photo by vimal
पहली बार होली के रंग से दूर हूँ , पर होली में सबके साथ बैठ कर कुछ नया सुनाने और गुनने का आनंद ही कुछ ही है ,अब जब होली आती है तो हम अपने अतीत में खो जाते हैं .....उसी में डूबते उतराते हैं, आज भी कुछ मन उसी तरह का हुआ जा रहा है , इसी मौके पर छाया गांगुली की आवाज़ में इस गीत को सुने और आनन्द लें |
न शास्त्रीय टप्पा.. न बेमतलब का गोल-गप्पा.. थोड़ी सामाजिक बयार.. थोड़ी संगीत की बहार.. आईये दोस्तो, है रंगमंच तैयार..
Monday, March 1, 2010
Tuesday, December 29, 2009
डा: कुमार विश्वास की एक रचना, कवि सम्मलेन को याद करते हुए......
क्या कवि सम्मेलनों का दौर ख़त्म होता जा रहा है, एक समय था जब छोटे छोटे शहरों में कवि सम्मेलनों और मुशायरों की वजह से शहर में चहल पहल खूब हुआ करता था, वाह वाह और मुक़र्रर का शोर आज भी कानों में ज्यों का त्यों अपनी जगह बनाए हुए है...... पर आज उस समा को हम सिर्फ महसूस ही कर सकते हैं |
लगभग दसियों साल से सब कुछ समाप्त होता दिखाई दे रहा है तो आज उन्हीं पुराने दिनों कों याद करते हुए कवि डा: कुमार विश्वास जी की रचना उन्हीं की आवाज़ में सुनिए और आनंद लीजिये, इस रचना को मित्र ज्योतिन ने उपलब्ध कराया है उनका शुक्रिया और भी इस तरह की रचनाएँ अगर मुझे मिलती है तो ठुमरी के माध्यम से आप तक ज़रूर पहुंचाया जाएगा इसकी गारंटी मैं लेता हूँ ...........नए साल में फिर कुछ इसी तरह मुलाक़ात होगी |
समीर भाई आप सुन नहीं पा रहे इसलिये नीचे वाले प्लेयर पर चटका लगा कर अब सुन सकते हैं ....वैसे मैं ऊपर वाले प्लेयर को सुन पा रहा हूँ....
लगभग दसियों साल से सब कुछ समाप्त होता दिखाई दे रहा है तो आज उन्हीं पुराने दिनों कों याद करते हुए कवि डा: कुमार विश्वास जी की रचना उन्हीं की आवाज़ में सुनिए और आनंद लीजिये, इस रचना को मित्र ज्योतिन ने उपलब्ध कराया है उनका शुक्रिया और भी इस तरह की रचनाएँ अगर मुझे मिलती है तो ठुमरी के माध्यम से आप तक ज़रूर पहुंचाया जाएगा इसकी गारंटी मैं लेता हूँ ...........नए साल में फिर कुछ इसी तरह मुलाक़ात होगी |
समीर भाई आप सुन नहीं पा रहे इसलिये नीचे वाले प्लेयर पर चटका लगा कर अब सुन सकते हैं ....वैसे मैं ऊपर वाले प्लेयर को सुन पा रहा हूँ....
Saturday, November 14, 2009
नन्हें मुन्हें बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है ?
कल तक जिन गीतों को मेरे पिता गुनगुनाते थे उनके बाद उन गीतों को हमने भी गाया गुनगुनाया .... अब हमारे बाद आने वाली पीढ़ी भी उन्हें गुनगुना और गा रही है,जब भी इन गीतों को पहले पहल गाया या सुना गया होगा सोचिये कैसा लगा होगा...आज गीत वही है समय और समाज बदल गया है,और गीतों के अर्थ भी बदल गये हैं,हम बाल दिवस मनाते हैं.... सरकार डाक टिकट छापती है....कुछ समारोह हो जाते है आज के दिन, पर बच्चों का बचपन और उनकी हंसी थोड़ी जुदा होती जा रही है..बच्चा का समय से पहले बडा़ होते जाना ...बच्चों के भारी बस्ते अभी भी भारी है....बच्चों की एक बड़ी आबादी आज भी होटलों,स्टेशनों,अनाथालयों और सड़को पर ठोकरें खाती फिर रही है..क्या उन्हें पता है हमारे यहां बच्चों से सम्बन्धित योजनाएं सिर्फ़ कागज़ पर ही बन कर रह जाती है.....खैर लिखने को तो बहुत कुछ है पर इन सदाबहार गीतों को सुनिये और सोचिये हम कैसे हो गये हैं.....नन्हें मुन्हें बच्चों की मुट्ठी में आज सचमुच क्या है....... .सब सपना हो गया है..क्या?
