इरफ़ान जी ने टूटी बिखरी में भोजपुरी के बदनाम गानों की एक लम्बी फ़ेहरिस्त लगाकर वाकई बहुत अच्छा काम किया,दर असल अगर देखा जाय तो भोजपुरी के नाम पर इसके सिवा कोई बहुत अच्छा का काम हुआ भी नहीं है और आज भोजपुरी फ़िल्में धड़ाधड़ बन तो रही हैं पर माल काटने के चक्कर में कोई मेहनत करके अच्छी फ़िल्म और अच्छे गीत जनता को दे ऐसी यहां किसी की चिन्ता भी नहीं है.
खैर टूटी हुई बिखरी हुई पर उन बदनाम भोजपुरी गीतों को सुनने के बाद लगा कि एक काम और भी किया जा सकता है कि कुछ बेहतर रचनाएं भी अगर कहीं दिखे उन्हें कम से कम एक जगह इकट्ठा तो किया ही जा सकता है, लोकगीत तो भोजपुरी में भरा पड़ा है पर ऑडियो में हमारे पास फ़िल्मी भोजपुरी गीतों के अलावा अभी भी बहुत कुछ ऐसा नहीं मिलता कि सुन कर दिल बाग बाग हो है ,भोजपुरी में आल्हा,कजरी,चैती,विवाह गीत,सोहर आदि तो खूब सुनने को मिल जाता है पर एक अच्छे अलबम के नाम पर हमारे पास ऐसा कुछ नही है जिस पर गर्व किया जाय,मशहूर गायिका शारदा सिन्हा की आवाज़ मुझे तो बहुत अच्छी लगती है अगर उनका गाया "पनिया के जहाज़ से पल्टनिया बने अईहा हो" अगर खोजने पर मिला तो आपको ज़रूर सुनवाउंगा, पिछले पोस्ट में फ़िल्म "गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबों" के मधुर गीतों से आपको रूबरू कराया था आज इसी फ़ेहरिस्त में "लागी नहीं छूटे रामा" के गीत लेकर आया हूँ, मऊ (उत्तर प्रदेश) के श्री जगलाल जी ने "गंगा मईया तोहे पियरी ....के गानों को सुनकर अपनी खुशी ज़ाहिर की थी,फ़ोन पर उनसे बहुत देर तक भोजपुरी गीतों को लेकर हमारी बात हुई उनका कहना था इन गानों को किसी छोटे शहर के म्यूज़िकल स्टोर में तलाशना दुरूह कार्य है और लगे हाथ "लागी नाहीं छूटे रामा" और "बिदेसिया" के गीतों को भी सुनने की इच्छा ज़ाहिर की थी तो आज इसी फ़ेहरिस्त में "लागी नहीं छूटे रामा" के कुछ गीत लेकर आया हूँ, मज़ा लीजिये. वैसे इस फ़िल्म के बारे में कुछ और जानना चाहें तो आवाज़ पर भी पढ़ सकते हैं.
आज भोजपुरी फिल्म का स्तर वाकई बहुत गिर गया है पर जब भोजपुरी फिल्म की शुरुआत हुई थी तब ऐसी स्थिति नहीं थी जो आज है, साठ के दशक में भोजपुरी में बनी पहली फिल्म "
में कम से कम सामाजिक सरोकार तो दिखता था पर ये ज़रुर है कि कुछ अच्छी भोजपूरी फ़िल्म बनने की जो शुरुआत हुई थी जैसे "लागी नाही छूटे रामा" या "बिदेसिया" जैसी फ़िल्मों के बाद फ़िल्मों का स्तर निम्न स्तर का होता चला गया,उन पुरानी फ़िल्मों के गीतों को सुनना आज भी एक सुखद एहसास दे जाता है, आज भोजपूरी फिल्म का जो हाल है किसी से छुपा नहीं है, मनोज तिवारी जब फ़िल्म के हीरो नहीं बने थे तब का उनका गाया लोकगीत "असिये से कईके बी ए लईका हमार कम्पटीशन देता" पसन्द आया था ,पर आज भी इन पुरानों गीतों में अपनी की सी महक है जो भुलाए नहीं भूलती शुरुआती दौर ही मील का पत्थर सबित होगा ये किसी ने सोचा नहीं था,
