भारतीय कार्यक्रम आते ही हम रेडियो बन्द कर दिया करते थे,अक्सर किसी ऑर्केस्ट्रा कार्यक्रम में ऐसे संगीत के बारे में मिमिक्री आर्टिस्ट मिमिक्री करते हुए मज़ाक में यही कहता कि ऐसा गाने के लिये जाड़े की सुबह लोटे -लोटे पानी से नहाने पर जो मुंह से ध्वनि निकलती है वही असली शास्त्रीय संगीत है, बचपन से बहुत से शास्त्रीय संगीत से जुड़े संगीतकारों के नाम सुनते थे उन्हीं में एक बड़े फ़नकार का नाम सुना नाम था बड़े गुलाम अली ख़ान आज उन्हीं से मुत्तालिक़ एक वीडियो यू-ट्यूब पर मिला तो उसे आप भी देखें और धन्य हों। ये
वीडियो करीब १५ मिनट का है |
न शास्त्रीय टप्पा.. न बेमतलब का गोल-गप्पा.. थोड़ी सामाजिक बयार.. थोड़ी संगीत की बहार.. आईये दोस्तो, है रंगमंच तैयार..
Tuesday, April 20, 2010
Sunday, April 11, 2010
कवि नीरज जी की आवाज़ में... " कारवां गुज़र गया ग़ुबार देखते रहे "

आज एक बहुत ही पुराना कोई गाना सुन रहा था वो गीत १९५० के आसपास का लिखा हुआ था ..जब भी इतने पुराने गानों कों सुनता हूँ तो बरबस मन ही मन सोचता हूँ की बताओ इसे किसी शायर ने या कवि ने लिखा होगा, इस रचना को लिखने में मालूम नहीं कितना समय लिया होगा पर आज पचास साल बाद भी उतना ही ताज़ा कैसे बना हुआ है? पता नहीं पर आखिर कौन सी बात है की उन गानों कों कालजयी बनाती है ?ऐसे ही एक गीत हम बहुत सुना करते थे बचपन में, वैसे तो बहुत से गीत हैं जिन्हें आज भी सुनकर मुंह से वाह तो निकल ही जाता है पर उनकी चर्चा बाद में की जाएगी अभी तो जिस मौलिक रचना को आप सुनने जा रहे हैं उसके बारे में कुछ यादे है जो आपके साथ बांटन चाहता हूं..... " कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे" रेडियो पर हमने इस गाने कों बहुत सुना है और इसी गाने के चलते हम इस फिल्म कों देखने सिनेमा हॉल तक गये थे, फ़िल्म थी "नयी उमर की नयी फ़सल" और उस गाने को गाया था मो: रफ़ी साहब ने ....ये गाना ही कुछ ऐसा था कि सुनकर पूरे शरीर मे एक अजीब सी प्रतिक्रिया होती थी .....और हम मुग्ध होकर बड़ी तल्लीनता से इसे सुनते थे और एक अरसे बाद आज भी वो गीत सुनने को मिले तो यही कहुंगा कि ऐसे गानो का आकर्षण अभी तक बना हुआ है ...।.
आज नीरज जी कि आवाज़ में इस मौलिक रचना को आप सुने .....नीरज जी का अपना अंदाज़ है पढने का,जो मुझे बहुत भाता है तो सुने और तो आनन्दित हों । वैसे बहुत दिनों बाद आपसे रूबरू होने का मौका मिला है पर मेरी यही कोशिश रहेगी कि आपसे अपने अनुभव बांटता रहूं।नीरज जी की ये आवाज़ बरास्ता मेरे अनुज गुड्डा के सौजन्य से ।
स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!
नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क़ बन गए,
छंद हो दफ़न गए,
साथ के सभी दिऐ धुआँ-धुआँ पहन गये,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना मचल उठा
इस तरफ जमीन और आसमां उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गयी कली-कली कि घुट गयी गली-गली,
और हम लुटे-लुटे,
वक्त से पिटे-पिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!
