Saturday, July 11, 2009

एक कजरी पं.छन्नूलाल मिश्र जी की आवाज़ में ....

लोग ना जाने किन किन बहसों में लगे हैं, कभी इन बहसों का अन्त होने वाला भी नहीं है ,तो घड़ी भर जहां मन को सुकून मिले ऐसी विषम स्थितियों में कुछ अच्छा गीत संगीत सुनने से मन के अन्दर जो उर्जा मानव मन को मिलती है उसका कोई जोड़ नहीं है। रिमझिम बरसात की फुहार से अभी अभी रूबरू होकर घर में घुसा हूँ, दिन भर ऑफ़िस की गहमा गहमी,कहीं गुजरात में लोग मर रहे है,तो कहीं कोई आत्महत्या कर रहा है,कहीं लोग समलैंगिस्तान बनाने पर आमादा हैं तो बहुत से लोग इसके बरखिलाफ़ हैं।



फोटो गुगुल के सौजन्य से


कहीं मन की बेचैनी है जो खत्म होने का नाम नहीं लेती,बहुत दिनों से कुछ ठुमरी पर चढ़ाया ही नहीं था और ऐसा भी नहीं कि लोग ठुमरी पर कुछ ताज़ा सुनने के लिये बेकरार हों, इधर लाईफ़लॉगर की वजह से पुरानी पोस्ट जो लाईफ़ लॉगर के प्लेयर पर चढ़ाया था उसकी बत्ती लाईफ़लॉगर वालों ने गुल कर दी है ये बात अभी मुझे बहुत परेशान कर रहीं है,काफ़ी सारी मेहनत अब लाईफ़लॉगर की वजह से कुर्बान हो गई मुझे इसका मलाल तो हमेशा रहेगा।

चलिये इस रिमझिम भरे मौसम में कुछ हो जाय, पता है यहां मुम्बई में मौसम के बदलते देर नहीं लगती, कहते हैं मौसमी फल खाना शरीर के लिये लाभप्रद होता है,वैसे "मौसमी रचना भी अगर दिल से सुनी जाय तो मन में सकारात्मक विचार पैदा होता है" ये बात किसी ने कहा है या नहीं पर आज मैं कह दे रहा हूँ, तो अब बहुत ज़्यादा भांजने के बजाय मुद्दे पर आते हैं और पं. छ्न्नूलाल मिश्र जी की मखमली आवाज़ का लुत्फ़ लेते हुए एक कजरी सुनते है। यहां भी क्लिक करके पंडित छन्नूलाल जी की गायकी का लुत्फ़ लिया जा सकता है


Sunday, June 28, 2009

पंचम दा को याद करते हुए......

आज अगर हमारे बीच पंचम दा होते तो सत्तर बरस के होते,कल ही तो उनके जन्म दिन पर हम उन्हें याद कर रहे थे,सचिन दा के बेटे तो थे पर उनकी पहचान पर कभी सचिन दा का साया नहीं पड़ा,यही तो उनकी खासियत थी, "सुबह" नाम का एक सीरियल आया करता था दूरदर्शन पर उसका शीर्षक गीत पंचम दा ने गाया था,नेट पर तलाशते तलाशते मिल गया,इस अलग सी आवाज़ को सुनिये और उन दिनों को याद कीजिये.

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पंचम दा ने कुछ फ़िल्मों की थीम म्युज़िक भी बनाई थी, आज पंचम दा को याद करने लिये उनकी बनाई कुछ यादगार थीम म्युज़िक का आनन्द लेते है जैसे इसे सुनिये जो फ़िल्म शोले से है..



और नीचे वाले प्लेयर में अलग अलग फ़िल्मों का थीम म्युज़िक मिक्स है जिसे आप ज्यों ज्यों सुनियेगा त्यों त्यों फ़िल्म का नाम भी याद आ आता जायेगा..................... है ना यादगार?

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Sunday, June 21, 2009

भोजपुरी फ़िल्म "लागी नाहीं छूटे रामा " के कुछ गाने....

इरफ़ान जी ने टूटी बिखरी में भोजपुरी के बदनाम गानों की एक लम्बी फ़ेहरिस्त लगाकर वाकई बहुत अच्छा काम किया,दर असल अगर देखा जाय तो भोजपुरी के नाम पर इसके सिवा कोई बहुत अच्छा का काम हुआ भी नहीं है और आज भोजपुरी फ़िल्में धड़ाधड़ बन तो रही हैं पर माल काटने के चक्कर में कोई मेहनत करके अच्छी फ़िल्म और अच्छे गीत जनता को दे ऐसी यहां किसी की चिन्ता भी नहीं है.