आज वो गीत मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ," हे गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबो.... ये गीत लता जी और उषा मंगेशकर की आवाज़ में है मधुर गीत शैलेन्द्र के लिखे हैं और संगीत चित्रगुप्त का है।
भाई, मेरे मित्र अखिलेश धर हैं, बहुत दिनों से सोचते सोचते आखिरकार उन्होंने अपना ब्लॉग BADFAITH के नाम से शुरु किया है,अभी उन्होंने अपनी लिखी एक कविता पोस्ट की है। उम्मीद है कि अपने ब्लॉग के माध्यम से वो ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक अपने दार्शनिक विचार ले जा पायेंगे,भाई हम तो स्वागत करे ही रहे हैं आप भी उनका उत्साह ज़रूर बढ़ाएं।
गज़ल, कव्वाली,सूफ़ी रचनाएं सब बीते दिनों की बात हो गई हो जैसे,हम जैसे लोग आज भी गज़लों को सुनते हैं, गुनगुनाते हैं, मौका मिले तो गाते हैं,पर आज की पीढ़ी को तो ये सब स्लो स्लो सा लगता है,और हम हैं कि ग़ज़लों के मायने समझते हुए बड़े तल्लीन भाव से सुनते हैं,गज़ल गायकी के पंडित जगजीत सिंह, उस्ताद ग़ुलाम अली, गुरुवर मेहदी हसन,नुसरत साहब आदि आदि ने जो बीसियों साल पहले गाकर छोड़ दिया हमारी भी दुनियां उन्हीं के आस पास सिमट कर रह गई है,नये के नाम पर फ़्यूज़न ही है जिसे हम पूरी तरह स्वीकार भी नहीं कर पाये,प्रयोग तो होते रहेंगे और हम हमेशा की तरह कचरे से मोती तलाशते रहेंगे, आज कुछ यूं हुआ कि नय्यरा नूर को सुन रहा था," ऐ ज़ज़बाए दिल गर मैं चाहूँ,हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाय" इतनी सधी और मीठी आवाज़ को बार बार सुनने को जी करता है,तो सोचा कुछ और भी रचनाएं नय्यरा जी की तलाशते है और इकट्ठा अलग अलग रचनाओं का आनन्द लिया जाय, और क़ामयाबी मिल ही गई, नय्यरा नूर की भीनी- भीनी आवाज़ आप जब सुन रहे हों तो क्या मजाल कि बीच में छोड़ कर उठ जाँय,,एक अजीब सी खनक लिये नय्यरा नूर की आवाज़ आपको भीतर तक हरियाली में डुबो देती है,तो मुलाहिज़ा फ़रमाएं, और नय्यरा नूर की छह रचनाओं का एक एक कर आनन्द लें।
नय्यरा नूर के बारे में और जानना चाहें तो यहाँ क्लिक कर सकते हैं
सचिन देव बर्मन बेहतरीन संगीतकार तो थे ही पर उससे भी बेहतर उन्होंने अपनी आवाज़ का खूबसूरती से प्रयोग किया था,उनके गाये सभी गीत सीधे आपके दिल से तादात्म्य स्थापित कर लेते थे, दादा की आवाज़ में गज़ब की कशिश थी जिसे बीस तीस पचास साल भी आप भुला नहीं सकते ये मैं दावे के साथ कह सकता हूं ,तो कुछ रचनाएँ इधर उधर से इकट्ठा की हैं मैंने,इनमें से कुछ गीतों कों तो कभी कदास रेडियो टीवी पर सुन तो लेते हैं पर यहाँ आप पूरे सुकून से सुन सकते है। सचिन देव बर्मन के बारे में कुछ ज़्यादा जानना चाहते है तो यहाँक्लिक करके जान सकते है।
यहाँ सचिन दा की गाई रचनाएँ हैं जो गाइड,अराधना,बन्दिनी,सुजाता,तलाश और ज़िन्दगी-ज़िन्दगी फ़िल्म से है।
पिछले दिनों यूनुस जी ने रेडियोवाणी की दूसरी साल गिरह मनाई थी,आज ११ अप्रैल को ठुमरी भी दो साल की हो गई, ठुमरी पर जो मेरी पहली पोस्ट थी उसे आज फिर से पोस्ट कर रहा हूँ।
बचपन की सुहानी यादो की खुमारी अभी भी टूटी नही है..
