न शास्त्रीय टप्पा.. न बेमतलब का गोल-गप्पा.. थोड़ी सामाजिक बयार.. थोड़ी संगीत की बहार.. आईये दोस्तो, है रंगमंच तैयार..
Tuesday, September 22, 2009
अजयजी की गठरी का ब्लॉग जगत में स्वागत करें !
अजयजी हमारे मित्र है उन्होंने भी गठरी नाम से अपने ब्लॉग की शुरूआत की है,आप भी उनका हौसला बढ़ाएं, उम्मीद है उनकी गठरी से ब्लॉग जगत लाभान्वित होगा।
Saturday, September 19, 2009
अतीत होते हमारे लोकगीत.....!!!
पिछली पोस्ट में त्रिनिडाड के बैठक संगीत के बारे मैने लिखा था पर ऐसा नहीं है कि ये बैठक संगीत सिर्फ़ और सिर्फ़ कैरेबियन देशों की थाती है....भाई हम भी कभी अपनी अंतरंग बैठकों में कुछ ऐसे गीतों को गाते रहे हैं कि जिस गाने से महफ़िल शुरू हुई होती वहां कुछ अलग किस्म के इम्प्रोवाईजेशन की वजह से उस पूरी रचना का एक नया ही रूप बन जाता...अब मेरे पास उसकी रिकॉर्डिंग तो नहीं है पर उस रचना में कव्वाली, गज़ल,कुछ अलग किस्म के चलताउ शेर और कुछ लोकप्रिय फ़िल्मी गीतों से बनी रचना उस पूरे बैठक में निकल कर आती थी,अफ़सोस तो इस बात का है कि उन बैठकों का कुछ भी हमारे पास मौजूद नहीं है।
अपने इस चिट्ठे पर मेरी कोशिश तो रहती है कि कुछ ऐसी चीज़ें परोसी जाँय जिसे लोगों ने कम सुना हो,जब मैने कैरेबियन चटनी पर पोस्ट लिखी थी तो अपने यहां के कैरेबियन चटनी को लेकर अलग अलग प्रतिक्रिया आई थी अनामदासजी ने लिखा था ......."इन गानों को सुनकर लगता है कि ऑर्गेनिक भारतीय संगीत, देसी संगीत सुनने के लिए अब कैरिबियन का सहारा लेना पड़ेगा, जहाँ भारतीय तरंग में बजते भारतीय साज हैं, और गायिकी में माटी की गंध है, सानू वाली बनावट नहीं है. मॉर्डन चटनी म्युज़िक में रॉक पॉप स्टाइल का संगीत सुनाई देता है, भारत में लोकसंगीत या तो बाज़ार के चक्कर के भोंडा हो चुका है या फिर उसमें भी लोकसंगीत के नाम पर ऑर्गेन और सिंथेसाइज़र, ड्रम,बॉन्गो बज रहे हैं.
तो अखिलेशजी की प्रतिक्रिया थी......."इसमें चटनी ही नहीं अचार भी है साथ ही साथ मिट्टी की हांडी में बनी दाल का सोंधा पन भी है...हां परोसने के तरीके में क्रॉकरी और स्टेन्लेस( संगीत) का बखूबी इस्तेमाल है, बेवतन लोगों में रचा बचा अस्तित्वबोध नये बिम्बों के साथ आधुनिक होता हुआ भी कहीं अतीत की यात्रा करता है। कहीं का होना या कहीं से होने के क्या मायने हैं इस संगीत से अयां हो रहा है।
पर मैं कहना चाहता हूँ कि आज भी अपने यहाँ ढूढें तो मन के तार झंकृत करने वाले लोक-गीतों भले कम हो गये हों पर आज लोग हैं कि उन्हें संजो कर रखे हुए हैं...
