
मुक्ति....मुक्ति.....मुक्ति...आखिर आदमी मुक्ति क्यों पाना चाहता है, किस चीज़ से मुक्त होना चाहता है.... शरीर से, समाज से, या इस पूरे ब्रम्हांड से... जब उसे पता ही नहीं कि कहां से आया है और जाना किधर है.. तो मुक्ति पाकर वो सिर्फ़ इस संसार से मुक्त होना चाहता अगरचे ये कहा जाय तो जीवन के इस झमेले से भागना चाहता है.. जहां नित नये रेले पेले में अपनी ज़िन्दगी गर्त में जाते देखता रहता है... पर अभी भी सही इलाज़ नही ढूढ पाया है. पर मेरा उद्देश्य यहां किसी मुक्ति की सुक्ति ढूढना कतई नही है, क्योंकि मेरे लिये भी ये सारी चीज़ें मगज में खाली पीली बूम मारने जैसा ही है...
अरे, आप इस दुनिया को समझना चाहते हैं तो पता नहीं कितने जन्म लें फिर भी समझ पाना मुश्किल ही है.. अगर आप समझ भी गये तो हमारा क्या भला होने वाला है? अपने उमर के आखिरी पल में आपको सत मिल भी गया तो किसी को क्या लेना देना......अब मेरे लिये भी इस विषय पर ज्ञान देना भारी पड़ रहा है.... असल में मेरा ये विषय भी तो नहीं है.... असल में मुझे पता भी नही कि किस क्षेत्र में मैं अच्छा दखल रखता हूं.. जीवन से मुझे क्या चाहिये बस ये.... कि मेरे पास सारी ऐशोआराम की चीज़ें हों..सिर पर कोई ज़िम्मेदारी न हो..बात करने के लिये ढेर सारे दोस्त हों..तो शायद ये दुनियां मुझे भी सुन्दर लगने लगे...मैं यहां से जाना ही ना चाहूं और रही बात मुक्ति की तो उसकी इच्छा भी न रहे... अरे, कुछ बात बन भी रही है कि मैं ऐसे ही लिखे जा रहा हूं?....


