधूरा लग रहा हो वो इसको पूरा भी सकते हैं,


कौवा बोला काँव-काँव

आला झाला

देश निकाला

एक थी जिद्दी

सुन्दर बाला

सबका चित्त

चंचल कर डाला

गई ढूंढने मोती माला

किंतु मिला

लोहे का भाला

परनाले में फ़ंस गया पांव

कौवा बोला काँव-काँव

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तीन तिलंगे


तीन तिलंगे

लगे नहाने हर हर गंगे

उड़ गई धोती

रह गये नंगे

Saturday, February 23, 2008

इस बालक को पहचानते हैं?

फुटपाथ पे रहने वाले बालक को देखिये, पैसे के अभाव में स्कूल छूट गया पर पैसा कमाने के वास्ते छै सात भाषाएं टूटी फूटी ही सही जानता है, दु:ख भी होता है और आशचर्य भी,.... इतनी सी उमर,लेकिन महानगर में पेट पालने के लिये दूसरे पर्यटकों को आकर्षित करने के लिये ही सही...भाषाएं सीखना तो उसकी मजबूरी है.....पर यही खासियत भी है.......ज़्यादा बोलने से इस वीडियो का मज़ा जाता रहेगा, तो सुनिये इस चपल बालक की चटपटी बातें..

Friday, February 22, 2008

कैरेबियन चटनी में मुरली की धुन..

सुदूर कैरेबियन कबाड़खाने से कुछ कबाड लेकर आया हूँ,आज आपको कैरेबियन संगीत में भजन गाते है उसे आप यहां सुनेंगे,कैरेबियन चटनी होती है झमाझम
संगीत और मधुर कंठ, आज थोड़ा भजन सुनिये,सैम बूधराम की मस्त आवाज़ का जादू,तेज़ कैरेबियन संगीत के बीच खांटी सैम की आवाज़ कम से कम मस्त तो करेगी ही... आपको अंदर से थिरकने पर मजबूर भी कर देगी, वैसे सैम ने बहुत शानदार चटनी गाई हैं...पर चटनी में भजन जैसा कुछ सुनने को मिले तो आप कैसा महसूस करेंगे, अब ज़्यादा ठेलम ठेली के चक्कर में मज़ा जाता रहेगा तो पहले एक तो मुरलिया आप सुने और दूसरा जै जै यशोदा नंदन की...सुनिये, हम तो अपने लोक गीतो को मरते हुए देख रहे है... पर सोचिये हज़ारों मील दूर, हमारे भाई बंधू अब तक उन गानों भजनों को अपने कबाड़खाने में संजो कर रखे हुए हैं, ये क्या कम बड़ी बात है।

तो दोनो रचनाएं Sam Boodram की हैं

बाजत मुरलिया जमुना के तीरे..............



जै जै यशोदा नंदन की.....

Tuesday, February 19, 2008

मेकाल हसन बैण्ड..... सुनेंगे तो मुरीद हो ही जाएंगे....


ब्लॉग पर पतनशीलता पर कुछ उच्च कोटि के अनुभव, मित्र लोग ढूंढ कर ला रहे हैं, अब बहस के बीच संगीत से मन को
हल्का करें इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है ..तो इसी बात पर आपके लिये लाया हूँ मेकाल हसन बैण्ड की दो रचनाएं ।

साथियों,मन की बात तो ये है कि जब मन अनमनाया हो तो मन को हल्का करने में संगीत की भूमिका बड़ी होती है...तो आज कुछ रचनाएं सुनिये और सुनाइये, मेरी पसन्द की दो रचनाएं सुने,ये दोनो रचनाएं . SAMPOORAN अलबम से हैं।

पहली रचना सम्पूरन (SAMPOORAN).......संगीत की हारमनी अद्भुत तो है ही....धीमें धींमें बाँसुरी की धुन समां को
बाँध कर रख देती है...और फिर जो माहौल बनता है उसे आप सुन कर ही आनन्द ले पायेंगे तो सुनिये...



