Monday, October 1, 2007

कैसे समाज मे हम रह रहे हैं ?

आज शुरू करता हूँ, बशीर बद्र की कही बातो से, कोई हाथ भी ना मिलाएगा जो गले लगोगे तपाक से, ये नए मिजाज़ का शहर है, ज़रा फासले से मिला करो!! कैसा समाज हो गया है?पता नहीं क्यों, जब भी मैं कुछ मूड मे आता हूँ की ऐसा लिखूं, जिसमे मज़ा आए पर पता नही लिखते समय अन्दर की कड़वाहट सतह पर आ जाती है और पता नहीं क्या लिखने लगता हूं की मन दुखी हो जाता है....भाई हमेशा उस समय की सोचता हूँ जब नई -नई आजादी मिली थी, लोग आपस मे आजादी की खुशियों में सराबोर थे, और ऐसे समय में गुरुदत्त की इस "प्यासा" फ़िल्म में इस गीत को, क्या सोच कर रखा गया होगा ?



यही नहीं, साहिर या उनकी तरह कुछ और लोग जो विज़नरी थे, पहले ही आने वाले समाज की शक्ल देख लेते थे तभी तो इस तरह का गीत उन्होंने उसी समय रच दिया, जैसे मुक्तिबोध ने अंधेरे मे सब कुछ देख लिया था, जो आज हम भी अपनी नंगी आंखो से देख सकते हैं.

कहते हैं जीवन बहुत ख़ूबसूरत है, एक बार ही तो ये जीवन मिलता है, छक के जी लेने में जाता क्या है भला ?पर लोग कहाँ चुप रहने वाले.... कहने वाले मिल ही जाएंगे की ख़ूब पैसा हो, तो जीवन भी खूबसूरती से जीं सकते हैं, पर पैसे वालों का क्या हाल है, परिवार में एक डॉक्टर भी जुड़ जाता है.. कुता लेकर सुबह सुबह टहलते देखे जाते हैं तो क्या लगता है वे खुश है, कुता पाल रखा है सुबह सुबह कुत्ता टहला रहे है बताइये कितना सुखद है ये सब इनके लिए पर आप जानते नही की सुबह सुबह कुत्ते को नही कुता इन्हें टहला रहा होता है, की सुबह सुबह डॉक्टर ने टहलने के लिए कहा और ये भी कहा है नही टहलोगे तो जल्दी टपक जाओगे.. कितना टेंशन है(भाई कुत्ते का उदाहरण यूं ही दे दिया है)

लोग तो ये भी कहते हैं की पैसा रिश्ते की मिठास तय करता है ओफो, ये क्या भाई,मै अनाप शनाप लिखने लगा दार्शनिक बातें मुझपर जंचती नही है, लगता है मैं ज़मीन से ऊपर उठकर ऊंची ऊंची छोड़ रहा हूँ पर कहना ये चाहता हूँ की, इसी समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो आने वाले समय को पहले ही भांप लेते हैं,इस पर मै तो चकित रहे बिना रह नही पाता..

अब बताइये कब लिखा था बुल्ले शाह ने बेशक मन्दिर मस्जिद तोड़ो बुल्ले शा ये कहता, पर प्यार भरा दिल कभी तोड़ो, इस दिल मे दिलवर रहता... आज देखिये आज के दौर मे ये गाना कितना फिट बैठता है,और बहुत से गीत होंगे पर मुझे ये गीत आज के दौर मे बड़ा सटीक लगता है मुकेशजी का गाया ये गीत, लगता है जैसे अभी अभी लिखा गया है. साहिर ने लिखा था आसमां पे है खु़दा और ज़मी पे हम ......


फ़िल्म है "वो सुबह कभी तो आएगी"... गायक हैं मुकेश


शायद मैं अपनी बात ठीक से नही रखा पाया, क्योकि इसके लिए लम्बे पोस्ट की दरकार है, जो मेरे लिए नितांत मुश्किल है, पर इतना जरूर है, कि जिस समाज मे हम रह रहे हैं कुछ ऐसा हो, की हमे अपने समाज पर गर्व हो, और हम सर उठा कर कहे, ऐसे ख़ूबसूरत समाज से जुड़कर हम गौरवान्वित महसूस करे, जो वाकई दुरूह है.इस खूबसूरत गीत से, मै आज की पोस्ट समाप्त करना चाहता हूं ... इस गीत को सुनिये, मज़ा भी है, और दर्द भी, इस फ़िल्म का नाम है नई उमर की नई फसल फ़िल्म तो कूड़ा थी, पर करते क्या, गाने के चक्कर में पूरी फ़िल्म देखनी पड़ी ... अब सोचिये ना, गाने के चलते हमने वैसे बहुत सी फ़िल्में देखी है जो बाद में पता चला गाने पर ही पूरी फ़िल्म टिकी है. पर ये गीत जो आप सुनने जा रहे है. आज भी सुनता हूं तो सिहर उठ्ता है मन, तो देखिये वीडियो
नीरज जी का है ये गीत ... कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे गाया है रफ़ीसाहब ने, .. तो सुनिये, आज बस इतना ही .... !!!!!

8 comments:

Udan Tashtari said...

अरे कैसी बात कर रहे हैं? आप अपनी बात बिल्कुल उम्दा तरीके से रख पाये, जनाब! बहुत ही बढ़िया आलेख..अब रुपये पैसे का तो स्वभाव ही है-है तो परेशान, नहीं है तो परेशान...बस, परेशानियों के रंग अलग अलग होते हैं. आभार इस बेहतरीन पोस्ट के लिये.

बोधिसत्व said...

सर मुड़ियाके लते रहें। बहुत बढ़ियां जा रहे हैं आप।

अनिल रघुराज said...

विमल जी, दर्शन जीवन से ही निकलता है और आप जीवन जी रहे तो दर्शन की बात करेंगे ही। इसमें काहे की हिचक। अच्छी पेशकश। सभी यादगार गाने हैं। सुनवाने के लिए शुक्रिया।

yunus said...

विमल जी क्‍या हुआ सरकार । रविवारीय डिप्रेशन है या रविवारीय फिलॉसफी । जो भी है पर बहुत अच्‍छा है । मन की बात भी कही और गाने भी सुनवा दिये । किसी रेडियो स्‍टेशन में होना चाहिये था आपको ।

vimal verma said...

शुक्रिया कि आप सभी ने अच्छे मशविरे देकर मेरा उत्साह बढाया.. पर इतना ज़रूर है कि भाषण या उपदेश से बचना चाहता था.. पर ये ज़रूर है कि जो उछ भी अन्दर से निकल रहा है उसे निकाल रहा हूं.. अब क्या रूप निकलता है ये तो लिखने के बाद ही पता चलता है.. गाने तो मै इसलिये भी सुनाता हूं कि जो मै कहना चाहता हूं उसमें गीत की भी एक भूमिका तो होती ही है और साथ मनोरंजन भी होता चलताहै, क्यों यूनुसजी ठीक लग रहा है? समीर भाई, अनिल भाई,और बोधिजी आपने सराहा मुझे अच्छा लगा... धन्यवाद

महावीर said...

बहुत पसंद आई ये संगीतमयी अभिव्यक्ति।

रवीन्द्र प्रभात said...

अच्छी संगीतमयी अभिव्यक्ति है, क्रम बनाए रखें.

सम्पजन्य said...

Shandar Vichar ...!