तो उसी कड़ी में कुछ लोकागीत लेकर आया हूँ जिसे हम दुर्लभ गीतों में शुमार कर सकते है, इन गीतों को भी किसी ने संजो के ही रखा होगा और आज मेरे पास न जाने कहां कहां से घूमता टहलता मेरे पेनड्राइव से होता हुआ आज ठुमरी तक पहुंचा है जिसे आप ज़रूर सुने और अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर दे ।
नौटंकी शैली में ज़रा इस गाने को सुनें, जिसे आप पहले भी सुन चुके है जिसे लता जी ने गाया था फ़िल्म" मुझे जीने दो" में और पीछे से नक्कारे की किड़मिड़ गिम भी सुने जो इस गाने को और मोहक बना रहा है.....इस आवाज़ से मैं तो अंजान हूँ. पर आप ही सुने और कुछ बताएं।
बिरहा पर भी क्लिक करके एक संगीत के साईट पर बहुत से लोकगीतों से रूबरू हो सकते है।
यहां बिरहा में जिनकी आवाज़ है वो मेरे लिये अनाम है अगर आप मदद कर सकें तो अच्छा होगा।
रोपनी आज रोपनी पर जो लोकगीत गाये जाते है उन पर एक नज़र ...हमारे यहां तो हर मौसम के लिये लोकगीत बने है...मॉनसून आते ही खेतों में धान की रोपनी होती है और किसान अपने खेतों में रोपनी वाले गीत गाते गाते अपना काम करते है...
और कोहबर(विवाह के समय जहाँ कई प्रकार की लौकिक रीतियाँ होती हैं) का गीत गाती महिलायें, विवाह गीत तो आपने बहुत से सुने होंगे पर कोहबर पर विशेष इस गीत को सुनें,
अपने इस चिट्ठे पर मेरी कोशिश तो रहती है कि कुछ ऐसी चीज़ें परोसी जाँय जिसे लोगों ने कम सुना हो,जब मैने कैरेबियन चटनी पर पोस्ट लिखी थी तो अपने यहां के कैरेबियन चटनी को लेकर अलग अलग प्रतिक्रिया आई थी अनामदासजी ने लिखा था ......."इन गानों को सुनकर लगता है कि ऑर्गेनिक भारतीय संगीत, देसी संगीत सुनने के लिए अब कैरिबियन का सहारा लेना पड़ेगा, जहाँ भारतीय तरंग में बजते भारतीय साज हैं, और गायिकी में माटी की गंध है, सानू वाली बनावट नहीं है. मॉर्डन चटनी म्युज़िक में रॉक पॉप स्टाइल का संगीत सुनाई देता है, भारत में लोकसंगीत या तो बाज़ार के चक्कर के भोंडा हो चुका है या फिर उसमें भी लोकसंगीत के नाम पर ऑर्गेन और सिंथेसाइज़र, ड्रम,बॉन्गो बज रहे हैं.
तो अखिलेशजी की प्रतिक्रिया थी......."इसमें चटनी ही नहीं अचार भी है साथ ही साथ मिट्टी की हांडी में बनी दाल का सोंधा पन भी है...हां परोसने के तरीके में क्रॉकरी और स्टेन्लेस( संगीत) का बखूबी इस्तेमाल है, बेवतन लोगों में रचा बचा अस्तित्वबोध नये बिम्बों के साथ आधुनिक होता हुआ भी कहीं अतीत की यात्रा करता है। कहीं का होना या कहीं से होने के क्या मायने हैं इस संगीत से अयां हो रहा है।
पर मैं कहना चाहता हूँ कि आज भी अपने यहाँ ढूढें तो मन के तार झंकृत करने वाले लोक-गीतों भले कम हो गये हों पर आज लोग हैं कि उन्हें संजो कर रखे हुए हैं...
तो उसी कड़ी में कुछ लोकागीत लेकर आया हूँ जिसे हम दुर्लभ गीतों में शुमार कर सकते है, इन गीतों को भी किसी ने संजो के ही रखा होगा और आज मेरे पास न जाने कहां कहां से घूमता टहलता मेरे पेनड्राइव से होता हुआ आज ठुमरी तक पहुंचा है जिसे आप ज़रूर सुने और अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर दे ।
नौटंकी शैली में ज़रा इस गाने को सुनें, जिसे आप पहले भी सुन चुके है जिसे लता जी ने गाया था फ़िल्म" मुझे जीने दो" में और पीछे से नक्कारे की किड़मिड़ गिम भी सुने जो इस गाने को और मोहक बना रहा है.....इस आवाज़ से मैं तो अंजान हूँ. पर आप ही सुने और कुछ बताएं।
बिरहा पर भी क्लिक करके एक संगीत के साईट पर बहुत से लोकगीतों से रूबरू हो सकते है।
यहां बिरहा में जिनकी आवाज़ है वो मेरे लिये अनाम है अगर आप मदद कर सकें तो अच्छा होगा।
रोपनी आज रोपनी पर जो लोकगीत गाये जाते है उन पर एक नज़र ...हमारे यहां तो हर मौसम के लिये लोकगीत बने है...मॉनसून आते ही खेतों में धान की रोपनी होती है और किसान अपने खेतों में रोपनी वाले गीत गाते गाते अपना काम करते है...
