एक फ़िल्म मुझे जीने दो आई थी,उस फ़िल्म में सुनील दत्त साहब का रोबीला चेहरा और काला लिबास और माथे पर तिलक....घोड़े पर सवार सुनीलदत्त साहब का वो रूप आज भी मुझे याद है,इसी फ़िल्म में वहीदा रहमान ने भी काम किया था,फ़िल्म तो देखे ज़माना हो गया, कुछ भूली बिसरी यादें ही रह गईं हैं....पर गाने इस फ़िल्म के आज तक याद है...साहिर लुधियानवी के लिखे गीतों को संगीत में पिरोया था संगीतकार जयदेव ने...कमाल की धुने थी कि आज भी सुने तो मज़ा आता है...एक गाना था नदी नारे जाओ श्याम पईयाँ पड़ूँ, जिसे लता जी ने गाया था...एक गाना था अब कोई गुलशन न उजड़े अब वतन आज़ाद है जिसे मो. रफ़ी साहब ने गाया था...एक गाना और था तेरे बचपन को जवानी की दुआ देती हूँ.पर इसी फ़िल्म का एक और गीत जो आज मेरे हाथ लगा है वो है रात भी है कुछ भीगी भीगी......तो आज इसे सुना जाय और मज़ा लिया जाय..
सुनील दत्त साहब का वो चेहरा
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Friday, 16 May, 2008
रात भी है कुछ भीगी भीगी....
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मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा.....अहमद हुसैन- मोहम्मद हुसैन.....
इस गज़ल को सुनता हूँ तो बहुत सी पुरानी यादों मे खो सा जाता हूँ, अहमद हुसैन मोहम्मद हसैन साहब की जोड़ी कमाल है, गायकी में गज़ब की हारमनी पैदा करते हैं,दोनों की आवाज़ का सुरूर ही कुछ ऐसा है कि इनकी कुछ गज़लों को बार बार सुनने का मन करेगा... आज सुनिये इनकी गायी ग़ज़ल,ये उन ग़ज़लों में शामिल है जिन्हें मैने पहली बार रेडियो पर सुना था....तो पेश है गज़ल मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा
बच्चों को संगीत की बारीकियाँ बताते एहमद हुसैन-मोहम्मद हुसैन
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Labels: ग़ज़ल
Thursday, 15 May, 2008
चंदन दास की एक गज़ल.....
आज चंदन दास की एक गज़ल सुनिये,वैसे चाहता तो था कि और भी गज़लें जो मुझे पसंद हैं चंदन दास की वो सुनवाता पर आज एक ही ग़ज़ल सुनिये....चंदन दास की आवाज़ दमदार है पर ना जाने क्यौं उनकी गज़लों की फ़ेहरिस्त बहुत छोटी है....कुछ ही गज़लें मुझे पसन्द आयीं थी....जिसमें एक तो खुशबू की तरह आया, वो हवाओं में.. मुझे बहुत पसन्द है, आज भी कभी सुनने को मिल जाता है तो मज़ा आ जाता है। आज उनकी एक ग़ज़ल सुनिये और आनन्द लीजिये....
न जी भर के देखा न कुछ बात की....
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Friday, 9 May, 2008
एक ठुमरी सेक्सोफ़ोन पर....
खास बात है कि आपको आज सेक्सोफ़ोन पर ठुमरी सुनाने का मन कर रहा है वैसे भी शहनाई पर तो उस्ताद बिस्मिल्लाह खां साहब ने तो बहुत सी यादगार धुनें सुनाई हैं....पर सेक्सोफ़ोन पर आज राग भैरवी में ठुमरी का आनन्द लीजिये,ये रचना चुंकि नेट सर्च पर मिली है इसलिये बहुत कुछ बताने की अपनी स्थिति है ही नहीं...अब जो जानता हो हमें बताए...बस मुझे इतना पता है कि राशिद खा़न ने इसे लाहौर में कहीं बजाया था..अब मुझे तो ये भी नहीं पता कि ये अपने उस्ताद राशिद ख़ान हैं या पाकिस्तान के कोई राशिद खा़न हैं...सेक्सोफ़ोन पर ठुमरी सुनना सुखद लगा तो आपके लिये भी परोस रहा हूँ...कैसा लगा? बताईयेगा ।
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