Tuesday, July 15, 2008

नाटककार बादल सरकार के जन्मदिन के बहाने....कुछ यादें



आज १५ जुलाई है आज के दिन मशहूर नाटककार श्री बादल सरकार ८४ साल के हो गये हैं.....उनके जन्म दिन पर हमारी हार्दिक शुभकामनाएं........वैसे तो बादल सरकार मूलत: बंगला में नाटक लिखते रहे हैं पर उनके सभी नाटकों का हिन्दी में अनुवाद हुआ और उनके नाटक खूब लोकप्रिय भी हुए, मैं तो उनको इसलिये भी याद कर रहा हूँ कि मेरे रंगमंच की शुरुआत बादल सरकार के थियेटर वर्कशॉप से हुई थी.....८० का दौर था तब मैं भी नया नया रंगमंच से जुड़ा भर ही था,बादल सरकार का नाम तो मैने सुना ही नहीं था और एक भी नाटक मैने न देखे थे न पढ़े थे, सबसे पहले तो मैं थियेटर वर्कशॉप होता क्या है इसी की पूछ ताछ में लगा हुआ था......तो समझिये बादल दा के बारे में मैं क्या जानता रहा होऊंगा.....खैर जब तक बादल सरकार आए तब तक मैने उनके लिखे काफ़ी सारे नाटक पढ़ लिये थे....... नाटकों को पढ़ के समझ में ये आया कि बादल सरकार कम से कम पी.सी सरकार के भाई नहीं हैं........और जब बादल दा आए तो एक नई बहस लेकर आए थे....वो था प्रोसीनियम थियेटर और उससे अलग थर्ड थियेटर...पता चला कि पोलेन्ड के ग्रोतोव्स्की और रिचर्ड शेखनर से प्रभावित होकर बादल दा थर्ड थियेटर के बारे में बड़ी गहराई से रंगप्रयोग मे लगे थे .मैं उस समय इन सब चीज़ों को नज़दीक से देख रहा था....मेरे लिये ये समय ऐसा था कि कुछ भी गम्भीर बात बोलते हुए मुझे डर लगता था.....सिर्फ़ सुनता था और सुनता ही था......करीब एक महीने के वर्कशॉप ने मेरा नज़रिया ही बदल के रख दिया था....लगा कि ये लोग मुझे पहले क्यौ नहीं मिले ......अपने अन्दर हो रहे परिवर्तन को मैं साफ़ महसूस कर रहा था......

मै तो बादल दा के बगल में बैठ कर अभिभूत भाव से यही सोचा करता कि " देखो कितने बड़े नाटककार के बगल में बैठा हूँ" क्यौकि अभी भी मेरी समझ कच्ची थी....तो वैसी स्थिति में बादल दा से बातचीत कर पाना मेरे लिये मुश्किल ही था समाज,रंगमंच इन सब पर हो रही बहस कोबहुत ध्यान से सुनता ज़रूर था।.स्पार्ट्कस,भोमा,पगला घोड़ा,एवम इंद्रजीत,बाक़ी इतिहास,बड़ी बुआ जी,सारी रात,जुलूस,बल्लभगढ़ की रूपकथा,घेरा इतने सारे नाटक समझिये एक सांस में पढ़ गया था, सबकुछ जल्दी से जान लेने की इच्छा थी...तो उस हड़बड़ी की वजह से उनके नाटक की कुछ बातें समझ में आयीं कुछ ऊपर से निकल गयीं.......पर पढ़ने को मैं सब पढ़ता चला गया था......!

तब के दौर में प्रोसीनियम, नॉन प्रोसीनियम की बहस ज़ोरों पर थी...हमारे निर्देशक को भी थर्ड थियेटर ही भविष्य का वैकल्पिक थियेटर नज़र आता था.....प्रोसीनियम रंगमंच के विरुद्ध लोगों का मानना था कि प्रोसीनियम रंगमंच में जिस तरह के ताम झाम होते हैं वो अपने जैसे इस गरीब देश के लिये तो एकदम ही सम्भव नहीं है...लिहाज़ा थर्ड थियेटर ही उसका विकल्प बन सकता है....तब समय था जब लोग कथ्य से अलग रंगमंच के "रूप" पर बहस में लगे थे...लीविंग थिएटर कलकत्ता के प्रबीर गुहा, बारबा से प्रेरणा लेकर फ़िज़िकल थियेटर में संलग्न थे....तो लखनऊ की लक्रीस से जुड़े शशांक बहुगुणा अपने साइको फ़िज़िकल थियेटर में प्रयोग करते रहे........


