Saturday, July 21, 2007

चैन से सो रहा था मैं...

बड़ी अजीब बात है, अब मैं क्या बताऊं... पर बात सिर्फ़ इतनी सी भी नहीं है कि मै बार-बार क्या कहूं- क्या कहूं करता रहूं और अपनी बात भी पूरी तरह से न रख पाऊं... वैसे ये ज़रूर बता दूं कि मै एक लापरवाह और साथ- साथ आरामपसन्द व्यक्ति हूं! अब आप ना माने तो मै क्या कर सकता हूं? हां, तो बात ये है कि पहले बाबा आदम के ज़माने का एक शेर सुनिये, फिर कुछ कहने की कोशिश करता हूं, तो शेर अर्ज़ है -


चैन से सो रहा था मै ओढे कफ़न मज़ार में !
यहां भी सताने आ गए किसने पता बता दिया !!


अब देखिये इस शेर को कालेज के ज़माने में, ऐसे टुच्चे जो हमारे अच्छे- खासे खेल को बिगाड़ने चला आता था उसके लिये हम ये शेर इस्तेमाल करके ठठा - ठठा के हंसा करते थे और जिसको हम सुनाया करते थे वो भी हममे शामिल हो जाता था और हम मिल्ली- उल्ली करके अपने-अपने रस्ते हो लिया करते... कुछ वही नज़ारा देख रहे हैं ब्‍लॉग की दुनिया में भी फैला हुआ है... कुछ बेचारे हैं वो एक दम जैसे वायरस की तरह कभी तो अच्छी बातें करके आपको लुभाने की कोशिश करेंगे और कभी तो उल्टी गंगा ही बहाने लग जायेंगे! तो आइए, ऐसे ही लोगों पर एक कथा कहने की कोशिश कर रहा हूं... ये उन पर है जो छद्म नाम से इधर-उधर हुडदंग मचाते... जिन्‍हें हर कहीं किसी के भी ब्लाग पर शरारत करते देखा जा सकता है और किसी ने जवाब में कुछ कह दिया तो समझिये उसका तो ये टिल्‍ली-बिल्‍ली कर-करके लिखना हराम कर दें, क्‍योंकि टिल्‍ली-बिल्‍ली करने के सिवा इनके पास कहने को कोई बात तो है नहीं... न करने को काम...

चिरकुट करे न चाकरी न टिल्‍ली लगाए दुकान!
दिन भर बोले बिल्‍ल-बिल्‍ल, हगना इसका मुकाम!


तो लीजिए ऐसे छद्म नामधारी पर एक कहानी पेश है... कथा किसी एक गांव की है.. भोर का समय था एक आदमीय या चलिये उसका एक नाम रख देते है- बेनाम- तो बेनाम महोदय हाथ में लोटा लिये खेतों- खलिहानों की तरफ चले जा रहा थे... सही जगह चुनकर किसी पेड़ के नीचे लोटा लेकर बैठ गये, अभी कुछ ही समय हुआ था कि अचानक या यूं कह लें पलक झपकते एक सांप उसके पीछे के रास्ते देह में के पेट के अन्दर घुस गया! और पेट के अन्दर घुस कर बाबू बेनाम को लगा करने परेशान... कभी पेट में इधर हो तो कभी उधर... बेनाम महोदय पसीने- पसीने... एक वैद्य के पास गये और कहानी बताई कि कैसे पलक झपकते सांप उनके अन्दर घुस गया और इस सांप की वजह से उनको बडी बेचैनी हो रही है जल्दी से निकालिये नहीं तो कहीं इसका ज़हर शरीर में फैल गया तो बडा अनर्थ हो जाएगा... खैर, वैद्यजी ने बेनाम महोदय को एक उपचार बताया कि अब जब भी दिशा मैदान जाओ तो अपने साथ एक दूध की कटोरी रखना और आप जानते ही हैं सांप को दूध पीना पसन्द है.. तो समझ लो जैसे ही सांप दूध पीने के लिये शरीर से बाहर निकले तो दबोच लीजियेगा जाइये इससे बढिया इलाज़ मेरे पास नही है!...