दूसरी रचना दरबारी है.... कुछ यार मन बयां बयां.... ज़रा इसे सुने तो दुबारा सुने रह ना पायेंगे..

Monday, February 18, 2008

इन्हें रोज़ एक राखी सावन्त चाहिये.......

ब्लॉग जगत में भी धोनियों की कमी नहीं है,ऐसा मैं इसलिये लिख रहा हूँ कि वैसी ही स्थिति कमोबेश ब्लॉगजगत में भी आ गई है,अपनी कमी को छुपाते हुए बहस का रूख कहीं और कर देना। पर यहां ऐसे लोग खखार कर थूकने लगे हैं ये कभी सोचा ना था, सोचा था कि यहां सूकून होगा,पर इ ससुर के नाती किसी को चैन की सांस भी लेने नहीं देंगे, कोई किसी को दलित विरोधी बता कर बहस को गर्म करने के फ़िराक में है, तो कोई प्रगतिशीलता का चादर भर ओढ़े है और चीख चीख कर जताने की कोशिश में है कि वो प्रगतिशीलता को ओढ़ता बिछाता और उसी पर सोता है और उसी पर हगता मूतता है,किसको बता रहे है ये सब समझ में आता नहीं,और इन सारी कवायद के पीछे तथाकथित पत्रकार बंधुओं की संख्या ज़्यादा है, इनके दिमाग से जो इनके चैनल पर रोज़ दिखता है ये उसी सनसनी को ब्लॉग में भी आज़माने की कोशिश करते हैं, इन्हें रोज़ एक राखी सावन्त की ज़रूरत पड़ती है... अगर नहीं मिली तो किसी को भी राखी सावन्त समझकर झपट पड़ने की मंशा हमेशा बनी रहती है।

इन्ही की वजह से मुम्बई में राज ठाकरे राज ठाकरे बना......मतलब किसी भी बहस को अपनी ओर मोड़ने में ये किसी भी हद तक जा सकते है...... अगर बहस थोड़ी फ़ीकी पड़ रही हो तो किसी खौरहे कुत्ते की तरह भांति गुर्र्र्र्र्र्र्र्र्र गुर्र्र्र्र्र्र गुर्राते रहेंगे अगर बात ना बनी तो तो बेनाम टिप्पणियों से उस मुद्दे को ज़िन्दा रखने की जुगत में लगे रहेंगे.....सामाजिक चिन्ता तो ऐसे ज़ाहिर करेंगे जैसे बस अब संन्यास लें लेंगे कि मानो जनता तो इन्हीं की राह देख रही हो... छटपटा रही हो, पर किसी को क्या मालूम, ये जो भी बखेड़ा खड़ा कर रहे हैं उसका किसी जनता, किसी दलित या किसी आम आदमी से कोई लेना देना ही नहीं है... उल्टे उसकी मंशा है कि किसी भी तरह उसके ब्लॉग पर लोगों की आवाजाही बनी रहे.....बस.......! क्या इससे भी ज़्यादा कोई सोच सकता हो तो मुझे बताएं....

कुछ तो इसमें कलम के जगलर हैं इन्हें पहचानने की ज़रूरत है....जगलरी बुरी नहीं है पर उसकी दिशा? ज़रूर सही होनी चाहिये, अब आप कहेंगे कि ये कौन तय करेगा, तो मैं सिर्फ़ यही कहूंगा कि ये पाठक तय करेगा...क्योकि बिना पाठक के ब्लॉग का कोई महत्व नहीं है,और जो लोग हिट पाने के लिये ही इस खुराफ़ात में लगे है... तो उनसे मेरा कहना यही है कि बड़े दिनो बाद ब्लॉग की वजह हिन्दी में अच्छा पढ़ने और गुनने को मिल रहा है...उसको यूँ ही हवा में ना उड़ाएं, अभागे कुम्बले को देखिये सत्रह साल खेलने के बाद कप्तानी मिली,सबने सोचा था ऑस्ट्रेलिया में सब गोलमगोल हो जाएगा पर नियत का खेल देखिये, आज वहां से लौटकर उसकी गरिमा और बढी है पर धोनी साहब का जो हाल है पता ना पावें सीताराम,.. जब भारत लौटेंगे तो कितनी गरिमा रह जाएगी ये जब वो वापस आएंगे तो सबको पता चल जाएगा.......धोनी साहब को देखिये दिमाग दीपिका पर लगा है...पर बात वो देश के गौरव की करते हैं....वैसे ही अपने यहां ब्लॉग पर कुछ इससे अलहदा बात मुझे नज़र नहीं आती...किसी पर हंसना अच्छी बात है पर उसका मखौल बनाकर दल बना कर लिहो लिहो करना ये अच्छी बात नहीं है
तो आखिरी में किसी की एक लाइन कहकर बात समाप्त करता हूँ.....सूप त सूप चलनियों हंसे....जामें बहत्तर छेद ....