माँग भर चली कि एक, जब नई-नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरण-चरण,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी ज़हर भरी,
ग़ाज एक वह गिरी,
पुंछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी,
और हम अजान से,
दूर के मकान से,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
Monday, March 1, 2010
जब फागुन रंग झमकते हों
photo by vimal
पहली बार होली के रंग से दूर हूँ , पर होली में सबके साथ बैठ कर कुछ नया सुनाने और गुनने का आनंद ही कुछ ही है ,अब जब होली आती है तो हम अपने अतीत में खो जाते हैं .....उसी में डूबते उतराते हैं, आज भी कुछ मन उसी तरह का हुआ जा रहा है , इसी मौके पर छाया गांगुली की आवाज़ में इस गीत को सुने और आनन्द लें |
पहली बार होली के रंग से दूर हूँ , पर होली में सबके साथ बैठ कर कुछ नया सुनाने और गुनने का आनंद ही कुछ ही है ,अब जब होली आती है तो हम अपने अतीत में खो जाते हैं .....उसी में डूबते उतराते हैं, आज भी कुछ मन उसी तरह का हुआ जा रहा है , इसी मौके पर छाया गांगुली की आवाज़ में इस गीत को सुने और आनन्द लें |
Tuesday, December 29, 2009
डा: कुमार विश्वास की एक रचना, कवि सम्मलेन को याद करते हुए......
क्या कवि सम्मेलनों का दौर ख़त्म होता जा रहा है, एक समय था जब छोटे छोटे शहरों में कवि सम्मेलनों और मुशायरों की वजह से शहर में चहल पहल खूब हुआ करता था, वाह वाह और मुक़र्रर का शोर आज भी कानों में ज्यों का त्यों अपनी जगह बनाए हुए है...... पर आज उस समा को हम सिर्फ महसूस ही कर सकते हैं |
लगभग दसियों साल से सब कुछ समाप्त होता दिखाई दे रहा है तो आज उन्हीं पुराने दिनों कों याद करते हुए कवि डा: कुमार विश्वास जी की रचना उन्हीं की आवाज़ में सुनिए और आनंद लीजिये, इस रचना को मित्र ज्योतिन ने उपलब्ध कराया है उनका शुक्रिया और भी इस तरह की रचनाएँ अगर मुझे मिलती है तो ठुमरी के माध्यम से आप तक ज़रूर पहुंचाया जाएगा इसकी गारंटी मैं लेता हूँ ...........नए साल में फिर कुछ इसी तरह मुलाक़ात होगी |
समीर भाई आप सुन नहीं पा रहे इसलिये नीचे वाले प्लेयर पर चटका लगा कर अब सुन सकते हैं ....वैसे मैं ऊपर वाले प्लेयर को सुन पा रहा हूँ....
लगभग दसियों साल से सब कुछ समाप्त होता दिखाई दे रहा है तो आज उन्हीं पुराने दिनों कों याद करते हुए कवि डा: कुमार विश्वास जी की रचना उन्हीं की आवाज़ में सुनिए और आनंद लीजिये, इस रचना को मित्र ज्योतिन ने उपलब्ध कराया है उनका शुक्रिया और भी इस तरह की रचनाएँ अगर मुझे मिलती है तो ठुमरी के माध्यम से आप तक ज़रूर पहुंचाया जाएगा इसकी गारंटी मैं लेता हूँ ...........नए साल में फिर कुछ इसी तरह मुलाक़ात होगी |
समीर भाई आप सुन नहीं पा रहे इसलिये नीचे वाले प्लेयर पर चटका लगा कर अब सुन सकते हैं ....वैसे मैं ऊपर वाले प्लेयर को सुन पा रहा हूँ....
Saturday, November 14, 2009
नन्हें मुन्हें बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है ?