और कोहबर(विवाह के समय जहाँ कई प्रकार की लौकिक रीतियाँ होती हैं) का गीत गाती महिलायें, विवाह गीत तो आपने बहुत से सुने होंगे पर कोहबर पर विशेष इस गीत को सुनें,
Saturday, August 22, 2009
त्रिनिडाड का बैठक संगीत सुनना हो तो इधर आईये.......
बहुत दिनों से सिर्फ़ चिंतन के अलावा कुछ हो नहीं रहा, पिछले दिनों अपने समाज में सच का सामना से लेकर बरसात,सूखा, मंहगाई, स्वाइन फ़्लू, और जिन्ना का जिन्न सब एक एक करके दिमाग खराब कर रहे थे, ऐसा भी नहीं कि कुछ ढ्ट टेणन टाईप ही सही कुछ अपनी ज़िन्दगी ही चल नहीं रहा था, भाई सब चल रहा है पर खरामा खरामा, बस एक बार से दिमाग भन्ना रहा है लाईफ़लॉगर की वजह से, जानते इस कमीने साइट की वजह से न जाने कितने संगीत प्रेमी मुझे गरिया के चले जाते हैं अब आप पूछेंगे क्यौं ? तो बता दूँ पिछले दो साल से ब्लॉग नाम की चिड़िया से अपना जुड़ाव हुआ है, कुल मिला के गीत संगीत के अपने मोर्चे पर थोड़ा अमृत बाँटने का काम चल रहा था.
ज़्यादातर रचनाएं जो आप सुन रहे थे वो लाईफ़लॉगर के प्लेयर के बदौलत सुन पा रहे थे,काफ़ी लम्बे समय से इन लाईफ़लॉगर वालों ने अपना तार खिंच कर हमसे अलग कर दिया है अब मुश्किल ये है कि जितनी भी पुरानी पोस्ट थी उसपर आप सिर्फ़ पढ़ सकते हैं, सुन नहीं सकते, मतलब ये कि जितने भी लाईफ़लॉगर के प्लेयर पर जो गीत संगीत चढ़ाया था उसने काम करना बन्द कर दिया है यानि पिछली सारी मेहनत तेल ?
खैर कहीं कहीं अलग अलग प्लेयर पर भी थोड़ा बहुत चढ़ाया था वो सुरक्षित है, पर अपने सागर भाई और यूनुस भाई,इरफ़ान भाई,मनीष जी और उन सभी साथियों से जो तक्नालॉजी को बता सकते हैं तो उनसे हाथ जोड़ अपनी यही इल्तिज़ा है कि वो कम कम से कम ये तो बताएं कि कौन सा प्लेयर उचित और आसान है कि उससे कम से कम ठुमरी पर लोग आकर मायूस ना हों, भाई लोग ज़रा इस बारे में गौर करियेगा।
पिछले दिनों अपने भाई बन्धू जो हमारे देश से बहुत दूर त्रिनीडाड, सुरीनाम आदि देशों में सैकड़ों सालों से रहकर कुछ अपना सा सुर आजतक बनाए हुए है उनकों आज सुनवाने का जी कर रहा है अपना तो अच्छा बुरा हम सुनते ही रहते हैं पर इसे भी सुना जाय त्रिनिडाड की कोकिला......रसिका डिन्डियाल की आवाज़ में इस रचना को सुनिये और बताईये कि आज भी इस संसार को उन्होंने कैसे पानी और खाद से सींचा है कि आज भी उनका गाया हमें मस्त करता है ............भाई ज़रा नया ऑडियो प्लेयर कैसे बनाएं जाय जो आसान भी हो अभी तो हमारी यही सबसे बड़ी समस्या है कोई सुलझायेगा?
चलिये अब कुछ बैठक गान का और चटनी का आनन्द लीजिये ।
और भी है अपने पिटारे में ज़रा इन्हें भी तवज्जो दें। रामदेव चैतू की आवाज़ में ज़रा इस लोकप्रिय धुन को तो सुनिये....
और राकेश यनकरन की ये मिक्स चटनी का स्वाद तो ले ही लीजिये....
चलिये अब कुछ बैठक गान का और चटनी का आनन्द लीजिये ।
और भी है अपने पिटारे में ज़रा इन्हें भी तवज्जो दें। रामदेव चैतू की आवाज़ में ज़रा इस लोकप्रिय धुन को तो सुनिये....
