Friday, August 31, 2007

जीतते जीतते हार गये !! !!



अरे कल का मैच तो मैंने पूरा देखा...और सुबह सुबह तैयार होकर ऑफ़िस भी आ गया.. कुछ भी कहे ये टीम इंडिया के लिये तो बुरा ही था.. पर एक अच्छा खेल देखने को मिला, मैच अभी शुरू भी नही हुआ था साथियों के एस.एम एस पे एस.एम.एस आते रहे..क्या था उन एस एम एस में चलिये इस एस एम एस की कुछ कड़िया जोड़ने की कोशिश करता हूं..हम भारतीय जीत के प्रति कितने लालाइत रहते हैं ये आपको इन एस एम एस संदेश से पता लगेगा....

* भाई टॉस जीत गये हैं अब ये मैच भी अपने हाथ है.

* जीतना है.

* जीत अपनी सुनिश्चित है

* देखा सचिन को ,५० लगाते ही ठंडे

* अरे ये क्या कार्तिक को भेज दिया?

*लग रहा है लो स्कोरिंग मैच है.

* अरे सब आउट होते जा रहे हैं सबकी चर्बी बढ गई है.

* अरे ये साले खिलाड़ी नही है स्टार हैं.

* बड़ा कम स्कोर बना है अब बॉलर ही कुछ कर सकता है..

* इंगलैण्ड ये मैच बचा नही पायेगा अपना ज़हीर फ़ॉर्म में है.

* स्पिनर तो अभी बाकी हैं ये मैच अपना है..

*अरे ये आगरकर को भी विकेट मिल गया

* जब गला फ़ंसता है तभी विकेट लेता है...

* ए भाई इस पवरवा का बाल बहुत बढ गया है इसे कटवाओ भाई

*अब तो मैच हाथ में है आज सोईयेगा नहीं

* गुरु नींद आ रही है

*सोना मत कुछ भी करो पर जगते रहो

* देखना कुछ तो चमत्कार ज़रुर होगा.

* अब बॉलिंग में मज़ा नही आ रहा

* ये रवि बोपारा अगर आउट हो गया तो समझिये मैच हमारी झोली में है..

*ये साला स्टुअर्ट ब्रॉड भी साला जमा हुआ है अब लगता है अब जीत मुश्किल है
* दोनों दिमाग से खेल रहे हैं.

* अरे इनको कोई आउट नही कर पा रहा अब हम सोने जा रहे हैं

* भाई एक बात तय करके मैं तो सो जाउंगा..कि अब से ये क्रिकेट सिरकेट देखना बन्द. फ़ुट्बॉल इससे अच्छा है कम से कम ९० मिनट में खत्म तो हो जाता है.

* भाई आपको भारत की हार मुबारक, मैं तो सोने जा रहा हूं.. वैसे भी मैं हार देख नहीं सकता..

*ये साला द्रविड़ बेहूदा कप्तान है...

* ल्ल्ल्ल्ल्ल गई भैंस पानी मॆं

* चलो सो जाते हैं साले रात खराब कर दिये.

भाई क्रिकेट एक ऐसा खेल है जो वाकई खेल भावना से देखो तो मज़ा है, नही तो सज़ा , तो भाई खेल देखो और खेल की धार देखो... .....ये ज़रूर है कि यहां खेल से बड़ा खिलाड़ी होता जा रहा है जो चिन्ता की बात है.. हां अगर कोई और खेल हो दिल लगाने का तो अवश्य बताएं.. अंगरेज़ों का खेल कह कर भागिये नहीं.....!!!!!!

Monday, August 27, 2007

झमाझम बरसात में !!


मुम्बई में झमाझम बरसात का आलम है. ज़माने पहले ऐसी बरसात में भीगने में मज़ा आता था, पर अब बहुत कुछ बदल गया है अब बरसात को खिड़कियों से या अपनी बालकनी से देखते हैं और इस बरसात का मज़ा लेते रहते हैं. बचपन में ऐसे मौसम में खूब धींगा मस्ती होती थी जो अभी भी हमें याद है. हम अपने दोस्तों के साथ बरसात के इंतज़ार में दौड़्कर छत पर या कहीं सड़क पर शुरू हो जाते और खूब ज़ोर ज़ोर से सम्वेत स्वर में जो गाते थे. उसी में ऐसा लगता कि जीवन तर गया हो.....
दो पैसा के हल्दी!
पानी बरसे जल्दी!!