Thursday, February 7, 2008

Anthem Without Nation

बीती रात मुम्बई की सबसे सर्द रात में एक थी..पारा ९.२ तक पहुँच गया था, कहते हैं पिछले ४०-५० सालों में ऐसी सर्दी नहीं पड़ी थी,जितनी सर्दी ज़्यादा पड़ रही है........और ऐसे मौसम में मुम्बई में गर्मा गर्मी कुछ ज़्यादा ही दिखाई दे रही है।

ये जो मुम्बई में जो कुछ हंगामा हो रहा है,मैने अपनी नंगी आँख से भी देखा तक नहीं है.. जो कुछ भी देखा है टीवी पर ही देखा है,जो कुछ भी हुआ अफ़सोस जनक है..मेरा इस पर कोई विचार देने का इरादा तो कतई नहीं है,पर इतना तो है मुम्बई में रहते पंद्र्ह साल हो गये हैं पर कभी भी अपना अपना सा लगा नहीं, अपने इलाहाबाद को हम तो सीने से लगाए रहते है और उसी आस में हम यहां किसी सड़क के किनारे चाय की दुकान खोजकर मित्रों या परिवार के संग तबियत से बैठकर चाय की चुस्की ले लें तभी मज़ा आ जाता है ,पर यहां मुम्बई का रगड़ा पेटिस,उसल पाव,मिसल पाव, पव भाजी आजतक मुझे भाया नहीं,यहाँ वड़ा पाव भी कभी कभी ही खाने मन करता है....पर खाने के बाद पेट की ऐसी तैसी वो अलग ।

और अब ठाकरे की मेहरबानी से वस्तुस्थिति पता चल रही है सबकुछ देख कर लगा कि मराठी भाइयों के दिल में कुछ तो पक रहा था काफ़ी दिनों से, और मीडिया के हवा देने पर इतना कुछ हो गया फिर भी राज को व्यापक जनसमर्थन नहीं प्राप्त है , ये देखकर अच्छा लगा ...... पिछले दिनों एक बात तो लग रही थी, जब ये देखा की पूरब के भाई लोग सर पर टोकरी रख कर सब्ज़ी या मछली घर घर बेच रहे थे तो स्थानीय लोगों के विरोधी स्वर सुनाई दे रहे थे... पर लगा देखो ये सब पैसे के लिये कितना मेहनत करते हैं.. और स्थानीय लोग थोड़ा अपना रूआब रखते हुए.. घर घर जाकर माल बेचना पसन्द भी नहीं करते...लेकिन इनकी कमाई देखकर स्थानीय लोगों में असन्तोष साफ़ दिखा....पर यहां नौकरी-पेशा लोगों में इतना वैमन्यस्यता तो मुझे दिखाई नहीं देती।