खैर टूटी हुई बिखरी हुई पर उन बदनाम भोजपुरी गीतों को सुनने के बाद लगा कि एक काम और भी किया जा सकता है कि कुछ बेहतर रचनाएं भी अगर कहीं दिखे उन्हें कम से कम एक जगह इकट्ठा तो किया ही जा सकता है, लोकगीत तो भोजपुरी में भरा पड़ा है पर ऑडियो में हमारे पास फ़िल्मी भोजपुरी गीतों के अलावा अभी भी बहुत कुछ ऐसा नहीं मिलता कि सुन कर दिल बाग बाग हो है ,भोजपुरी में आल्हा,कजरी,चैती,विवाह गीत,सोहर आदि तो खूब सुनने को मिल जाता है पर एक अच्छे अलबम के नाम पर हमारे पास ऐसा कुछ नही है जिस पर गर्व किया जाय,मशहूर गायिका शारदा सिन्हा की आवाज़ मुझे तो बहुत अच्छी लगती है अगर उनका गाया "पनिया के जहाज़ से पल्टनिया बने अईहा हो" अगर खोजने पर मिला तो आपको ज़रूर सुनवाउंगा, पिछले पोस्ट में फ़िल्म "गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबों" के मधुर गीतों से आपको रूबरू कराया था आज इसी फ़ेहरिस्त में "लागी नहीं छूटे रामा" के गीत लेकर आया हूँ, मऊ (उत्तर प्रदेश) के श्री जगलाल जी ने "गंगा मईया तोहे पियरी ....के गानों को सुनकर अपनी खुशी ज़ाहिर की थी,फ़ोन पर उनसे बहुत देर तक भोजपुरी गीतों को लेकर हमारी बात हुई उनका कहना था इन गानों को किसी छोटे शहर के म्यूज़िकल स्टोर में तलाशना दुरूह कार्य है और लगे हाथ "लागी नाहीं छूटे रामा" और "बिदेसिया" के गीतों को भी सुनने की इच्छा ज़ाहिर की थी तो आज इसी फ़ेहरिस्त में "लागी नहीं छूटे रामा" के कुछ गीत लेकर आया हूँ, मज़ा लीजिये. वैसे इस फ़िल्म के बारे में कुछ और जानना चाहें तो आवाज़ पर भी पढ़ सकते हैं.


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Saturday, May 23, 2009

हे गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबो


आज भोजपुरी फिल्म का स्तर वाकई बहुत गिर गया है पर जब भोजपुरी फिल्म की शुरुआत हुई थी तब ऐसी स्थिति नहीं थी जो आज है, साठ के दशक में भोजपुरी में बनी पहली फिल्म "
"गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो"
में कम से कम सामाजिक सरोकार तो दिखता था पर ये ज़रुर है कि कुछ अच्छी भोजपूरी फ़िल्म बनने की जो शुरुआत हुई थी जैसे "लागी नाही छूटे रामा" या "बिदेसिया" जैसी फ़िल्मों के बाद फ़िल्मों का स्तर निम्न स्तर का होता चला गया,उन पुरानी फ़िल्मों के गीतों को सुनना आज भी एक सुखद एहसास दे जाता है, आज भोजपूरी फिल्म का जो हाल है किसी से छुपा नहीं है, मनोज तिवारी जब फ़िल्म के हीरो नहीं बने थे तब का उनका गाया लोकगीत "असिये से कईके बी ए लईका हमार कम्पटीशन देता" पसन्द आया था ,पर आज भी इन पुरानों गीतों में अपनी की सी महक है जो भुलाए नहीं भूलती शुरुआती दौर ही मील का पत्थर सबित होगा ये किसी ने सोचा नहीं था,

आज वो गीत मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ," हे गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबो.... ये गीत लता जी और उषा मंगेशकर की आवाज़ में है मधुर गीत शैलेन्द्र के लिखे हैं और संगीत चित्रगुप्त का है।

फ़िल्म है "गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबो" ।

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Saturday, May 9, 2009

नये ब्लॉगिये का स्वागत करें......