कल तक जिन गीतों को मेरे पिता गुनगुनाते थे उनके बाद उन गीतों को हमने भी गाया गुनगुनाया .... अब हमारे बाद आने वाली पीढ़ी भी उन्हें गुनगुना और गा रही है,जब भी इन गीतों को पहले पहल गाया या सुना गया होगा सोचिये कैसा लगा होगा...आज गीत वही है समय और समाज बदल गया है,और गीतों के अर्थ भी बदल गये हैं,हम बाल दिवस मनाते हैं.... सरकार डाक टिकट छापती है....कुछ समारोह हो जाते है आज के दिन, पर बच्चों का बचपन और उनकी हंसी थोड़ी जुदा होती जा रही है..बच्चा का समय से पहले बडा़ होते जाना ...बच्चों के भारी बस्ते अभी भी भारी है....बच्चों की एक बड़ी आबादी आज भी होटलों,स्टेशनों,अनाथालयों और सड़को पर ठोकरें खाती फिर रही है..क्या उन्हें पता है हमारे यहां बच्चों से सम्बन्धित योजनाएं सिर्फ़ कागज़ पर ही बन कर रह जाती है.....खैर लिखने को तो बहुत कुछ है पर इन सदाबहार गीतों को सुनिये और सोचिये हम कैसे हो गये हैं.....नन्हें मुन्हें बच्चों की मुट्ठी में आज सचमुच क्या है....... .सब सपना हो गया है..क्या?
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Wednesday, October 28, 2009
हम नामवर न हुए तो का ! हमको ना बुलाओगे ?
बड़ी भिन्नाट हो रही है, बड़े समय बाद अपने बिलागवतन में लोग इलाहाबाद के मीट का चूरमा बना रहे हैं , अफ़सोस त ई है कि हमहुं को वहां ना बुलाके इसके संयोजक लोगो ने बहुतै गलत काम किया और उस पर ये कि नामवर लोग वहां इकट्ठा थे उनमें एक ठो नामवर पर इतना समय और ऊर्जा खर्च कर रहे हैं कि सब मनई का पढ़ पढ़ के ऐसा लग रहा है कि हम संगम नहा लिये, ई सबको नहीं बुझाता है कि नामवर के बहाने लोग अपना अपना तीर छोड़ रहे है, क्या ब्लॉगजगत में सबको बुलाना सम्भव है..कुछ तो लोग छूट जाते तो इस तरह की बहस तो कुछ भी कर लो, उठनी ही थी...जो उठ रही है और आगे भी उठेगी इसे कोई रोक सकता है?
जिस बात की चर्चा सुरेश चिपलुनकर बाबू ने छेड़ी थी उ मुद्दा रह गया पीछे अरे वही वामपंथ और हिन्दूपंथ और मुद्दा बन गया नामवर, अरे कोई बताएगा कि कि हिन्दू हितों पर लिखने वाले लोगों को क्यौं नहीं बुलाया गया? ई सब छोड़िये अब यही बता दीजिये हमको उस सम्मेलन में क्यौं नहीं बुलाया गया कोई मेरे बारे मे बोलेगा?
नामवर जी ने अगर कभी कचरा कह भी दिया तो कोई ये भी बताए कि क्या ब्लॉग में सब सुगन्धित साहित्य ही रचा जा रहा है कौन तय करेगा कि सुगन्धित क्या है? और कचरा क्या है? और जो व्यक्ति एक दिन कचरा कहता है और वही आदमी कचरे के शीर्ष में आसन करना चाहता है तो इसमें बुराई क्या है?
चिट्ठा शब्द के बारे में अगर नामवर बोल दें कि यह शब्द हमारा दिया है तो उनके कहने से क्या उनका हो जाएगा? और अगर अपने किताब में इसका श्रेय ले लें तो क्या उनको कोई रोक पायेगा?
अरे सब चिट्ठाकार इलाहाबाद में भेंट मुलाकात किये एक दूसरे को आमने सामने ज़िन्दा देखा ये क्या कम है, और जब ब्लॉगवतन के लोग एक जगह इकट्ठा हो जाँय तो क्या बात होती है क्या ये भी किसी को बताना पड़ेगा?