बहुत दिन गुज़र गये जब बेनाम महोदय के बारे में वैद्य जी को कुछ पता नही चला तो एक दिन वैद्य जी ने सोचा कि चलो हम खुद ही पता कर लें कि बेनाम महोदय का क्या हाल-चाल है. आखिर मैने जो उपचार बताया था उसने काम किया कि नहीं.. तो वैद्य जी चल दिये बेनाम महोदय के घर और जब वैद्यजी बेनाम महोदय के घर पहुंचे तो देखते क्या हैं कि बेनाम भाई बडे आराम से कमप्यूटर पर बैठे है और उनके सामने किसी का ब्लाग खुला है और कुछ किसी के ब्लाग पर टिप्पणी कर रहे थे और वैद्य जी को देख कर अचकचा गये... वैद्य जी ने अपने आने का कारण बताया और पूछा कि सांप का जो उपाय हमने आपको बताया था उससे सांप बाहर निकला कि नहीं? तो बेनाम भाई ने अज़ीब- सा चेहरा बना कर मुस्कुराते हुए बताया कि क्या बताएं वैद्य जी, आपने जो उपाय बताया था उसे मैने कई बार किया... पर होता ये कि सांप बड़ा हरामी साबित हुआ! कितनी बार तो दूध की कटोरी लेकर बैठा... हरामी तड़ देना दूध पी लेता, और इसके पहले कि उसे दबोचूं, पड़ देना पीछे के रास्‍ते फिर देह में वापस! बीसियों दफे कोशिश की और बीसियों ही बार फेल हुआ... तब? बैद्य जी पूछे, तो छोड़ दिये हो सांप को?... इस पर बेनाम बाबू सिर झुका लिए और लजाये-से बोले- क्‍या करें, सर... अब ऐसा है कि इस क्रिया को रोज़-रोज़ करके अब मज़ा आने लगा है... अब तो मै रोज़ सांप को इसीलिए दूध पिलाता हूं कि वह अंदर-बाहर हो-होके हमको मज़ा देता रहे!..

तो कुछ वही सांप वाली कहानी यहां भी घट रही है... देख रहा हूं वही बेनाम जब तक लोगॊ को कुछ बुरा भला न कह दे तो कूद फांद मचाये रहता है और कभी इस ब्लाग पर कभी उस ब्लाग को टारगेट किये रहता है तो जब तक इसके अंदर का सांप बाहर नहीं निकलेगा तब तक इसकी शरारत यहां-वहां फुदक-फुदक के चलती ही रहेगी!... तो भाई, कोई है जॊ इनके अन्दर के सांप को बाहर निकाल सके कि ये बाबू चैन से रहें... और बाकी सबकॊ भी चैन से रहने दे?...

8 comments:

अनिल रघुराज said...

विमल बाबू, क्या श्टाइल है क्या मुद्दा है!! चिरकुट पुराण में असीम संभावनाएं हैं। इस बीच बेनाम जी को बोलें कि वो टीवी पर नाग-नागिन के प्यार का समाचार जब भी चलें, जरूर नियम से देखें। हो सकता है सांप प्रेरित होकर किसी और मंशा से बाहर निकल आए। और बेनाम जी को बड़ी सत्यानाशी आदत पड़ गई है। जैसे-जैसे बुढाएंगे, ये आदत प्रबल होती जाएगी। उसका क्या करेंगे?

अभय तिवारी said...

कैसी अनोखी कथा!! जवाब नहीं आप का..

mayank said...

रहने दिजीए बाबु सांप को अपने जगह पर हीं रहने
दिजीए काहे को द्वध पिला रहे हॆं देखने में मजा आता हॆ क्या विमल बाबू ज्यादा बीन मत बजाईए
वॆद्य जी ने रास्ता सही बताया हॆ आप के करने से हालत बिगड सकती हॆ एहतियात बरते.

Jan Sevak said...

अरे बाप रे !! पहले शक्ति कपूर कहा फिर **** कहा और अब आगे न जाने किन किन विशेषणों से नवाजा जाऊँगा मैं.