भाई, मेरे मित्र अखिलेश धर हैं, बहुत दिनों से सोचते सोचते आखिरकार उन्होंने अपना ब्लॉग BADFAITH के नाम से शुरु किया है,अभी उन्होंने अपनी लिखी एक कविता पोस्ट की है। उम्मीद है कि अपने ब्लॉग के माध्यम से वो ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक अपने दार्शनिक विचार ले जा पायेंगे,भाई हम तो स्वागत करे ही रहे हैं आप भी उनका उत्साह ज़रूर बढ़ाएं।

नय्यरा नूर की गाई कुछ बेहतरीन रचनाएं......



गज़ल, कव्वाली,सूफ़ी रचनाएं सब बीते दिनों की बात हो गई हो जैसे,हम जैसे लोग आज भी गज़लों को सुनते हैं, गुनगुनाते हैं, मौका मिले तो गाते हैं,पर आज की पीढ़ी को तो ये सब स्लो स्लो सा लगता है,और हम हैं कि ग़ज़लों के मायने समझते हुए बड़े तल्लीन भाव से सुनते हैं,गज़ल गायकी के पंडित जगजीत सिंह, उस्ताद ग़ुलाम अली, गुरुवर मेहदी हसन,नुसरत साहब आदि आदि ने जो बीसियों साल पहले गाकर छोड़ दिया हमारी भी दुनियां उन्हीं के आस पास सिमट कर रह गई है,नये के नाम पर फ़्यूज़न ही है जिसे हम पूरी तरह स्वीकार भी नहीं कर पाये,प्रयोग तो होते रहेंगे और हम हमेशा की तरह कचरे से मोती तलाशते रहेंगे, आज कुछ यूं हुआ कि नय्यरा नूर को सुन रहा था," ऐ ज़ज़बाए दिल गर मैं चाहूँ,हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाय" इतनी सधी और मीठी आवाज़ को बार बार सुनने को जी करता है,तो सोचा कुछ और भी रचनाएं नय्यरा जी की तलाशते है और इकट्ठा अलग अलग रचनाओं का आनन्द लिया जाय, और क़ामयाबी मिल ही गई, नय्यरा नूर की भीनी- भीनी आवाज़ आप जब सुन रहे हों तो क्या मजाल कि बीच में छोड़ कर उठ जाँय,,एक अजीब सी खनक लिये नय्यरा नूर की आवाज़ आपको भीतर तक हरियाली में डुबो देती है,तो मुलाहिज़ा फ़रमाएं, और नय्यरा नूर की छह रचनाओं का एक एक कर आनन्द लें।

नय्यरा नूर के बारे में और जानना चाहें तो यहाँ क्लिक कर सकते हैं

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Sunday, May 3, 2009

सचिन दा की आवाज़ आज भी हमारे इर्द-गिर्द गूंजती है.........


चिन देव बर्मन बेहतरीन संगीतकार तो थे ही पर उससे भी बेहतर उन्होंने अपनी आवाज़ का खूबसूरती से प्रयोग किया था,उनके गाये सभी गीत सीधे आपके दिल से तादात्म्य स्थापित कर लेते थे, दादा की आवाज़ में गज़ब की कशिश थी जिसे बीस तीस पचास साल भी आप भुला नहीं सकते ये मैं दावे के साथ कह सकता हूं ,तो कुछ रचनाएँ इधर उधर से इकट्ठा की हैं मैंने,इनमें से कुछ गीतों कों तो कभी कदास रेडियो टीवी पर सुन तो लेते हैं पर यहाँ आप पूरे सुकून से सुन सकते है। सचिन देव बर्मन के बारे में कुछ ज़्यादा जानना चाहते है तो यहाँ क्लिक करके जान सकते है।

यहाँ सचिन दा की गाई रचनाएँ हैं जो गाइड,अराधना,बन्दिनी,सुजाता,तलाश और ज़िन्दगी-ज़िन्दगी फ़िल्म से है।

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आज की पीढ़ी के अभिनेताओं को हिन्दी बारहखड़ी को समझना और याद रखना बहुत जरुरी है.|

  पिछले दिनों  नई  उम्र के बच्चों के साथ  Ambrosia theatre group की ऐक्टिंग की पाठशाला में  ये समझ में आया कि आज की पीढ़ी के साथ भाषाई तौर प...