
कुछ ऐसे लोग होते हैं, जो अपनी दिल की गहराइयों से अपनी प्रतिभा को निखारते हैं मेहनत करते हैं,पर कुछ समय बाद बाज़ार या समाज़ उन्हें सब कुछ होते हुए भी भुला देता है,उदाहरण दिया जाय तो समाज के अलग अलग तबकों से इसके हज़ारों उदाहरण ढूढे तो मिल जाएंगे, यहां मैं पुरकशिश आवाज़ की दुनिया की बात कर रहा हूं ऐसा ही एक नाम है ज़रीना बेगम की, अभी कुछ दिनो पहले ही फिर से सुनने का मौका मिला, आप भी सुनिये उनके गाने का अंदाज़,

आज मालूम नही ज़रीना बेगम हैं कहां? किसी ने बताया कि ज़रीना बेगम का सम्बन्ध लखनऊ से था, पर आज वो किस हाल में है मुझे पता नहीं,पर उनको सुनकर बेगम अख्तर की याद बरबस आ जाती है, आज आपके सामने ज़रीना बेगम की एक रचना पेश है, जनाब मुज़फ़्फ़र अली के अलबम हुस्ने-ए-जाना से है ,आप भी सुने.इस पुरकशिश आवाज़ को .....निहुरे निहुरे बुहारो ओ गोरिया...... .....और उनके बारे में और ज़्यादा जानने के लिये ज़रीना बेगम पर क्लिक करके जान सकते हैं.
4 comments:
wah..bahut khuub VIMAL ji...kaafi dino baad ye geet suna..bahut shukriya isey sunvaaney ka
विमल जी, क्या बात है !! किस सागर में गोता लगाया था मालिक ? बहुत मस्त कर दिया आप ने. और भी मोती लुटाएं इसी तरह ..... हम इंतज़ार में हैं !
बहुत अधिक नही सुना इन्हे पर आपने सुनवा दिया आज , शुक्रिया
वाकई आवाज़ में जादू है। सुनकर मन झुम उठा।
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