Saturday, September 29, 2007

सपनों की रानी का सच !!!

मै फ़िल्म आराधना की शूटिंग से जुड़ा एक मज़ेदार किस्सा आपको सुनाता हूं वाकई आपको बड़ा मज़ा आएगा.. तो हुआ कुछ ऐसा कि आराधना फ़िल्म के इस लोकप्रिय गाने मेरे सपनो की रानी की शूटिग दार्जिलिंग में होना तय हो रहा था तभी इस फ़िल्म के निर्देशक शक्ति सामन्त ने ये तय कर लिया था कि इसकी शूटिंग में हिरोइन शर्मिला टैगोर को तो वो कतई नहीं ले जाएंगे क्योकि एक तो शर्मिला को ले जाने का मतलब था कि उनकी मां को भी ले जाना और शर्मिला के नखरे अलग झेलना और... गवारा नहीं था शक्तिदा को .तो उन्होने तय ये किया कि सिर्फ़ राजेश खन्ना और सुजीत कुमार को दार्जिलिंग ले जाकर शूट करेंगे और बाकी की शर्मिला वाली शूटिंग मुम्बई में ही करेंगे.. और यही किया इसमें शर्मिला वाला हिस्सा आखिरकार दार्जिलिंग में शूट नही किया और सिर्फ़ राजेश खन्ना और सुजीत कुमार के ही सीन फ़िल्माए गये.. तो शक्ति सामन्त ने हिरोइन को दार्जिलिंग ना जाकर अपनी फ़िल्म का पैस बचाया समय भी खूब बचाया और जहां तक इस फ़िल्म का सवाल है तो अपने समय की ये हिट फ़िल्म तो थी ही और उससे भी ज़्यादा इस फ़िल्म के गाने गज़ब हिट हुए थे आज भी सुनते है तो मन खिल उठता है. तो इस गीत को देखिये और मज़ा लीजिये!!

Sunday, September 23, 2007

बीते दिनो की बात और हलका हलका सुरुर नुसरत जी की कव्वाली !!!


आजकल क्रिकेट का सुरूर चल रहा है पर ये एक हवा की तरह आया है और उसी तरह चला जाएगा, पर ब्लॉग का सुरुर तो कमाल है, इन दिनो ब्लॉग का सुरूर है जो सर चढ़कर बोल रहा है, हर बार कुछ नया करने की चाहत से मन तो लबरेज़ रहता है ., क्या करें जब कुछ सोचता हूं ,तो लगता है कि मेरे लिखे अनुभव पर किसी को पड़ी ही क्या है, पर बार बार रोकने के बाद भी बीते कल की सुहानी यादें हमेशा घुमड़ कर पीछा करती रहती है,

जब इलाहाबाद या दिल्ली में था तो वहां महफ़िल अपने आप ही जम जाती थी ... साथ में संगीत के मुरीद लोग तो साथ थे ही.. वो चाहे अज़दकजी हो, चाहे हिन्दुस्तानी डायरी वाले अनिल सिह हो तो क्या निर्मल आनन्द वाले अभय तिवारी हों, या टूटी हुई बिखरी हुई वाले इरफ़ान हो या पहलू वाले चन्दू हो...या पंकज श्रीवास्तव हो साथियो के साथ अपनी मंडली दस्ताऔर जन संस्कृति मंच के साथ अनगिनत नाटको और गीतों के प्रदर्शन घूम घूम कर पूरे देश में करना, याद आता है.

दिल्ली की मंडली इससे अलग थी.. वहां भी हारमोनियम तबले से रात भर क्या धमा चौकड़ी मची रहती थी.. कितना मज़ा आता था... एक बार तो दिल्ली मे गज़ब हो गया, हमलोग तो वहां मंडी हाउस में एक्ट वन के लिये नाटक किया करते थे.हम नाटक करते करते कब गायन मंडली में तब्दील हो गये पता ही नही चला.. और बाद में कब हम कैसे सड़को पर उतर आये और देखते देखते हमने सिर्फ़ कोरस गीत तैयार किये और उसके देश भर में खूब सारे प्रदर्शन किये जो मैं तो कभी भूल ही नही सकता .

