
गज़ल, कव्वाली,सूफ़ी रचनाएं सब बीते दिनों की बात हो गई हो जैसे,हम जैसे लोग आज भी गज़लों को सुनते हैं, गुनगुनाते हैं, मौका मिले तो गाते हैं,पर आज की पीढ़ी को तो ये सब स्लो स्लो सा लगता है,और हम हैं कि ग़ज़लों के मायने समझते हुए बड़े तल्लीन भाव से सुनते हैं,गज़ल गायकी के पंडित जगजीत सिंह, उस्ताद ग़ुलाम अली, गुरुवर मेहदी हसन,नुसरत साहब आदि आदि ने जो बीसियों साल पहले गाकर छोड़ दिया हमारी भी दुनियां उन्हीं के आस पास सिमट कर रह गई है,नये के नाम पर फ़्यूज़न ही है जिसे हम पूरी तरह स्वीकार भी नहीं कर पाये,प्रयोग तो होते रहेंगे और हम हमेशा की तरह कचरे से मोती तलाशते रहेंगे, आज कुछ यूं हुआ कि नय्यरा नूर को सुन रहा था," ऐ ज़ज़बाए दिल गर मैं चाहूँ,हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाय" इतनी सधी और मीठी आवाज़ को बार बार सुनने को जी करता है,तो सोचा कुछ और भी रचनाएं नय्यरा जी की तलाशते है और इकट्ठा अलग अलग रचनाओं का आनन्द लिया जाय, और क़ामयाबी मिल ही गई, नय्यरा नूर की भीनी- भीनी आवाज़ आप जब सुन रहे हों तो क्या मजाल कि बीच में छोड़ कर उठ जाँय,,एक अजीब सी खनक लिये नय्यरा नूर की आवाज़ आपको भीतर तक हरियाली में डुबो देती है,तो मुलाहिज़ा फ़रमाएं, और नय्यरा नूर की छह रचनाओं का एक एक कर आनन्द लें।
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5 comments:
स्थिति वैसी बुरी नहीं है जैसा आप कह रहे है
आज भी लोग पुराने गायकों को पसंद करते है हा ये बात अलग है की संख्या में कमी आयी है
वीनस केसरी
वाह!!
वो जो हममे तुममे करार था,
तुम्हें याद हो या न याद हो... :)
-आनन्द आ गया, विमल भाई.
नय्यरा नूर यह नाम सुन के मन अपनी ही धुन में आ जाता है
विमल भाई ,आदाब
ठुमरी पर नायरा आपा का आना वैसे ही है जैसे एक प्यारे से बाग़ीचे में बहार आ जाए.जब से ग़ज़ल और मौसीक़ी को समझने का थोड़ा सा शऊर आया है नायरा आप दिमाग़ पर छाईं हुईं हैं.ज़माना बदला किये और बदलता रहे म्युज़िक का तेवर लेकिन नायरा आपा की बलन के गुलूकार का खूटा आप हम जैसे सुननेवालों के दिलों में गढ़ा रहेगा.इस गुलदस्ते को हम तक पहुँचाने का बड़ा शुक्रिया.
मुझे नय्यारा नूर जी के गाये सभी गीत /ग़ज़ल पसंद हैं .
खास कर --ऐ इश्क हमें बर्बाद न कर....और कहूँ कैसे किस्सा ऐ दर्दो गम कोई हमनशीं हैं न यार है...ये दो गज़लें बहुत पसंद है .अगर न सुनी हों तो आप भी ज़रूर सुनियेगा.
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