गु़लाम अली साहब की ग़ज़लें रेडियो पर जब भी सुनता तो सुनता ही रह जाता उनकी आवाज़ और उनकी अदायगी कमाल की लगतीं और एक समय 90 के दशक में उनको दिल्ली के सीरी फ़ोर्ट में उनको लाईव सुना तो वो आज तक मेरे ज़ेहन में तारी है,आईये आज गुलाम अली साहब की हीर की तर्ज़ में गज़ल सुनते हैं। "करते हैं मोहब्बत सब ही मगर.....
न शास्त्रीय टप्पा.. न बेमतलब का गोल-गप्पा.. थोड़ी सामाजिक बयार.. थोड़ी संगीत की बहार.. आईये दोस्तो, है रंगमंच तैयार..
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आज की पीढ़ी के अभिनेताओं को हिन्दी बारहखड़ी को समझना और याद रखना बहुत जरुरी है.|
पिछले दिनों नई उम्र के बच्चों के साथ Ambrosia theatre group की ऐक्टिंग की पाठशाला में ये समझ में आया कि आज की पीढ़ी के साथ भाषाई तौर प...
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आज एक बहुत ही पुराना कोई गाना सुन रहा था वो गीत १९५० के आसपास का लिखा हुआ था ..जब भी...
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अभी जुमा जुमा कुछ ही दिन हुए हैं, आई आई टी के एक कमरे में हमारी मुलाकात हुई थी, मैं बात कर रहा हूं,उस यादगार शाम की जब थॊड़े से चिट्ठाकारों ...
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क्या कवि सम्मेलनों का दौर ख़त्म होता जा रहा है, एक समय था जब छोटे छोटे शहरों में कवि सम्मेलनों और मुशायरों की वजह से शहर में चहल पहल खूब हु...
2 comments:
क्या बात है सर जी ..... मज़ा आ गया ....
बहुत ही नायाब सा कुछ सुना आज ..आभार.
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