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Wednesday, October 28, 2009
हम नामवर न हुए तो का ! हमको ना बुलाओगे ?
बड़ी भिन्नाट हो रही है, बड़े समय बाद अपने बिलागवतन में लोग इलाहाबाद के मीट का चूरमा बना रहे हैं , अफ़सोस त ई है कि हमहुं को वहां ना बुलाके इसके संयोजक लोगो ने बहुतै गलत काम किया और उस पर ये कि नामवर लोग वहां इकट्ठा थे उनमें एक ठो नामवर पर इतना समय और ऊर्जा खर्च कर रहे हैं कि सब मनई का पढ़ पढ़ के ऐसा लग रहा है कि हम संगम नहा लिये, ई सबको नहीं बुझाता है कि नामवर के बहाने लोग अपना अपना तीर छोड़ रहे है, क्या ब्लॉगजगत में सबको बुलाना सम्भव है..कुछ तो लोग छूट जाते तो इस तरह की बहस तो कुछ भी कर लो, उठनी ही थी...जो उठ रही है और आगे भी उठेगी इसे कोई रोक सकता है?
जिस बात की चर्चा सुरेश चिपलुनकर बाबू ने छेड़ी थी उ मुद्दा रह गया पीछे अरे वही वामपंथ और हिन्दूपंथ और मुद्दा बन गया नामवर, अरे कोई बताएगा कि कि हिन्दू हितों पर लिखने वाले लोगों को क्यौं नहीं बुलाया गया? ई सब छोड़िये अब यही बता दीजिये हमको उस सम्मेलन में क्यौं नहीं बुलाया गया कोई मेरे बारे मे बोलेगा?
नामवर जी ने अगर कभी कचरा कह भी दिया तो कोई ये भी बताए कि क्या ब्लॉग में सब सुगन्धित साहित्य ही रचा जा रहा है कौन तय करेगा कि सुगन्धित क्या है? और कचरा क्या है? और जो व्यक्ति एक दिन कचरा कहता है और वही आदमी कचरे के शीर्ष में आसन करना चाहता है तो इसमें बुराई क्या है?
चिट्ठा शब्द के बारे में अगर नामवर बोल दें कि यह शब्द हमारा दिया है तो उनके कहने से क्या उनका हो जाएगा? और अगर अपने किताब में इसका श्रेय ले लें तो क्या उनको कोई रोक पायेगा?
अरे सब चिट्ठाकार इलाहाबाद में भेंट मुलाकात किये एक दूसरे को आमने सामने ज़िन्दा देखा ये क्या कम है, और जब ब्लॉगवतन के लोग एक जगह इकट्ठा हो जाँय तो क्या बात होती है क्या ये भी किसी को बताना पड़ेगा?
जिस बात की चर्चा सुरेश चिपलुनकर बाबू ने छेड़ी थी उ मुद्दा रह गया पीछे अरे वही वामपंथ और हिन्दूपंथ और मुद्दा बन गया नामवर, अरे कोई बताएगा कि कि हिन्दू हितों पर लिखने वाले लोगों को क्यौं नहीं बुलाया गया? ई सब छोड़िये अब यही बता दीजिये हमको उस सम्मेलन में क्यौं नहीं बुलाया गया कोई मेरे बारे मे बोलेगा?
नामवर जी ने अगर कभी कचरा कह भी दिया तो कोई ये भी बताए कि क्या ब्लॉग में सब सुगन्धित साहित्य ही रचा जा रहा है कौन तय करेगा कि सुगन्धित क्या है? और कचरा क्या है? और जो व्यक्ति एक दिन कचरा कहता है और वही आदमी कचरे के शीर्ष में आसन करना चाहता है तो इसमें बुराई क्या है?
चिट्ठा शब्द के बारे में अगर नामवर बोल दें कि यह शब्द हमारा दिया है तो उनके कहने से क्या उनका हो जाएगा? और अगर अपने किताब में इसका श्रेय ले लें तो क्या उनको कोई रोक पायेगा?
अरे सब चिट्ठाकार इलाहाबाद में भेंट मुलाकात किये एक दूसरे को आमने सामने ज़िन्दा देखा ये क्या कम है, और जब ब्लॉगवतन के लोग एक जगह इकट्ठा हो जाँय तो क्या बात होती है क्या ये भी किसी को बताना पड़ेगा?