बादल दा जनता के बीच चर्चित नाटक मिछिल(जुलूस) करते हुए

एक बार लखनऊ में मैं शशांक बहुगुणा के साईको फ़िजिकल थियेटर वर्कशॉप करने गया....मेरे दिमाग में ये तो साफ़ था कि बिना मन और शरीर के कोई भी थियेटर सम्भव नहीं है...फिर भी ये साइको फ़िज़िकल थियेटर आखिर क्या बला है ? जानना चाहता था...एक महीना गुज़ारने के बाद मैने शशांक जी से पूछा कि "आप आपने रंगकर्म को साइको फ़िज़िकल थियेटर का नाम देते है.......पर क्या बिना साइक और बिना शरीर के क्या नाटक सम्भव है? तो शशांक जी सिर्फ़ मुस्कुरा भर दिये..........खैर एक समय था जब आज़मगढ,इलाहाबाद और लखनऊ में एक नाटक का समारोह हुआ था ....जिसमें बादल सरकार अपने नाट्य दल शताब्दी के साथ.....बासी खबर,और मानुषे-मनुषे,प्रबीर गुहा अपने लीविंग थियेटर ग्रुप के साथ अब्दुल हन्नान की मौत, शशांक बहुगुणा अपनी मंडली लक्रीस के साथ बाकी इतिहास,तुगलक,इलाहाबाद की दस्ता ने जुलूस,आज़मगढ़ की समानान्तर संस्था अनिल भौमिक के साथ भोमा और स्पार्टकस नाटक के प्रदर्शन किये थे,इस समारोह की खास बात थी सारे नाटक मंच को छोड़्कर दर्शकों के बीच किये गये थे ....इन नाटकों में दर्शक भी एक पात्र होता था... उस दौरान मैने भीबादल दा का लिखा नाटक भोमा और स्पार्टकस नाटक में मैने भी काम किया था.....पर सुखद ये था कि बादल दा को मैने भी नाटक में अभिनय करते देखा था....सारी प्रस्तुतियाँ अच्छी थी पर शशांक बहुगुणा जी ने जिस तरह बाकी इतिहास किया था वो नाटक तो आज भी स्मृतियों में ज़िन्दा है ..........वर्कशॉप से अलग बादल दा के इतने सारे नाटकों को देखना मेरे लिये सुखद एहसास था.......और खरदा बंगाल के प्रबीर गुहा की प्रस्तुति अब्दुल हन्नान को देखकर अचम्भित रह गया था जिस सर्कसी अंदाज़ में नाटक की प्रस्तुति की गई थी, वो देखने लायक थी...पर उस नाटक को देखकर पहली बार एहसास हुआ था कि कैसे किसी नाटक की प्रस्तु्ति पर" रूप "बुरी तरह हावी हो जाता है......और कैसे एक नाटक अपने" रूप" की वजह कहीं खो जाता है...........तो आज बस इतना ही ..............बादल दा के बहाने पुरानी यादें ताज़ा हो गईं .......


बादल दा को जन्मदिन की ढेर सारी बधाई!!

17 comments:

Udan Tashtari said...

बादल जी को जन्मदिन की हमारी भी ढेर सारी बधाई

और आपका बहुत आभार इस परिचय के लिए.

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

उम्दा एवं जानकारी भरी प्रस्तुति. बादल सरकार के बारे में अपने निजी अनुभव और बाँटिये, हमारी शिक्षा का काम होगा.

maithily said...

आपके संस्मरण बहुत बहुत बहुत अच्छे लगे.
80 के दौर की नाटक की दुनिया कुछ अलग ही थी.

अगली किश्त कब लिख रहे हैं?

Aflatoon said...

मैथिली जी की मांग से सहमत ,अनुभव भरी पोस्टें आती रहें। परसों 'हिन्दू' में बादल सरकार पर एक खबर थी - दुखद । उनके चेले उनके नाटक करते वक्त भी उनका नाम नहीं ले रहे हैं !

Ashok Pande said...

मैथिली जी वाला सवाल मैं भी आप से पूछ रहा हूं विमल भाई! अगली किस्त कब? और इधर आपने अपना ख़ज़ाना शेयर करने में कृपणता क्यों दिखानी शुरू कर दी है?

'जुलूस' तो हम ने भी खेला था कभी!

आपकी स्मृतियों के बहाने बहुत सारा नया जानने को मिला. सुन्दर आलेख!

अनिल रघुराज said...

बादल दा के साथ रंगमंच की एक नई दुनिया से साक्षात्कार किया हम लोगों ने। वाकई नुककड़ से उठकर हम अगर मंच पर पहुंचे तो उसके पीछे एकमात्र प्रेरणा बादल सरकार थे। और, बादल सरकार से परिचय अनिल भौमिक की आजमगढ़ की संस्था समानांतर के जरिए हुआ जिसमें माध्यम विमल आप ही बने थे। इसके लिए शुक्रिया। और बादल दा को जन्मदिन की असंख्य शुभकामनाएं।

Harshad Jangla said...

Nice info.
Thanx.

-Harshad Jangla
Atlanta, USA

Dr. Chandra Kumar Jain said...

बहुत अच्छी जानकारी
आपका आभार
===================
डा.चन्द्रकुमार जैन

आयोजक said...

priy vimal bhai,
Khoob man se yaad kiya hai aapne Badal da ko. Is beech Ashok Bhowmick ne bhi ek bahut sundar interview cum memoir Badal Sarkar par likha hai. Indore se nikalane wali patrika Samapvartan mein chapa hai. Sambhavtaya June ke Ank mein.
Shukriya.
Sanjay Joshi

संदीप said...

