Thursday, June 12, 2008

ये टैंगरिन ठुमरी क्या है?

आज कल रीमिक्स का ज़माना है,किसी गाने की चर्चा हुई नहीं की बाज़ार में उसका रीमिक्स ज़रूर उतर आयेगा,पर ठुमरी का रीमिक्स ? अब भाई प्रयोग का तो कोई अन्त नहीं है,प्रयोग की कोई सीमा भी तो नहीं है,पर मैने भी जब ये रचना सुनी तो धुन तो अच्छी थी..पर कुछ अखर भी रहा था कुछ और नाम भी दिया जा सकता था खैर इस प्रयोग को अंजाम दिया प्रेम जोशुआ साहब के साथ साथ मनीश ने, जो फ़्यूज़न जैसा कुछ कुछ बजाते रहते हैं, इनकी रचना किशन - कन्हईया की भक्ति पर ही आधारित रहतीं हैं, जिसमें भारतीय और पश्चिमी वाद्ययंन्त्रों का इस्तेमाल रहता है,पर कोई ऐसी रचना जिससे आत्मविभोर हो जाँय, ऐसा इनसे तो सुना नहीं,पर यहाँ उनकी टेंगरीन ठुमरी नामक रचना खास आपके लिये लाया हूँ.... सुनिये और बताईये कि ये क्या है? इस रचना के बारे में जो अंग्रेज़ी में शीर्षक दिया गया है वो कुछ ऐसा है( Maneesh-de-moo- tangerine-thumri-orange-turban-remix).तो अब आपके सामने पेश है ऑरेन्ज -टर्बन रीमिक्स...........टैंगरिन ठुमरी अब आप इसे सुनिये और सुनकर बताइये कैसा लग रहा है, वैसे जहाँ तक मेरी राय है तो इस रचना को ठुमरी से जोड़ने की कोशिश करेंगे तो कन्फ़ूज़न होगा, तो इसे आप फ़्यूज़न मान कर सुने यही ठीक रहेगा....लोग कहते हैं संगीत में फ़्यूज़न के साथ कन्फ़्यूज़न का गहरा रिश्ता है.....



और नीचे के प्लेयर से दूसरा रीमिक्स भी आप सुनिये अभी कुछ समय पहले मैने कैरेबियन चटनी सुनाई थी...वो तो मूल थी,अब वहां पर भी चटनी का रीमिक्स बनता है ऐसे तो बहुत से रीमिक्स हैं, पर आज जो रीमिक्स आप सुनेंगे उसे गाया है चटनी गायक रिक्की जय ने.....त्रिनीदाद और आस पास के कैरेबियन संसार का पहचाना नाम है.तो सुनिये.....मोर तोर...मोर तोर....
boomp3.com
इस प्लेयर के साथ थॊड़ी समस्या है कई बार क्लिक करने पर बफ़र होने के बाद सुने तो बेहतर होगा

2 comments:

Udan Tashtari said...

आहाह!! आनन्द आ गया, बहुत आभार इस प्रस्तुति का.

Ashok Pande said...

विमल भाई, उम्दा पेशकश हमेशा की तरह. पता नहीं मुझसे कैसे रह गया इसे सुनना पहले. दूसरा वाला वाक़ई काम नहीं कर रहा है. संभव हो तो लाइफ़लॉगर पे चढ़ा दीजिये उसे भी.

आजकल आप की फ़्रीक्वेन्सी भी ज़रा कम कम चल रही है. मसरूफ़ होंगे शायद.

शुभ!

तुम बिल्कुल हम जैसे निकले - फ़हमिदा रियाज़

तुम बिल्कुल हम जैसे निकले अब तक कहां छुपे थे भाई? वह मूरखता, वह घामड़पन जिसमें हमने सदी गंवाई आखिर पहुंची द्वार तुम्हारे अरे बधाई, बहुत ब...