और राकेश यनकरन की ये मिक्स चटनी का स्वाद तो ले ही लीजिये....
Wednesday, July 29, 2009
सच का सामना करने से क्या लोग डरने लगे हैं.....
पिछले दिनों "सच का सामना" को लेकर बहुत माहौल गरम है और गरम इस कदर है कि संसद को भी इसपर ध्यान देना पड़ा, अभी तक जितना मैने इस बारे में पढ़ा है सबने एकांगी पहलू पर ही ज़्यादा बात की गई है पर बैड्फ़ेथ पर जो विचार मैने पढ़े मुझे ऐसा लगता है कि इस लेख को पढ़ना ज़रूरी है और इसलिये भी पढ़ना ज़रूरी है कि ये व्यक्तिगत ही नहीं बल्कि समग्रता में सामाजिक सच्चाई का भी सामना कराता है।
Sunday, July 19, 2009
याद पिया की आये..........वडाली बंधुओं की यादगार महफ़िल से कुछ मोती....
उस्ताद पूरन चन्द और प्यारे लाल वडाली बन्धुओं को बहुत तो सुना नहीं पर इन बन्धुओं का गायन वाकई अद्भुत है,काफ़ी समय हो गया "टाइम्स म्युज़िक" ने एक एल्बम रिलीज़ किया था "याद पिया की" उसमें बहुत सी रचना पंजाबी में थी, पंजाबी मैं थोड़ा बहुत समझ पाता हूँ,जैसे गायक के लिये गाने के साथ अगर ये पता हो कि वो क्या गा रहा है तब उस रचना की गुणवत्ता बढ़ जाती है वैसे ही सुनने वाला भी रचना को पूरी तरह से समझ रहा हो तो किसी भी रचना को सुनने का मज़ा ही कुछ और हो जाता है ।

पश्चिम गायकों के बहुत से कंसर्ट में मैने श्रोताओं को रोते हुए चीखते हुए उछलते कूदते देखा है पर हमारे यहां का समाज संगीत के मामले में थोड़ा अलग है शान्त शान्त से श्रोता थोड़ा झूमते हुए वाह वाह की मुद्रा में बैठे रहते है,और जहां आवश्यक्ता होती है वहां दाद देना भूलते नहीं,याद है जगजीत सिंह साहब का एक अलबम आया था.....जिसमें उन्होंने कुछ चुटकुले भी सुनाए थे और श्रोताओं की दाद का स्केल भी बहुत ऊपर था श्रोताओं के शोर में एक आवाज़ आयी "आहिस्ता आहिस्ता" और फिर जगजीत साहब ने "सरकती जाय है रूख से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता" सुनाया था, जगजीत चित्रा का वो वाला एलबम ज़बरदस्त था उसी एलबम में हमने पहले पहल सुना था "दुनियाँ जिसे कहते है जादू का खिलौना है मिल जाय तो मिट्टी है खो जाय तो सोना है" आज बडाली बन्धुओं के स्वर में इस मोहक रचना को सुनकर वैसा ही आनन्द मिल रहा है।
कहते हैं पुराने और नये के बीच संघर्ष हमेशा से चलता आया है पुराना नये से कुछ सीख नहीं ले पाता तो धीरे धीरे पुराना हो ही जाता है,एक रचनाकार समय के साथ चलते हुए अपने आपको संवारता रहता है , धुन, वाद्य यंत्र सबमें तब्दीली लाता है तो वो रचनाकार समय के साथ थोड़ा ज़्यादा समय तक टिक के खड़ा हो पाता है ,नुसरत साहब इस बात को जानते थे इसीलिये विदेशियों के साथ उन्होंने बहुत से सफ़ल प्रयोग भी किये थे और शायद वडाली बन्धुओं ने भी इस बात को भांप लिया है और इस एलबम में वो तब्दीली साफ़ दीखती है , ज़रा आप भी देखिये खुली आवाज़ का जादू आपको झूमने पर मजबूर कर देगा।
वडाली बन्धुओं की ये रचना भी ज़रूर सुनें जो पहले से एकदम अलहदा है।
याद पिया की आये ये दु:ख सहा न जाय इस रचना को बहुत से गायकों की आवाज़ में मैने सुना है पर उस्ताद मुबारक अली खान साहब की गायकी को सुनकर आज मैने इसे भी आपके सुनिये लिये चुना है तो इन्हें भी सुनिये और बताईये कैसा लगा?

