
स्वतंत्रता दिवस की तैयारी में सरकार व्यस्त है, जनता अपने में बेहाल है। मस्त है। बाज़ार का सूचकांक चढ़ना उतरना बना हुआ है। झुग्गियों मे रह रही जनता जैस तैसे बरसात में जहां-जहां से छत टपक रही है वहाँ प्लास्टिक लगाती-चढ़ाती त्रस्त है। नौनिहाल अपने स्कूल के ड्रेस को धो रहे हैं, अपने सफेद जूतों में और खली लगाकर उसको चमकाने की जुगत में है। स्कूल का प्रिन्सिपल स्कूल के स्टोर से किसी बक्से के कोने मे पड़े तिरंगे को ढुढवा रहा है। मीडिया हमे टीवी पर बता रहा है कि दिल्ली विधान सभा मे एक आदमी कैटीन चला कर पांच हज़ार से ज़्यादा प्लाट खरीद लेता है, गाड़ियां ऐसी जो मर्सिडिज़ से भी मंहगी है। उसका मालिक बना काफ़ी समय से इतरा रहा था, आखिरकार कानून के हाथ चढ़ा। नेताओं की खरीद-फ़रोख्त संसद और विधान सभा मे धड़ल्ले से हो रही है, इसी में कुछ हैं जो मुजरिमों को सज़ा पर सज़ा दिये जा रहे है। ऐसा लगता है कि सारी व्यवस्था मानो सही चल रही है। कुछ इस बात में शान देख रहे हैं तो कुछ को लगता है कि साम्प्रदायिक नेता और संसद और विधानसभा से जुड़े जननायकों के किस्से इन न्यायालयो की दीवारों मे दफ़न हैं। एक छोटा सा वर्ग है जो धन के अकूत, बडे हिस्से पर काबिज़ है, इसकी कभी सुध होती है कभी भूले रहते हैं, जो नहीं भूलते हैं वह यह कि अगस्त महीने में नियम से स्वंतन्त्र्ता की वर्षगांठ की तैयारी करने लगते हैं!
आखिर आज़ादी का मतलब क्या है?
तिरंगा ऐसा क्यों हो गया है जो सिर्फ़ क्रिकेट के मैदान में ही लहाराया जाता है, और हार हो तो मैदान से गायब, ऐसा क्यों? शहर के चौराहे पर गरीब बच्चा हाथ में छोटे-बड़े झन्डे बेच कर उस दिन की कमाई से किसी तरह अपना पेट पाल ले, ऐसा क्यों है? आज आज़ाद देश में ऐसा भी हो रहा है कि एक विकलांग अपनी छोटी सी मांग के पूरा नही होने पर आत्महत्या करने पर मजबूर है। ये कौन लोग हैं जो विकलागों को बेबस और मजबूर बना रहे हैं, ऐसा क्यों है? क्या हम इस सबके आदी हो गये हैं? सब चलता है इस वाक्य को हमने अपना ब्रम्ह: वाक्य बन जाने दिया है? और इसी ब्रह्म: वाक्य की छतरी के नीचे प्रेम से देशभक्ति का गीत भी गाते रहते हैं, और हमें शर्म भी नहीं लगती? आइए, फिर से गाने या रेंकने लगें:
जहां डाल डाल सोने की चिडिया करती थी बसेरा ये भारत देश है मेरा ये भारत देश है मेरा....