तब भाई पीयूष मिश्र, आशीष विद्यार्थी, मनोज बाजपेई, निर्मल पांडे, गजराज राव, भाई निखिल वर्मा, अनीश, अनुभव सिन्हा, गुड्डा, विजय बाबू ,अरविन्द बब्बल और हमारे निर्देशक एन के शर्मा,पत्रकार राजेश जोशी, पत्रकार अरूण पान्डे और भी बहुत से नाम थे .दिन भर तो हम साथ ही साथ रहते थे और रात में हारमोनियम के साथ जब बैठते थे तो समझ नही आता था कि इतनी जल्दी रात खत्म कैसे हो जाती थी पर अब ब्लॉग रूपी नई बयार ने हमें चारों तरफ़ से घेर लिया है अगर कहें तो बहुत अकेला भी कर दिया है कि ऑफ़िस करने बाद घर से निकलना भी तो नही चाहते..पर ये जो ब्लॉग की दुनिया जो है उसने भी बहुत सारे अजनबी मित्रों से मिलावाया है और धीरे धीरे ये अजनबियत भी गुम होती जा रही है.... हम मित्र बनने की ओर अग्रसर है...

इसी से आज आपके सामने नुसरत साहब कि कव्वाली पेश कर रहा हूं और जो भी ऊपर मैने लिखा वो चाहे आपको बुरा लगे या भला झेलिये और मुझे अपने नॉस्टेल्जिया में खो जाने दीजिये...तो आज की ये कव्वाली अपने दोस्तो को नज़र करता हूं तो गौर फ़रमाइयेगा... ये जो हल्का हल्का सुरूर है सुनिये और मज़ा लीजिये इस बेहतरीन कव्वाली का, तो पेश है !!!!


इस कव्वाली को सुनने के बाद अपनी प्रतिक्रिया अगर देना हो तो अवश्य दें !!!! इस कव्वाली के सुरूर को ब्लॉग से जोड़कर सुनियेगा तो शायद और मज़ा आये !!!!

आसमा से उतारा गया ज़िन्दगी देके मारा गया..... मुन्नी बेगम की कुछ गज़लें!!


आज आपके लिये एक पुरानी अवाज़ लेकर आया हूं. अब हमारे साथी कहने लगेंगे कि क्या भाई कब तक पुरानी यादों में खोये रहेंगे? पर क्या करें मन है कि मानता ही नही, जब से ब्लॉग से जुड़ा हूं तबसे हाल ये है कि हर बार किसी ना किसी के ब्लॉग पर कुछ देख कर कहना पड़ता है कि आपने तो पुरानी याद ताज़ा कर दी..

तो अब मैने भी सोचा कि जो भी हो अपने पास पुरानी यादों का पिटारा जब तक समाप्त नही हो जाता तब तक कुछ तो उन सारी चीज़ों को अपने साथ लेकर चलना ही है क्योकि वो पुरानी यादे तो हमेशा अपने साथ रहेंगी ही. तो आज एक ऐसी ही कुछ फ़ड़कती हुई गज़ल सुनावाई जाय अब आप कहेंगे ये फ़ड़कती हुई का क्या मतलब हुआ भाई?

तो आज मैं बात कर रहा हूं मुन्नी बेगम की. मुन्नी बेगम ने जो भी गाया उस समय की लोकप्रिय शायरी हमेशा उनके साथ रही. एकदम महफ़िली आवाज़,और उनकी गज़लें सुनकर वाकई बार बार कहने को मन करता है जानते हैं क्या? वाह वाह मेरे पास इतना समय नही है कि मैं उन गानो को लिखूं यूनुस भाई अभी बोल उठेंगे कि ये गज़ल अच्छी तो थी पर आप नीचे लिख देते तो आपका क्या जाता, तो अब बिना हील हुज्जत के सुनिये मुन्नी बेगम की ये मस्त गज़ल. इस गज़ल को लिखने वाले हैं इकबाल सफ़िपुरी. गज़ल है आसमं से उतारा गया...