पश्चिम गायकों के बहुत से कंसर्ट में मैने श्रोताओं को रोते हुए चीखते हुए उछलते कूदते देखा है पर हमारे यहां का समाज संगीत के मामले में थोड़ा अलग है शान्त शान्त से श्रोता थोड़ा झूमते हुए वाह वाह की मुद्रा में बैठे रहते है,और जहां आवश्यक्ता होती है वहां दाद देना भूलते नहीं,याद है जगजीत सिंह साहब का एक अलबम आया था.....जिसमें उन्होंने कुछ चुटकुले भी सुनाए थे और श्रोताओं की दाद का स्केल भी बहुत ऊपर था श्रोताओं के शोर में एक आवाज़ आयी "आहिस्ता आहिस्ता" और फिर जगजीत साहब ने "सरकती जाय है रूख से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता" सुनाया था, जगजीत चित्रा का वो वाला एलबम ज़बरदस्त था उसी एलबम में हमने पहले पहल सुना था "दुनियाँ जिसे कहते है जादू का खिलौना है मिल जाय तो मिट्टी है खो जाय तो सोना है" आज बडाली बन्धुओं के स्वर में इस मोहक रचना को सुनकर वैसा ही आनन्द मिल रहा है।
कहते हैं पुराने और नये के बीच संघर्ष हमेशा से चलता आया है पुराना नये से कुछ सीख नहीं ले पाता तो धीरे धीरे पुराना हो ही जाता है,एक रचनाकार समय के साथ चलते हुए अपने आपको संवारता रहता है , धुन, वाद्य यंत्र सबमें तब्दीली लाता है तो वो रचनाकार समय के साथ थोड़ा ज़्यादा समय तक टिक के खड़ा हो पाता है ,नुसरत साहब इस बात को जानते थे इसीलिये विदेशियों के साथ उन्होंने बहुत से सफ़ल प्रयोग भी किये थे और शायद वडाली बन्धुओं ने भी इस बात को भांप लिया है और इस एलबम में वो तब्दीली साफ़ दीखती है , ज़रा आप भी देखिये खुली आवाज़ का जादू आपको झूमने पर मजबूर कर देगा।
वडाली बन्धुओं की ये रचना भी ज़रूर सुनें जो पहले से एकदम अलहदा है।
याद पिया की आये ये दु:ख सहा न जाय इस रचना को बहुत से गायकों की आवाज़ में मैने सुना है पर उस्ताद मुबारक अली खान साहब की गायकी को सुनकर आज मैने इसे भी आपके सुनिये लिये चुना है तो इन्हें भी सुनिये और बताईये कैसा लगा?
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Saturday, July 11, 2009
एक कजरी पं.छन्नूलाल मिश्र जी की आवाज़ में ....
लोग ना जाने किन किन बहसों में लगे हैं, कभी इन बहसों का अन्त होने वाला भी नहीं है ,तो घड़ी भर जहां मन को सुकून मिले ऐसी विषम स्थितियों में कुछ अच्छा गीत संगीत सुनने से मन के अन्दर जो उर्जा मानव मन को मिलती है उसका कोई जोड़ नहीं है। रिमझिम बरसात की फुहार से अभी अभी रूबरू होकर घर में घुसा हूँ, दिन भर ऑफ़िस की गहमा गहमी,कहीं गुजरात में लोग मर रहे है,तो कहीं कोई आत्महत्या कर रहा है,कहीं लोग समलैंगिस्तान बनाने पर आमादा हैं तो बहुत से लोग इसके बरखिलाफ़ हैं।

फोटो गुगुल के सौजन्य से
कहीं मन की बेचैनी है जो खत्म होने का नाम नहीं लेती,बहुत दिनों से कुछ ठुमरी पर चढ़ाया ही नहीं था और ऐसा भी नहीं कि लोग ठुमरी पर कुछ ताज़ा सुनने के लिये बेकरार हों, इधर लाईफ़लॉगर की वजह से पुरानी पोस्ट जो लाईफ़ लॉगर के प्लेयर पर चढ़ाया था उसकी बत्ती लाईफ़लॉगर वालों ने गुल कर दी है ये बात अभी मुझे बहुत परेशान कर रहीं है,काफ़ी सारी मेहनत अब लाईफ़लॉगर की वजह से कुर्बान हो गई मुझे इसका मलाल तो हमेशा रहेगा।