आप मेरे लिखे की आत्मा नहीं पकड़ पाए बंधु. मेरा उद्देश्य यहाँ वहाँ कूद फाँद करना कतई नहीं है. क्या मेरी प्रतिक्रियाओं की ध्वनि सुनकर आपको लगता है कि कोई बहुत छिछला और अगंभीर काम मैं कर रहा हूँ. अगर ऐसा है तो मैं क्षमा माँगता हूँ क्योंकि उद्देश्य ये है ही नहीं. मैंने आलोचना के विषय में अपनी टिप्पणी में इसे स्पष्ट करने की कोशिश की भी थी लेकिन लगता है कि उसका उलटा ही असर हुआ. उसे एक सार्थक बहस की तरह लेने की बजाए आपने सोचा कि मैं खेल बिगाड़ने के लिए यहाँ आया हूँ.

ये स्पष्टीकरण मैं आपको ही नहीं उन सभी मित्रों को देना चाहता हूँ जो किसी कारण मेरी प्रतिक्रिया (प्रतिक्रियाओं नहीं क्योंकि एक ही प्रतिक्रिया आपके क्रोध का कारण बनी) से आहत हैं.

बजार वाला said...

अपने कालेज मे ये कहानी एक बार मैंने अजित सिंह को सुना दी थी। हाँ , उसमे बेनाम के नाम की जगह उसी का नाम रख दिया था। बाद मे वो काफी लड़को को बुला कर लाया मारने के लिए तो उन्हें भी यही कहानी सुनाई । सब हंसने लगे। दरअसल अजित भी कुछ कुछ वैसा ही था जैसा चरित्र चित्रण आपने किया है। और देखिए ... कही से कुछ जलने की बू आ रही है...सूं सूं सूं ..... हाँ !!! सही मे आ रही है... हा हा हा

अनामदास said...

क्यों भाई, इतना चक्करदार तरीक़े से अनाम लोगो को गाली क्यों दे रहे हैं. किसी अनाम ने आपके ब्लॉग को उपजाऊ बनाने के लिए कम्पोस्ट तो नहीं डाल दिया. कहानी मज़ेदार है, पहले भी सुनी थी लेकिन आपका सुनाने का अंदाज़ अच्छा लगा.

vimal verma said...

भाई अनिलजी आपको इस श्टाइल समभावना नज़र आ रही है और अभयजी को अनोखी कथा लगी,और मयंकजी का कहना है सांप को अन्दर ही रहने दें नही तो वो बाहर निकल कर ख़तरनाक हो सकता है...जन सेवकजी को लग रहा है कि ये सारी कथा उन्ही पर आधारित है जन सेवक जी की बात गलत है जन सेवक जी मेरे प्रेरणा हैं और अगर वो ना उकसा रहे होते तो ये समझिये एक ब्लागर कुछ ही दिनों मे दम तोड़ देता वैसे भी मेरा लिखने से नाता भी ब्लाग से शूरु हुआ है... मै अन्य साथियो की तरह लिखाड़ भी नही हूं,और अपने ब्लाग जगत में नकारात्मक किस्म के कुछ बेनाम हैं उन ज़रुर लिखा है मैने पर जन सेवक पर कतई नहीं उनकी वजह से इस पोस्ट का मसाला मिला उनकॊ धन्यवाद,भईया अनामदासजी आप तो वाकई अनामदास का पोथा हैं आपको अब नाम की क्या ज़रुरत, बाज़ार वाला को भी धन्यवाद कि उन्होने सुनी हुई कथा फिर से सुनी, और अन्त में बही मैं नया मुल्ला हुं तो मुझे जमकर प्याज खाने दें किसी को प्याज की झांस लग भी रही हो तो माफ़ करेंगे!!!!

ajai said...

vimalji aise log saap ke niklne ke baad bhi nahi sudhrenge,ho sakta hai ye mahoday kisi khoonte per baith jaye aur kisi se apni taang khichwa kar chillaye sabka dhyan aakarsit karne ke liye.to inhe chillane dijiye aap to likhte rahiye.ye kya main bhi likhne laga?