पाक़िस्तान के आरिफ़ लोहार एक शानदार लोक गायक है, लाज़मी है उनको सबने सुना हो, और आज ठुमरी पर उनकी मंडली द्वारा गाया ये लोकगीत जिसमें थोड़ी पश्चिम की झलक है फिर भी कर्णप्रिय तो है, आज सुनने का मूड ज़्यादा है वैसे भी मेरी लिखने की आदत नहीं तो कोक स्टुडियो के इस कार्यक्रम की झलक यहां देखते हैं और सुनते है आरिफ़ लोहार की जुगनी ।
न शास्त्रीय टप्पा.. न बेमतलब का गोल-गप्पा.. थोड़ी सामाजिक बयार.. थोड़ी संगीत की बहार.. आईये दोस्तो, है रंगमंच तैयार..
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आज की पीढ़ी के अभिनेताओं को हिन्दी बारहखड़ी को समझना और याद रखना बहुत जरुरी है.|
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आज एक बहुत ही पुराना कोई गाना सुन रहा था वो गीत १९५० के आसपास का लिखा हुआ था ..जब भी...
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5 comments:
वाह बहुत सुंदर. लेकिन मूल जुगनी तो आरिफ़ के पिता आलम लोहार ने गाई है...आरिफ़ ने पिता से विरसे में पाया है संगीत
मेरा पसंदीदा जुगनी गीत है ये । सुन कर मन में एक अलग सी गंगा बहने लगती है। अभी हाल ही में मैंने इसके बोलों के साथ आलम जुगनी संगीत (अलिफ़ अल्लाह चंबे दी बूटी...दम गुटकूँ दम गुटकूँ :आरिफ़ लोहार का शानदार 'जुगनी' लोकगीत) की विस्तार से यहाँ चर्चा की थी।
आप का ब्लॉग संगीत की खूबसूरत दुनिया में ले जाता है.
प्रस्तुत ठुमरी मुझे भी बेहद पसंद है .
आभार.
'सी.एम.ऑडियो क्विज़'
रविवार प्रातः 10 बजे
आज दिन भर की यह मेरी एकमात्र उपलब्धि रही.. और अब सारी शिकायत जाती रही .,
बहुत सुन्दर.
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