Sunday, October 18, 2009
किरण आहलुवालिया की आवाज़ में कुछ ग़ज़लें
कुछ ही दिन हुए कि एक पुराने गीत को याद करते हुए एक पोस्ट ठुमरी पर चढ़ाई थी, रचना अधूरी थी तो अपने मित्र पंकज ने पूरी रचना मेरे पास भेजी मैने उसे हूबहू चढ़ा दी ये सोचते हुए कि कम से कम वो रचना अंतर्जाल पर तो हमेशा रहेगी ही, खैर कुछ टिप्पणिया भी आईं उनमें से एक टिप्पणी मानसी की भी थी "ये पोस्ट तो अच्छी है पर ये क्या हो रहा है ठुमरी में? हम क्वालिटी गीत संगीत की आशा ले कर आये थे" तब मुझे वाकई लगा कि मानसी ग़लत तो कह नहीं रहीं पर क्या करें इधर कुछ नया भी सुनने को मिला नहीं और मेरी कोशिश भी यही रहती है कि वही रचना ठुमरी पर चढ़ाई जाय जिसे लोगों ने कम सुना हो और कम से कम वो रचना स्तरीय तो हो ही, तो उसी कड़ी में आज किरण आहलूवालिया की आवाज़ में कुछ रचनाएं आपके लिये लेकर आया हूँ, किरण आहलूवालिया के बारे में सिर्फ़ इतना कि आवाज़ और लय तो खूब है उनके पास पर उनके शब्द अगर कहा जाय तो मोती जैसे नहीं हैं, या कहा जाय बहुत साफ़ शब्द कानों को सुनाई नहीं देते, फिर भी किरण को सुनना सुखद है तो आप भी सुनें....
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Tuesday, October 13, 2009
हर लोमड़ी यहां पर अंगूर खा रही है, खा पाये जो न उसको खट्टा बता रही है ...
एक अधूरी रचना जो मेरे अंदर इस चुनाव के वातावरण में रह रह कर याद आ रही थी..और खास बात कि पूरी रचना मुझे याद भी नहीं हो पा रही थी...इस विश्वास के साथ मैने पिछले पोस्ट में उस रचना को ठुमरी पर चढ़ा दी कि अपने पुराने मित्र जब पढेंगे तो इसे कम से पूरा तो ज़रूर करेंगे...और हुआ भी वैसा कि हमारे पुराने संघतिया पंकज श्रीवास्तव ने उस रचना को मेरे पास भेज दिया वैसा जैसा कि हम कभी मिलकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में गाया करते थे , दस्ता इलाहाबाद के ओस में भीगे सुहाने दिन याद आ गये, उस ज़माने की तस्वीर भी तो नहीं है कि यहां लगा देते....खैर मित्र पंकज का शुक्रिया अदा करते हुए इस रचना को दुबारा पोस्ट कर रहा हूँ...जो अब पूरी है ।
दिल्ली में दीखता है जंगल का ही नजारा
रहने को घर नहीं है, हिंदोस्तां हमारा
गुणगान हो रहा है, मालाएं पड़ रही हैं
हर शाख उल्लुओं की शक्लें उभर रही हैं
कुछ रीछ नाचते हैं, कुछ स्यार गा रहे हैं
जो जी हुजूर कुत्ते थे, दुम हिला रहे हैं।
हर खेत सांड़ चरते बैलों को नहीं चारा
रहने को घर नहीं है----
हर लोमड़ी यहां पर अंगूर खा रही है
खा पाए जो न उसको खट्टा बता रही है
अपराध तेंदुओं का खरगोश डर रहे हैं
भेड़ों की भेड़िए ही रखवाली कर रहे हैं
पिंजड़ों में सारिकाएं गिद्दों का चमन सार
रहने को घर नहीं है...
हर लॉन लाबियों में गदहे टहल रहे हैं
बिल्ली की हर अदा पर चूहे उछल रहे हैं
सांपों की बांबियों में चूहों के मामले हैं
मानेंगे न्याय करके बंदर बड़े भले हैं
हैं मगरमच्छ जब तक, क्या नदियों की धारा
रहने को घर नहीं----
सिर पर सुबह उठाए मुर्गे दिखा रहे हैं
सूरज का फर्ज क्या है, उसको बता रहे हैं
चिड़ियों के घोसलों में कौओं का संगठन है
पेड़ों को टांग उल्टा, चमगादड़ें मगन हैं
कितने ही घोसलों का बचपन है बेसहारा
रहने को घर---
लकदक पहन उजाले बगुले खड़े हुए हैं
तप से हुए हैं पैदा तप से बड़े हुए हैं
न जाल है न बंसी, फिर भी विकट मछेरे
अनजान हैं मछलियां, निकलीं बड़ी सवेरे
उनको न भंवर कोई, उनका नहीं किनारा
रहने को घर नहीं है----
ये गीत रामकुमार कृषक या कमल किशोर श्रमिक का है..तड़प उठी है तो इसका पता भी लगा लेंगे। शुक्रिया उन दिनों की याद दिलाने के लिए...हाथ में ढफली लिए मगन मन 'दस्ता'...