चलिये इस रिमझिम भरे मौसम में कुछ हो जाय, पता है यहां मुम्बई में मौसम के बदलते देर नहीं लगती, कहते हैं मौसमी फल खाना शरीर के लिये लाभप्रद होता है,वैसे "मौसमी रचना भी अगर दिल से सुनी जाय तो मन में सकारात्मक विचार पैदा होता है" ये बात किसी ने कहा है या नहीं पर आज मैं कह दे रहा हूँ, तो अब बहुत ज़्यादा भांजने के बजाय मुद्दे पर आते हैं और पं. छ्न्नूलाल मिश्र जी की मखमली आवाज़ का लुत्फ़ लेते हुए एक कजरी सुनते है। यहां भी क्लिक करके पंडित छन्नूलाल जी की गायकी का लुत्फ़ लिया जा सकता है

फोटो गुगुल के सौजन्य से
कहीं मन की बेचैनी है जो खत्म होने का नाम नहीं लेती,बहुत दिनों से कुछ ठुमरी पर चढ़ाया ही नहीं था और ऐसा भी नहीं कि लोग ठुमरी पर कुछ ताज़ा सुनने के लिये बेकरार हों, इधर लाईफ़लॉगर की वजह से पुरानी पोस्ट जो लाईफ़ लॉगर के प्लेयर पर चढ़ाया था उसकी बत्ती लाईफ़लॉगर वालों ने गुल कर दी है ये बात अभी मुझे बहुत परेशान कर रहीं है,काफ़ी सारी मेहनत अब लाईफ़लॉगर की वजह से कुर्बान हो गई मुझे इसका मलाल तो हमेशा रहेगा।
चलिये इस रिमझिम भरे मौसम में कुछ हो जाय, पता है यहां मुम्बई में मौसम के बदलते देर नहीं लगती, कहते हैं मौसमी फल खाना शरीर के लिये लाभप्रद होता है,वैसे "मौसमी रचना भी अगर दिल से सुनी जाय तो मन में सकारात्मक विचार पैदा होता है" ये बात किसी ने कहा है या नहीं पर आज मैं कह दे रहा हूँ, तो अब बहुत ज़्यादा भांजने के बजाय मुद्दे पर आते हैं और पं. छ्न्नूलाल मिश्र जी की मखमली आवाज़ का लुत्फ़ लेते हुए एक कजरी सुनते है। यहां भी क्लिक करके पंडित छन्नूलाल जी की गायकी का लुत्फ़ लिया जा सकता है
Sunday, June 28, 2009
पंचम दा को याद करते हुए......
आज अगर हमारे बीच पंचम दा होते तो सत्तर बरस के होते,कल ही तो उनके जन्म दिन पर हम उन्हें याद कर रहे थे,सचिन दा के बेटे तो थे पर उनकी पहचान पर कभी सचिन दा का साया नहीं पड़ा,यही तो उनकी खासियत थी, "सुबह" नाम का एक सीरियल आया करता था दूरदर्शन पर उसका शीर्षक गीत पंचम दा ने गाया था,नेट पर तलाशते तलाशते मिल गया,इस अलग सी आवाज़ को सुनिये और उन दिनों को याद कीजिये.
पंचम दा ने कुछ फ़िल्मों की थीम म्युज़िक भी बनाई थी, आज पंचम दा को याद करने लिये उनकी बनाई कुछ यादगार थीम म्युज़िक का आनन्द लेते है जैसे इसे सुनिये जो फ़िल्म शोले से है..
और नीचे वाले प्लेयर में अलग अलग फ़िल्मों का थीम म्युज़िक मिक्स है जिसे आप ज्यों ज्यों सुनियेगा त्यों त्यों फ़िल्म का नाम भी याद आ आता जायेगा..................... है ना यादगार?
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पंचम दा ने कुछ फ़िल्मों की थीम म्युज़िक भी बनाई थी, आज पंचम दा को याद करने लिये उनकी बनाई कुछ यादगार थीम म्युज़िक का आनन्द लेते है जैसे इसे सुनिये जो फ़िल्म शोले से है..
और नीचे वाले प्लेयर में अलग अलग फ़िल्मों का थीम म्युज़िक मिक्स है जिसे आप ज्यों ज्यों सुनियेगा त्यों त्यों फ़िल्म का नाम भी याद आ आता जायेगा..................... है ना यादगार?
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