Friday, October 9, 2009

दिल्ली में दीखता है जंगल का ही नज़ारा


चुनाव का मौसम आ गया पूरे देश में  विधान सभा के चुनाव हो रहे है हैं,हर जगह नेताओं की मुस्कुराती तस्वीर के होर्डिंग, भाषण , रैली का दौर बस कुछ दिन, जनता से जुड़ाव, और फिर चुनाव के बाद शान्ति,नेताओं के वादे इरादे सब उनके पास , अभी गठरी पर एक इस रचना को देखकर एक बहुत पुरानी रचना की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही है....मुझे उम्मीद है मेरे सुहाने दिनों के मित्र अगर इसे पढेंगे तो इस अधूरी रचना को पूरा भी कर सकेंगे:






रहने को घर नहीं है, हिन्दोस्तां हमारा

दिल्ली में दीखता है जंगल का ही नज़ारा



लक-दक पहन उजाले बगुले खड़े हुए हैं

तप से हुए हैं पैदा, तब से बड़े हुए हैं

ना जाल है न बंसी फिर भी विकट मछेरे

अंजान हैं मछलियाँ निकली अभी सवेरे

उनको न भंवर कोई न उनका है किनारा

दिल्ली में दीखता है जंगल का ही नज़ारा



अब इसके आगे की पंक्तियाँ याद नहीं ...........अगर आप इसे पूरा कर सकें तो मेहरबानी,और ये भी याद नहीं कि ये रचना किसकी है बस मौके पर याद आ गई तो चेप रहा

5 comments:

GATHAREE said...

हम तो कहेंगे की-नक्कालों से सावधान

Harkirat Haqeer said...

लक-दक पहन उजाले बगुले खड़े हुए हैं

तप से हुए हैं पैदा, तब से बड़े हुए हैं

ना जाल है न बंसी फिर भी विकट मछेरे

अंजान हैं मछलियाँ निकली अभी सवेरे

बहोत बढिया व्यंग करते हैं आप .....!!

नक्काल कितना और क्या ले जायेगे.....आपके पास खजाना हैं उसके पास लुट का माल ....!!

मेरी भी एक बार चोरी हो चुकी है फिर भी लिखना जारी है ....!!

pankaj srivastava said...

विमल भाई, पूरा गीत यहां है...


दिल्ली में दीखता है जंगल का ही नजारा

रहने को घर नहीं है, हिंदोस्तां हमारा


गुणगान हो रहा है, मालाएं पड़ रही हैं
हर शाख उल्लुओं की शक्लें उभर रही हैं
कुछ रीछ नाचते हैं, कुछ स्यार गा रहे हैं
जो जी हुजूर कुत्ते थे, दुम हिला रहे हैं।

हर खेत सांड़ चरते बैलों को नहीं चारा
रहने को घर नहीं है----


हर लोमड़ी यहां पर अंगूर खा रही है
खा पाए जो न उसको खट्टा बता रही है
अपराध तेंदुओं का खरगोश डर रहे हैं
भेड़ों की भेड़िए ही रखवाली कर रहे हैं

पिंजड़ों में सारिकाएं गिद्दों का चमन सार
रहने को घर नहीं है...

हर लॉन लाबियों में गदहे टहल रहे हैं
बिल्ली की हर अदा पर चूहे उछल रहे हैं
सांपों की बांबियों में चूहों के मामले हैं
मानेंगे न्याय करके बंदर बड़े भले हैं

हैं मगरमच्छ जब तक, क्या नदियों की धारा

रहने को घर नहीं----


सिर पर सुबह उठाए मुर्गे दिखा रहे हैं
सूरज का फर्ज क्या है, उसको बता रहे हैं
चिड़ियों के घोसलों में कौओं का संगठन है
पेड़ों को टांग उल्टा, चमगादड़ें मगन हैं

कितने ही घोसलों का बचपन है बेसहारा
रहने को घर---


लकदक पहन उजाले बगुले खड़े हुए हैं
तप से हुए हैं पैदा तप से बड़े हुए हैं
न जाल है न बंसी, फिर भी विकट मछेरे
अनजान हैं मछलियां, निकलीं बड़ी सवेरे

उनको न भंवर कोई, उनका नहीं किनारा
रहने को घर नहीं है----

ये गीत रामकुमार कृषक या कमल किशोर श्रमिक का है..तड़प उठी है तो इसका पता भी लगा लेंगे। शुक्रिया उन दिनों की याद दिलाने के लिए...हाथ में ढफली लिए मगन मन 'दस्ता'...

काजल कुमार Kajal Kumar said...

दिल्ली जंगल ही है

anju said...

vimal ji...
ye pankiaan padh kar laga mano... bade sheher ke chote zazbaaton se ghayal mannn ko choti choti khushion ka stroat mil gaya ho..shaanti hai yaahan...sukoon hai iss blog mein... lagta hai...apne ghar mein hi hain :-)