जवानी की सतरगी छाव बलिया,आज़मगढ़, इलाहाबाद, और दिल्ली मे..
फिलहाल १२ साल से मुम्बई मे..
निजीचैनल के साथ रोजी-रोटी का नाता..
असल में जो पोस्ट पहले पहल ठुमरी के लिये लिखी गई थी वो दो साल से ठुमरी के एडिट वाले भाग में लम्बे समय से पड़ी थी,शायद इस पोस्ट की क़िस्मत में आज के दिन ही छपना लिखा था, वो पोस्ट मूल रूप से आपके सामने है। अरे, क्या नहीं दिखा, भाई?... और क्यों नहीं दिखा? हम घास छील रहे हैं? कि आप गलत महफिल में चले आये हैं, बात क्या है? जो भी है अच्छा नहीं है...
"ठुमरी" नाम अपने अज़दक का दिया हुआ है, पहली पोस्ट छपने के बाद भी ठुमरी की दिशा तय नहीं हो पायी थी, बहुत सुविधाजनक तरीके़ से पहली ही पोस्ट में एक कुत्ते की तस्वीर लगा कर किसी तरह पोस्ट पूरी की गई,क्यौकि कुछ भी लिखने की अपनी स्थिति दूर दूर तक थी ही नहीं, खैर अज़दक महोदय को लगता था कि मैं लिख सकता हूँ? और मेरी स्थिति ऐसी कि ब्लॉग की दुनियाँ से अनजान,अन्य चिट्ठे पर जा जा कर टिप्पणी करता रहता और कुछ दिनों बाद मैने देखा कि टिप्पणी करते करते कुछ कुछ लिखने लग गया हूँ,और धीरे धीरे ये तय भी होता गया कि ठुमरी को अपनी पसन्दीदा संगीत रचनाओं और साथ साथ अपने मन में उमड़ते गुबारों का मंच बनाना है ,कितना सफल हुआ ये तो पता नहीं, पर खुद को कुछ कुछ जानने में अपनी ठुमरी ने बहुत मदद की है , साथ साथ उन्हें भी मैं धन्यवाद देना चाहूंगा जिन्होंने हिन्दी में लिखने वाले आसान औजार बनाए,जिसकी वजह से मेरे जैसे लोग भी हिन्दी में टूटा फूटा ही सही, लिखने लगे ,उन्हें भी मेरा सलाम पहुंचे जो गाहे बगाहे ठुमरी पर आकर अपनी टिप्पणियो से मेरा मनोबल हमेशा बढ़ाते रहे हैं। और उनको भी मेरा सलाम जिन्होंने ठुमरी को अपने चिट्ठे पर जगह दी है।
और इसी बात पर मुन्नी बेग़म की गायी हुई कुछ फड़कती हुई ग़ज़लो को सुनते हैं,जिन्हें किसी भी महफ़िल में आप भी गायें तो महफ़िल लूट सकते हैं।
गुलज़ार साहब वाकई कलम और आवाज़ के जादूगर हैं,अपनी रचनाओ में जब शब्दों को रंग की तरह भरते चले जाते है तो वो रचना बहुत कुछ अपने अनुभव का कोलाज सा लगने लगती है, कभी कभी तो कुछ शब्दों का इस्तेमाल करके आपको चौंका देते है,अपनी गीतों में कुछ ऐसा संसार रचते हैं कि सुनने वाले को यहीं लगेगा कि भई ये तो गुलज़ार साहब ही लिख सकते हैं,बहुत से गाने तो आज भी मन के आंगन में गूजते ही रहते हैं, खामोशी,सीमा, मौसम आंधी और जब ओमकारा का वो गीत "नमक इश्क़ का या इक कौड़ी चाँद की...या "जब कजरार कजरारे" हो या उनकी लिखी अनगिनत रचनाएं आपके अंदर एक अलग ही महक पैदा करते हैं,वैसे जब पहली बार मैने मिर्ज़ा ग़ालिब सीरियल के मुखड़े में गुलज़ार साहब की रोबीली दमदार आवाज़ सुनी तो उनकी कलम के साथ -साथ उनकी आवाज़ के भी हम कायल हो गये थे।