और ये भी गज़ल सुनें और आनन्द लें और वाह वाह करें. गज़ल है लज़्ज़ते गम बढ़ा दीजिये....



मुन्नी बेगम की खासियत भी यही रही है कि हमेशा चलती गज़लों को उन्होने आवाज़ दी है तो इस गज़ल मे भी वो बात है सुनिये: और बताइये मज़ा आया की नहीं . गज़ल है कब मेरा नशेमन एहले चमन..

Thursday, September 20, 2007

एक फ़्युज़न ये भी, पुराना तो है पर तासीर गज़ब की है


कुछ दिनों पहले अजित भाई और भाई अनिल जी ने नया कुछ डालने को कहा था तो इस पर मैं इतना ही कहुंगा कि संगीत मे प्रयोग हमेशा मुझे अच्छे लगते रहे हैं, बहुत पहले आनन्द शंकर की रचनाएं सुनने में मज़ा आता था,पर धीरे धीरे वो मज़ा जाता रहा और अब उसकी जगह नॉस्टेल्जिया ने ले लिया है, अब सुनता हूं तो पुराना कुछ कुछ याद आता रहता है बस । पर कुछ संगीत रचनाएं ऐसी भी होती है जो धीरे धीरे पूरे वातावरण को और मोहक बना देते हैं तो अब ज़्यादा लिखना मुनासिब भी नही है, क्योकि सुनने के बाद ही कुछ बात की जाय तो अच्छा रहेगा, तो मन्द मन्द संगीत का आनन्द लें हां यहां ये बताना उचित होगा कि ये रचना पुरानी ज़रूर है पर एक समय गज़ब का जलवा था,पूरब और पश्चिंमी संगीत का मिलन का एक साथ मिलन तो देखिय्रे... मज़ा लीजिए.. सुनने के लिये दो तीर के बीच में दो चट्का लगाएं इस रचना में थोड़ी समस्या है.. खेद है आप ठीक से सुन नही पा रहे।

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Wednesday, September 19, 2007

टिप्पणियां जीवन रक्षक दवाएं हैं !!


अब क्या बताया जाय, मुम्बई का ब्लॉगर मीट उधर खत्म हुआ और जब निर्मल आनन्द की रपट आई तो सारे ब्लॉगर पिल पड़े टिपियाने...और बीस पच्चीस टिप्पणी के बाद साथियो की स्याही खत्म हो गई इसीलिये शायद और ज़्यादा टिप्पणी नहीं आ सकी और क्या समझा जा सकता है . और पिछले कुछ समय से ये बात भी नोट की गई है कि पूरे ब्लॉगिया समाज की चिन्ता सिर्फ़ दो विषयो पर ही ज़्यादा केन्द्रित रही है , किसी भी तरह की साम्प्रदायिकता और दूसरी ब्लॉगर मीट, लगता है सारे लोग इन्ही विषयों का इन्तज़ार कर रहे होते हैं और तब आप टिप्पणी देखेंगे तो लगेगा वाकई सबको इन सब की कितनी सामाजिक चिन्ता रहती है .. पर इसके अलावा कोई ऐसा विषय जिसने खूब टिप्पणिया बटोरी हों मुझे याद नही आती, एक तरफ़ पूरा माहौल बना हुआ है कि एक हज़ार से ज़्यादा चिट्ठे की संख्या पार हो चुकी है और ना जाने क्या क्या पर ज़रा अपने ब्लॉगिया समाज के बेहतरीन चिट्ठे पर जाइये तो लगेगा कि यहां लिखने वाले अधिक है पढने वाले कम और ये भी सम्भव है कि इतने सारे ब्लॉग पर जाकर टिप्पणी करना आसान भी नहीं है फिर भी देखा तो यही जा रहा है कि अलग अलग बिरादरी बनती जा र्है जो एक दूसरे की तारीफ़ के पुल बांधने में ही लगे रहते हैं .. और बहुसंख्य चिट्ठेकार दूसरों के ब्लॉग पर जाते ही नहीं.. तो टिप्पणी कहां से करेंगे. और जहां तक मुझे लगता है टिप्पणिया किसी भी ब्लॉग के लिये जीवन रक्षक दवाओं की तरह हैं.. इस बात से भी इंकार नही किया जा सकता कि कुछ अच्छे चिट्ठे भी है जो अपनी पहचान भी बनाने में कामयाब भी हो रहे हैं पर इन सब के बावजूद लोग चिट्ठो की बढती संख्या पर खुशी भी ज़ाहिर की जाती है पर आप किसी भी एग्रीगेटर पर जाकर देख सकते हैं तो सक्रीय चिटठों की संख्या डेढ सौ से ज़्यादा लगती नही .. तो ऐसी सूरत में आप चिट्ठेकार साथियों से लोगों से निवेदन है कि नये ब्लॉग पर जाकर कुछ अच्छे सुझाव ही दिया करें.. तो शायद कुछ चिट्ठों की उम्र बढ जाय.. हां यहां मै एक बात और कह ही दूं, कि ये सारी बाते कह कर मै ये तो एकदम साबित नही करना चाहता कि मै पाक साफ़ हूं...मैने भी इन चिट्ठों के उपवन मे से कुछ फ़ूल चुन लिये है, उन्ही को पूरा पढ़ना मेरे लिये दुरूह होता है... पता नही क्या मै सवाल से भटक गया क्या? मेरी बात आपके समझ में आ रही हो तो कुछ आप भी रास्ता दिखाएं...