विमल जी,
बादल सरकार जी से जुड़ी यादों को साझा करने के लिए शुक्रिया, उम्‍मीद है आप इस तरह का लेखन जारी रखेंगे, इससे हम जैसे युवा साथियों को भी बहुत से पुरानी बाते, किस्‍से, अच्‍छे-बुरे सब जानने को मिलेंगे...

आनंद said...

कमाल है! उनका नाटक एवम् इंद्रजीत पढ़ते हुए लगा कि कैसे यह मेरे मन की बात जानता है? इस नाटक का नशा बहुत दिनों (सालों) तक छाया रहा।
- आनंद

maithily said...

हम प्रतीक्षा रत हैं

vimal verma said...

आप सभी का बहुत बहुत शुक्रिया....बादल दा के बहाने ही सही कुछ सम्वाद बन पाया .... सभी का आग्रह है की बादलदा के बहाने इसकी अगली कड़ी में कुछ लिखूं ..और साथी मैथिली जी ने दो बार टिप्पणी करके अपने आग्रह को दोहराया है पुरानी स्मृतियों में कुछ रंगमंच से सम्बंधित बातें हैं मैं कोशिश ज़रूर करूंगा......

sanjay patel said...

विमल भाई;
ख़ूब याद किया बादल दा को आपने.
अस्सी के दशक की ही बात है.
पिताजी इप्टा से जुड़े रहे हैं.
जब मैं १८-१९ का होने आया तो एक दिन कहने लगे तुम थोड़े शाय रहते हो..थियेटर करो...सारी झिझकें काफ़ूर हो जाएंगी.मैने कहा देखता हूँ.हफ़्ते भर बाद पूछा क्या देखा .मैने कहा अभी तो कुछ नहीं.बोले चलो.उस ज़माने में पिता से पूछने की हिम्मत नहीं होती थी कहाँ.प्रो.सतीश मेहता के घर आ गए. पिताजी बोले मेहता साहब संजय को नाटक में डालना है..सम्हालिये इसे.और बस शुरू हो गया नाटक विमल भाई.मिछिल बादल सरकार का. जुलूस नाम की ये प्रस्तुति एक नुक्कड़ नाटक था.और प्रो.मेहता ने इसे बाक़यदा बग़ीचों,बैंक के अहातों और मेन बाज़ार में मंचित किया. मैने मुन्ना को रोल किया था.सुशील जौहरी बूढ़े के क़िरदार में थे और स्व.महेश तिवारी गुरू का रोल करते थे. जुलूस में इम्प्रोवाइज़ेशन की बहुत संभावना थी और मेहता साब ने किया भी. लाजवाब प्रोडक्शन बना था. बाद में मुन्ना का रोल पृथ्वी सांखला करने लगे जो बाद में मुंबई चले गए.

आपने बादल सरकार को याद कर मेरे युवा मन को झकझोर दिया. संयोग देखिये बादल दा के एक और मशहूर नाटक एक था राजा में पिताजी ने काम किया. निर्देशक थे स्व. दीनानाथ.

क्या क्या याद दिला दिया दादा आपने.यादों के बादल घुमड़ आए हैं आज.

अजित वडनेरकर said...

विमल भाई, शुक्रिया इन विरल अनुभवों को हमसे बांटने के लिए। बादल सरकार का नाम हमने भी उसी उम्र में सुना था जिसकी चर्चा संजय पटेल कर रहे हैं। जुलूस, पगला घोड़ा वगैरह वगैरह जैसे कई नाटक खरीद कर पढ़े थे। आज भी मेरे संग्रह में हैं। नवभारत टाईम्स के कार्यकाल में 1985 से 90 के बीच जयपुर में थियेटर की दुनिया से खूब साबका रहा। आज के अनूप सोनी तब शर्मीले छोकरे हुआ करते थे और खूब मेहनत करते थे। तमाम नामी कलाकारों के बीच उन दिनों उठ-बैठ हुई थी।
आपकी इस पोस्ट को विलंब से पढ़ा मगर इसने यादों के झुरमुट में जाने का जो मौका दिया उसके लिए तहेदिल से शुक्रिया।
संस्मरण अच्छे लिखते हैं आप और इसका ख़जा़ना भी है आपके पास। बकलमखुद में मैं सब इसे परख भी चुके हैं....
जारी रहें..

Vibha Rani said...

इस लेख की सबसे बडी उपलब्धि: सबसे पहले तो आप मिले, फिर आपके बहाने बादल दा और उनके बहाने संजय पटेल. थिएटर की ताकत अभी भी लोग नहीं समजहेत या समझ बूझ कर अंजान बने हुए हैं.

साज़रंग,झाबुआ said...

आपका ये लेख जानकारी वर्धक है...मैं खुद रंगमंच का एक छोटा सा कलाकार हूँ...बादल सरकार जी की रंगयात्रा को इतने वजनदार शब्दों में बताने के लिए बहुत -बहुत शुक्रिया...