गुलज़ार साहब के बारे में सुना है कि वो चलताउ काम करना पसन्द नहीं करते,अपनी रचनाओं को लिखने में उनसे आप ये नहीं कह सकते कि दो दिन में आप लिख कर दे दीजिये......मेरे मित्र राजेश सिंह हैं जब उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म "बेताबी" के लिये विशाल भारद्वाज को बतौर संगीतकार लिया था पर गाने को कम समय में लिखना था लिहाज़ा गुलज़ार साहब ने इतनी जल्दी लिखने से मना कर दिया था, वैसे गुलज़ार साहब का लिखा संगीतबद्ध करना भी आसान नहीं होता ... मेरे मित्र हैं मिश्राजी उन्होंने एक घटना याद दिलाई कि "दिल ढूढता है फिर वही फ़ुर्सत के रात दिन" ये गीत गुलज़र साहब ने फ़िल्म "आंधी" के लिये लिखा था पर आरडी दादा की धुन में न आरडीदादा को मज़ा आ रहा था ना गुलज़ार साहब को,लिहाज़ा उस गीत को उन्होंने आंधी में इस्तेमाल ही नहीं किया बाद में इस गीत को गुलज़ार साहब ने फ़िल्म "मौसम" में इस्तेमाल किया और तब संगीबद्ध किया मदन मोहन साहब,बताने की ज़रुरत नहीं कि ये गीत भी कितना मोहक था जो आज भी आपको ताज़ा करने का दम रखता है।
सुना तो ये भी है कि स्लमडॉग का जै हो जिसपर गुलज़ार साहब को ऑस्कर से नवाज़ा गया है दरअसल इस गीत को गुलज़ार साहब ने सुभाष घई कि फ़िल्म "युवराज" के लिये लिखा था पर उस फ़िल्म ये गाना इस्तेमाल हो नहीं पाया, और रहमान ने गुलज़ार से पूछकर ये गाना स्लमडॉग में चिपका क्या दिया चारों तरफ़ जै हो का शोर ही मच गया पर ये गाना मुझे पसन्द नहीं आया।
मेरे फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े पुराने मित्र है आर एल मिश्रा और समीर चौधरी ( सलिल चौधरी के छोटे भाई) जिनसे पुरानी फ़िल्मों से जुड़ी बहुत सी घटनाएं सुनकर आनन्द आता है, जब कभी पुरानी बात छिड़ जाती है तो बस हम चुपचाप बैठकर उन्हें सुना करते है ऐसे ही एक दिन पता चला कि गुलज़ार साहब को जब पहला गाना लिखने को मिला था तब सचिन देव बर्मन दादा ने उनको बुलाया और समझाया था कि "चांदनी रात है, प्रेमिका को अपने प्रियतम से मिलना तो है पर ऐसी चांदनी है कि लोग उसे पहचान जाएंगे",गुलज़ार साहब ने लिखा "मोरा गोरा अंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे,छुप जाउंगी ही रात ही में ,मोहे पी का संग दई दे", ये गाना तो खूब लोकप्रिय हुआ था।
चलिये तो पहले हम गुलज़ार साहब के लिखे पहले गीत सुनते हैं।
और लगे हाथ गुलज़ार साहब का लिखा "चड्डी पहन के फूल खिला है"जो जंगल बुक का शीर्षक गीत था सुनते हैं वैसे मासूम फ़िल्म का "लकड़ी की काठी" भी बच्चों में ही नहीं सभी की पसन्द बन गया ।
दरअसल मैं तो सिर्फ़ गुलज़ार साहब की आवाज़ में इन रचनाओं को सुनावाना चाह रहा था जिसे नीचे क्लिक करके आप सुन सकते हैं..पर लिखने बैठा तोऔर भी बहुत सी चीज़ें जुड़ती चली गई और कुछ इस तरह की पोस्ट बन गई, उम्मीद है आनन्द आया होगा। तो अब आप गुलज़ार साहब की आवाज़ में उनकी कुछ रचनाएं सुनिये,पढ़ने का अंदाज़ इतना प्रभावशाली है कि उनको सुनते हुए आप खुद ब खुद बहते चले जाते हैं।