Monday, September 10, 2007

इक बरहमन ने कहा है...ये साल अच्छा है...


शुरू शुरू में जगजीत चित्रा का अलबम "माइलस्टोन".. अनफ़ॉर्गेटेबल, और उसके बाद आया उनका लाइव कंसर्ट.." जिसमें उन्होने सरकती जाय है रूख से नाक़ाब.. गाया था और उस अल्बम में दर्शकों की वाह वाह भी कुछ ज़्यादा ही सुनाई पड़ रही थी..उसके बाद तो हर तरफ़ जगजीत सिंह ही सुने जाने लगे, अपनी आवाज़ के जादू से जगजीत सिह ने हमारे दिलों में ऐसी जगह बना ली कि पूछिए मत । कमाल की आवाज़, ऐसी आवाज़ जिसे एक बार सुन लें तो बार- बार सुनने का मन करेगा............

लेकिन उनकी गाई कुछ गज़लें आज भी सुनते है तो तरावट सी पर जाती है, और आज ही आज तलाशते तलाशते कुछ चीज़ें मिली है, आप भी लुत्फ़ उठाइये, तो सबसे पहले राजनीति पर व्यंग करती इस रचना को सुनिये....इक बराहमन ने कहा है ...

फिर इस नज़्म को सुने ऐसी बहुत सी रचनाएं जगजीतजी ने गाईं हैं जो मस्त लगतीं हैं.....बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी...

और ये ज़रूर सुनिये ..ये दौलत भी ले लो.. इसे तो हम दोस्तो की महफ़िल में बार बार सुनते हैं और आह आह कहते हैं.

Friday, September 7, 2007

उस्ताद मेहदी हसन साहब को सुनते हुए!!!!


मेहदी हसन साहब का ज़िक्र आते ही ना जाने कितनी ग़ज़लों के टुकडे़ मेरे ज़ेहन में गुनगुनाते लगते हैं, ना जाने क्या याद आने लगते हैं .पर अब काफ़ी दिनों से मेंहदी साहब गा नही रहे.. कहते है लकवा मार गया उन्हें. पर यहां तो हम अपाहिज़ हुए जा रहे है उन्हें सुने बगैर.....अब जब उन्होने गाना छोड़ दिया है.. पर हमारी यादों में तो वो हमेशा बने रहेंगे... .अरे अब उनकी क्या बात करें, अब तो अच्छी गज़ल और अच्छी आवाज़ सुनने को मन तरसता ही रहता है क्योकि एक समय था जब पूरे बाज़ार पर इन्हीं लोगो का ज़ोर था पर अब धीरे धीरे समय के साथ साथ बहुत कुछ बदल गया है पर आज भी उन्हें सुनने वालों की कमी नही है, .