जिस बात की चर्चा सुरेश चिपलुनकर बाबू ने छेड़ी थी उ मुद्दा रह गया पीछे अरे वही वामपंथ और हिन्दूपंथ और मुद्दा बन गया नामवर, अरे कोई बताएगा कि कि हिन्दू हितों पर लिखने वाले लोगों को क्यौं नहीं बुलाया गया? ई सब छोड़िये अब यही बता दीजिये हमको उस सम्मेलन में क्यौं नहीं बुलाया गया कोई मेरे बारे मे बोलेगा?
नामवर जी ने अगर कभी कचरा कह भी दिया तो कोई ये भी बताए कि क्या ब्लॉग में सब सुगन्धित साहित्य ही रचा जा रहा है कौन तय करेगा कि सुगन्धित क्या है? और कचरा क्या है? और जो व्यक्ति एक दिन कचरा कहता है और वही आदमी कचरे के शीर्ष में आसन करना चाहता है तो इसमें बुराई क्या है?
चिट्ठा शब्द के बारे में अगर नामवर बोल दें कि यह शब्द हमारा दिया है तो उनके कहने से क्या उनका हो जाएगा? और अगर अपने किताब में इसका श्रेय ले लें तो क्या उनको कोई रोक पायेगा?
अरे सब चिट्ठाकार इलाहाबाद में भेंट मुलाकात किये एक दूसरे को आमने सामने ज़िन्दा देखा ये क्या कम है, और जब ब्लॉगवतन के लोग एक जगह इकट्ठा हो जाँय तो क्या बात होती है क्या ये भी किसी को बताना पड़ेगा?
Sunday, October 18, 2009
किरण आहलुवालिया की आवाज़ में कुछ ग़ज़लें
कुछ ही दिन हुए कि एक पुराने गीत को याद करते हुए एक पोस्ट ठुमरी पर चढ़ाई थी, रचना अधूरी थी तो अपने मित्र पंकज ने पूरी रचना मेरे पास भेजी मैने उसे हूबहू चढ़ा दी ये सोचते हुए कि कम से कम वो रचना अंतर्जाल पर तो हमेशा रहेगी ही, खैर कुछ टिप्पणिया भी आईं उनमें से एक टिप्पणी मानसी की भी थी "ये पोस्ट तो अच्छी है पर ये क्या हो रहा है ठुमरी में? हम क्वालिटी गीत संगीत की आशा ले कर आये थे" तब मुझे वाकई लगा कि मानसी ग़लत तो कह नहीं रहीं पर क्या करें इधर कुछ नया भी सुनने को मिला नहीं और मेरी कोशिश भी यही रहती है कि वही रचना ठुमरी पर चढ़ाई जाय जिसे लोगों ने कम सुना हो और कम से कम वो रचना स्तरीय तो हो ही, तो उसी कड़ी में आज किरण आहलूवालिया की आवाज़ में कुछ रचनाएं आपके लिये लेकर आया हूँ, किरण आहलूवालिया के बारे में सिर्फ़ इतना कि आवाज़ और लय तो खूब है उनके पास पर उनके शब्द अगर कहा जाय तो मोती जैसे नहीं हैं, या कहा जाय बहुत साफ़ शब्द कानों को सुनाई नहीं देते, फिर भी किरण को सुनना सुखद है तो आप भी सुनें....
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आज की पीढ़ी के अभिनेताओं को हिन्दी बारहखड़ी को समझना और याद रखना बहुत जरुरी है.|
पिछले दिनों नई उम्र के बच्चों के साथ Ambrosia theatre group की ऐक्टिंग की पाठशाला में ये समझ में आया कि आज की पीढ़ी के साथ भाषाई तौर प...
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अभी जुमा जुमा कुछ ही दिन हुए हैं, आई आई टी के एक कमरे में हमारी मुलाकात हुई थी, मैं बात कर रहा हूं,उस यादगार शाम की जब थॊड़े से चिट्ठाकारों ...
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क्या कवि सम्मेलनों का दौर ख़त्म होता जा रहा है, एक समय था जब छोटे छोटे शहरों में कवि सम्मेलनों और मुशायरों की वजह से शहर में चहल पहल खूब हु...