पर आज मैं अपने मित्र अजय कुमार की कविता आपके लिये लेकर आया हूं अजय अपने को कवि भी मानते नहीं हैं पर अलग अलग मौकों पर वो कुछ ना कुछ लिख ही देते हैं और हम सुनकर वाह वाह भी करते हैं. ये कविता आज ही ताज़ा ताज़ा लिखी गई है. मेरे पास उनकी कोई फोटो भी नही है जो इस मौके पर लगा देता, लीजिये पेश है अजय कुमार की कविता ......

घिर आई घनघोर घटायें !
बैठा हूं तन्हाई में!!
कैसे तेरी याद न आये!
सावन की पुरवाई में!!
तेरी पायल छनक रही है!
या सावन की रिमझिम है!!
सौ प्यालों का नशा छुपा है!
तेरी इक अंगड़ाई में !!

Thursday, August 23, 2007

काहे की मुक्ति...

मुक्ति....मुक्ति.....मुक्ति...आखिर आदमी मुक्ति क्यों पाना चाहता है, किस चीज़ से मुक्त होना चाहता है.... शरीर से, समाज से, या इस पूरे ब्रम्हांड से... जब उसे पता ही नहीं कि कहां से आया है और जाना किधर है.. तो मुक्ति पाकर वो सिर्फ़ इस संसार से मुक्त होना चाहता अगरचे ये कहा जाय तो जीवन के इस झमेले से भागना चाहता है.. जहां नित नये रेले पेले में अपनी ज़िन्दगी गर्त में जाते देखता रहता है... पर अभी भी सही इलाज़ नही ढूढ पाया है. पर मेरा उद्देश्य यहां किसी मुक्ति की सुक्ति ढूढना कतई नही है, क्योंकि मेरे लिये भी ये सारी चीज़ें मगज में खाली पीली बूम मारने जैसा ही है...

अरे, आप इस दुनिया को समझना चाहते हैं तो पता नहीं कितने जन्म लें फिर भी समझ पाना मुश्किल ही है.. अगर आप समझ भी गये तो हमारा क्या भला होने वाला है? अपने उमर के आखिरी पल में आपको सत मिल भी गया तो किसी को क्या लेना देना......अब मेरे लिये भी इस विषय पर ज्ञान देना भारी पड़ रहा है.... असल में मेरा ये विषय भी तो नहीं है.... असल में मुझे पता भी नही कि किस क्षेत्र में मैं अच्छा दखल रखता हूं.. जीवन से मुझे क्या चाहिये बस ये.... कि मेरे पास सारी ऐशोआराम की चीज़ें हों..सिर पर कोई ज़िम्मेदारी न हो..बात करने के लिये ढेर सारे दोस्त हों..तो शायद ये दुनियां मुझे भी सुन्दर लगने लगे...मैं यहां से जाना ही ना चाहूं और रही बात मुक्ति की तो उसकी इच्छा भी न रहे... अरे, कुछ बात बन भी रही है कि मैं ऐसे ही लिखे जा रहा हूं?....

मन अजबजा गया हो तो इस पेज के सबसे नीचे मुक्ति को चट्काइये देखिये मुक्ति नाम की छोटी सी फ़िल्म जिसे बनाया है साथी गजराज ने..देख कर मन भारी हो जाय या आप खुल कर समाज पर हंसिये और सोचकर बताइये कि आखिर इन सब चीज़ो से मुक्ति मिलेगी की नही?.. या सब वैसे ही चलता रहेगा...