दिल्ली में दीखता है जंगल का ही नजारा
रहने को घर नहीं है, हिंदोस्तां हमारा
गुणगान हो रहा है, मालाएं पड़ रही हैं
हर शाख उल्लुओं की शक्लें उभर रही हैं
कुछ रीछ नाचते हैं, कुछ स्यार गा रहे हैं
जो जी हुजूर कुत्ते थे, दुम हिला रहे हैं।
हर खेत सांड़ चरते बैलों को नहीं चारा
रहने को घर नहीं है----
हर लोमड़ी यहां पर अंगूर खा रही है
खा पाए जो न उसको खट्टा बता रही है
अपराध तेंदुओं का खरगोश डर रहे हैं
भेड़ों की भेड़िए ही रखवाली कर रहे हैं
पिंजड़ों में सारिकाएं गिद्दों का चमन सार
रहने को घर नहीं है...
हर लॉन लाबियों में गदहे टहल रहे हैं
बिल्ली की हर अदा पर चूहे उछल रहे हैं
सांपों की बांबियों में चूहों के मामले हैं
मानेंगे न्याय करके बंदर बड़े भले हैं
हैं मगरमच्छ जब तक, क्या नदियों की धारा
रहने को घर नहीं----
सिर पर सुबह उठाए मुर्गे दिखा रहे हैं
सूरज का फर्ज क्या है, उसको बता रहे हैं
चिड़ियों के घोसलों में कौओं का संगठन है
पेड़ों को टांग उल्टा, चमगादड़ें मगन हैं
कितने ही घोसलों का बचपन है बेसहारा
रहने को घर---
लकदक पहन उजाले बगुले खड़े हुए हैं
तप से हुए हैं पैदा तप से बड़े हुए हैं
न जाल है न बंसी, फिर भी विकट मछेरे
अनजान हैं मछलियां, निकलीं बड़ी सवेरे
उनको न भंवर कोई, उनका नहीं किनारा
रहने को घर नहीं है----
ये गीत रामकुमार कृषक या कमल किशोर श्रमिक का है..तड़प उठी है तो इसका पता भी लगा लेंगे। शुक्रिया उन दिनों की याद दिलाने के लिए...हाथ में ढफली लिए मगन मन 'दस्ता'...
Friday, October 9, 2009
दिल्ली में दीखता है जंगल का ही नज़ारा
चुनाव का मौसम आ गया पूरे देश में विधान सभा के चुनाव हो रहे है हैं,हर जगह नेताओं की मुस्कुराती तस्वीर के होर्डिंग, भाषण , रैली का दौर बस कुछ दिन, जनता से जुड़ाव, और फिर चुनाव के बाद शान्ति,नेताओं के वादे इरादे सब उनके पास , अभी गठरी पर एक इस रचना को देखकर एक बहुत पुरानी रचना की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही है....मुझे उम्मीद है मेरे सुहाने दिनों के मित्र अगर इसे पढेंगे तो इस अधूरी रचना को पूरा भी कर सकेंगे:
रहने को घर नहीं है, हिन्दोस्तां हमारा
दिल्ली में दीखता है जंगल का ही नज़ारा
लक-दक पहन उजाले बगुले खड़े हुए हैं
तप से हुए हैं पैदा, तब से बड़े हुए हैं
ना जाल है न बंसी फिर भी विकट मछेरे
अंजान हैं मछलियाँ निकली अभी सवेरे
उनको न भंवर कोई न उनका है किनारा
दिल्ली में दीखता है जंगल का ही नज़ारा
अब इसके आगे की पंक्तियाँ याद नहीं ...........अगर आप इसे पूरा कर सकें तो मेहरबानी,और ये भी याद नहीं कि ये रचना किसकी है बस मौके पर याद आ गई तो चेप रहा
रहने को घर नहीं है, हिन्दोस्तां हमारा
दिल्ली में दीखता है जंगल का ही नज़ारा
लक-दक पहन उजाले बगुले खड़े हुए हैं
तप से हुए हैं पैदा, तब से बड़े हुए हैं
ना जाल है न बंसी फिर भी विकट मछेरे
अंजान हैं मछलियाँ निकली अभी सवेरे
उनको न भंवर कोई न उनका है किनारा
दिल्ली में दीखता है जंगल का ही नज़ारा
अब इसके आगे की पंक्तियाँ याद नहीं ...........अगर आप इसे पूरा कर सकें तो मेहरबानी,और ये भी याद नहीं कि ये रचना किसकी है बस मौके पर याद आ गई तो चेप रहा
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