मीडिया के कुछ ज़्यादा ही सनसनी फैला्ने से हम यहां मुम्बई मे रहकर थोड़ा असुरक्षित महसूस करने लगे हैं, जिन घटनाओं को मैने टीवी पर देखा टैक्सी वाले को मार खाते हुए,खोमचे वाले का सारा माल सड़क पर फैला है खूब अच्छे से लोग उस खोमचे वाले की धुनाई कर रहे है,या देखा लोकल ट्रेन में किसी कमज़ोर आदमी को पिटते हुए....तो बड़ी ग्लानि हो रही थी, आखिर हम कैसी जगह रहते हैं?कैसे लोगों के बीच हमें रहना पड़ रहा है, जो अपनी बदहाली के लिये दुष्मन को चिन्हित ही नहीं कर पा रहे और आस पास के लोगों पर अपना गुस्सा उतार रहे हैं, बेरोज़गारी,और भाषा के नाम पर उलझे पड़े है.. पर इसके ज़िम्मेदार लोग राज ठाकरे को थोड़ा चढ़ाकर शिवसेना के टक्कर मे लाकर वोट को कुछ इस तरह बाँट देना चाहते हैं कि फिर से चुनाव में वोट की फ़सल काट सकें,और लोग लड़ते रहें,सरकार है कि मुस्कुरा रही है ।

कैसे हो गए हैं हम? कहाँ गई मुम्बई की स्पिरिट? सब समन्दर में समां गई क्या,?या जो कुछ अनामदास जी ने लिखा उसमें मज़ा ही ढूढते रहेंगे या इसका कोई हल भी सुझाएंगे? पर मैं तो इन सब पचड़ों में कहीं से पड़ने वाला नहीं, पता नहीं अभी और क्या क्या करना है.बीवी बच्चे माँ भाई और अपने लिये ही तो सब कुछ कर रहे हैं, तो जिनको सलाह देनी है वो दें, जिन्हें मज़ा लेना है वो लें,उन्हें रोकने वाला मैं कौन होता होता हूँ ................यही सब देख कर इन्ही मौज़ू पर एक गीत सुना था कभी, आज थोड़ा प्रासंगिक सा लगता है आप भी सुनिये... ...ANTHEM WITHOUT NATION शीर्षक से गीत Nitin Sawhaney की आवाज़ में है नितिन को मैने बहुत ज़्यादा सुना तो नहीं है पर आप सुनकर बताइयेगा यही उम्मीद करता हूँ, , तो मैं तो चला अपने काम धंधे पर ...पर जाते जाते .टी वी पत्रकारिता से जुड़े मेरे पुराने मित्र पंकज श्रीवास्तव की एक कविता जो उन्होने बीस साल पहले कही थी ....

दर्द में डूबे हुए दिन सर्द बड़ी राते हैं

मन को कितना समझाएं

बाते तो बातें हैं........

पर नितिन के गीत को सुनने से पहले एक शेर....... पन्द्रह साल मुम्बई मे रहकर भी ये शहर अपना सा नहीं लगता ।

ये सर्द रात ये आवारगी ये नींद का बोझ

अपना शहर होता तो घर गए होते



पले बढे़,इस ज़मीन पे हम जवान हुए
ये ना पूछो हमारे कैसे इम्तिहान हुए

पड़ा जिसे भी उस जुबान को अपना समझा
के हमने दिल से सब जहान को अपना समझा
ज़मीन से ले के आसमान को अपना समझा
सुना ये देश बेगाना है तो,हैरान हुए
पले बढ़े जो इस ज़मीन पे हम जवान हुए....

कदम कदम पे दो राहें समाजों के मिले
के हमसफ़र अलग- अलग से,रिवाज़ों के मिले
के रास्ते न हमें अपने अंदाज़ों के मिले
अजीब हादसे सफ़र के दरम्यान हुए

पले बढ़े इस ज़मीं पे हम जवान हुए

हमारी पाक मोहब्बत किसी को रास नहीं
हमें तो प्यार कि किसी से भी कोई आस नहीं
के क्या है इनमें अभी हमारे पास नहीं
ये सोचकर हम अक्सर ही परेशान हुए

पले बढ़े.इस ज़मीन पे हम जवान हुए
ये ना पूछो हमारे कैसे इम्तिहान हुए

हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में मुनीर नियाज़ी हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात क...