Monday, August 20, 2007

तो मुन्ना भाई को मिल गई जमानत


तो मुन्ना को जमानत मिल गई क्यों नही मिलती बताइये, अरे बताइये भाई, अरे आप नहीं जानते तो जान लें, पूरे घर की ज़िम्मेदारी भी तो मुन्नाभाई पर ही तो है ,साल में थोड़ी सी फ़िल्म मिल जाती है और किसी तरह से आठ दस करोड़ कमाकर घर का गुज़ारा चल जाता है..एक बहन है जो बहुत ही गरीब सांसद है, पिता भी अभिनेता और सांसद दोनों रह चुके ,वोअब इस दुनियां में नहीं हैं,बेटी है जो अमेरिका में है, एक कन्या है मान्यता कहते हैं मुन्नाभाई उससे शादी का इरादा रखते हैं,बताइये मुन्नाभाई कितने अच्छे आदमी हैं एक अच्छे इंसान होने के एवज में या यूं कहें सीबीआई की सहायता से न्यायालय से जमानत आखिर मुन्ना भाई को मिल ही गई..उसके पास से टुइयां सी एके ५७ ही तो मिली थी और कुछ ग्रेनेड मिले ,पर मुन्ना भाई तो ये सारा जखीरा, कहीं दंगा फ़साद ना हो जाय इसलिये बचाव के लिये रखे थे, एक दम निर्दोष हैं बेचारे हां, अगर यही काम किसी और ने किया तो वो देश द्रोही? सही है, सही है बेडू ,अपना हिन्दोस्तान सही जा रहा है .... अब कम से कम बेचारे प्रोड्युसरों का पैसा बर्बाद होने से तो बचा.. सबके साथ कितना न्याय करती है ये न्यायालय... खैर मनाईये कि मुन्ना के चक्कर मे कुछ लोगों को जमानत मिल गई... नही तो सब के सब पडे रहते जेल मे और पीस रहे होते चक्की का आटा...अच्छा है अच्छा है लगे रहो मुन्ना भाई...

Friday, August 10, 2007

आखिर आज़ादी का मतलब क्या है?

स्वतंत्रता दिवस की तैयारी में सरकार व्यस्त है, जनता अपने में बेहाल है। मस्त है। बाज़ार का सूचकांक चढ़ना उतरना बना हुआ है। झुग्गियों मे रह रही जनता जैस तैसे बरसात में जहां-जहां से छत टपक रही है वहाँ प्लास्टिक लगाती-चढ़ाती त्रस्त है। नौनिहाल अपने स्कूल के ड्रेस को धो रहे हैं, अपने सफेद जूतों में और खली लगाकर उसको चमकाने की जुगत में है। स्कूल का प्रिन्सिपल स्कूल के स्टोर से किसी बक्से के कोने मे पड़े तिरंगे को ढुढवा रहा है। मीडिया हमे टीवी पर बता रहा है कि दिल्ली विधान सभा मे एक आदमी कैटीन चला कर पांच हज़ार से ज़्यादा प्लाट खरीद लेता है, गाड़ि‍यां ऐसी जो मर्सिडिज़ से भी मंहगी है। उसका मालिक बना काफ़ी समय से इतरा रहा था, आखिरकार कानून के हाथ चढ़ा। नेताओं की खरीद-फ़रोख्त संसद और विधान सभा मे धड़ल्ले से हो रही है, इसी में कुछ हैं जो मुजरिमों को सज़ा पर सज़ा दिये जा रहे है। ऐसा लगता है कि सारी व्यवस्था मानो सही चल रही है। कुछ इस बात में शान देख रहे हैं तो कुछ को लगता है कि साम्प्रदायिक नेता और संसद और विधानसभा से जुड़े जननायकों के किस्से इन न्यायालयो की दीवारों मे दफ़न हैं। एक छोटा सा वर्ग है जो धन के अकूत, बडे हिस्से पर काबिज़ है, इसकी कभी सुध होती है कभी भूले रहते हैं, जो नहीं भूलते हैं वह यह कि अगस्‍त महीने में नियम से स्वंतन्त्र्ता की वर्षगांठ की तैयारी करने लगते हैं!

आखिर आज़ादी का मतलब क्या है?
तिरंगा ऐसा क्यों हो गया है जो सिर्फ़ क्रिकेट के मैदान में ही लहाराया जाता है, और हार हो तो मैदान से गायब, ऐसा क्यों? शहर के चौराहे पर गरीब बच्चा हाथ में छोटे-बड़े झन्डे बेच कर उस दिन की कमाई से किसी तरह अपना पेट पाल ले, ऐसा क्यों है? आज आज़ाद देश में ऐसा भी हो रहा है कि एक विकलांग अपनी छोटी सी मांग के पूरा नही होने पर आत्महत्या करने पर मजबूर है। ये कौन लोग हैं जो विकलागों को बेबस और मजबूर बना रहे हैं, ऐसा क्यों है? क्या हम इस सबके आदी हो गये हैं? सब चलता है इस वाक्य को हमने अपना ब्रम्ह: वाक्य बन जाने दिया है? और इसी ब्रह्म: वाक्‍य की छतरी के नीचे प्रेम से देशभक्ति का गीत भी गाते रहते हैं, और हमें शर्म भी नहीं लगती? आइए, फिर से गाने या रेंकने लगें: जहां डाल डाल सोने की चिडिया करती थी बसेरा ये भारत देश है मेरा ये भारत देश है मेरा....