मेहदी साहब ने हर किस्म की ग़ज़लें गाईं हैं जिन्हें सुनकर हम हमेशा मुत्तासिर होते रहेंगे.. ...यहां मेंहदी साहब की चन्द ग़ज़लें पेश हैं ....तो पहली गज़ल मुलाहेज़ा फ़रमाएं.. बोल हैं: देख तो दिल की जां से उठता है..



मेंहदी साहब का अंदाज़ तो देखिये...




मोहब्बत करने वाले कम ना होंगे.. इसका तो जवाब नहीं





जीत के पल और राहुल द्रविड

पिछले एक दिनी मैच में सचिन और सौरव के अलावा जिसके खेल ने प्रभावित किया वो थे रोबिन उथप्पा ऐसा खेल देखने को मिला था जिसमें सांस थम सी गई थी..अन्त तक नही पता चल पा रहा था कि दोनो टीमों में से आखिर जीत किसकी होगी..पर इन सब के बावजूद कप्तान राहुल द्रविड़ ज़्यादा प्रभावित भी नही कर पाये. शायद इसीलिये हमारे मित्र अजय कुमार का ये चुट्कुला आजकल बाज़ार में ज़्यादा सुना जा रहा है आप भी सुनिये ....एक क्रिकेट प्रशंसक राहुल द्रविड़ से मिला और उनकी जीत पर बधाई देने लगा कहने लगा कि मुबारक हो सर क्या खेलते है आप, आपकी टीम भी बहुत अच्छा खेलती है.. सर आप तो टीम के मुखिया हो..आप एक काम क्यों नही करते...एक अच्छा कप्तान भी रख ही लेते..... खैर रोबिन उथप्पा के धैर्य को अगर देखना है तो इस लिंक को ज़रूर देखें...कुछ मैच ऐसे होते है जो लम्बे समय तक आप याद रखते है इस मैच को भी उसी तरह याद किया जायेगा.. देखिये आखिरी २ ओवर...

Tuesday, September 4, 2007

क्या बता सकते है ये आवाज़ है किसकी ?

बहुत दिनों से इस रचना को मैं सुन रहा हूं पर इस मीठी आवाज़ के मालिक को अभी तक जान नहीं पाया हूं क्या आप मेरी मदद कर सकते हैं ? इनकी रचना है जो कबीर पर आधारित है जो मन को भा रही है . आप भी सुनिये.. और मज़ा लीजिये और हमारी मुश्किल को दूर कीजिये , आखिर ये रचना किस अलबम से है..ज़रूर बताइयेगा तो पेश ए खि़दमत है.. !!!!

समीर भाई ने मेरी शंका को दूर कर दिया है...... ये संरचना मुम्बई के "अग्नि बैंड" की है..... समीर भाई आपको दिल से शुक्रिया.... तो आप अब सुनिये और देखिये......!!!!

Monday, September 3, 2007

बिक्रम घोष का तबला

भाई, फ़्युज़न संगीत के बारे में क्या सोंचते है?... मेरी तो इस विषय में यह राय है कि संगीत मे प्रयोग जितना भी हो कम है.. आखिर असली संगीत तो वही है जो आपके मन को भेद कर बात करे और एक ऐसे संसार में पहुचा दे जो आपकी कल्पना से परे हो... अपने यहां भी इस दिशा में काफ़ी काम हुआ है पर उसका बाज़ार बन नही पाया है.. फिर भी कुछ नाम अगर लिये जांयेंगे तो.. चाहे आनन्द शंकर हों, ज़ाकिर हुसैन हों या फिर रंजीत बारोट हों.. और भी बहुत से नाम है पर यहां मेरा मकसद नाम गिनवाने का नहीं है... ख़ैर, तो बात ये है, दोस्‍तो, कि कुछ नये मोती हैं... जिनकी दस्तक बहुत झन्नाटेदार है.. अब ये ज़रूर देखना है इनमें नया और क्या है? तो इन्‍हीं नये नामों में एक नाम है बंगाल के बिक्रम घोष का.. जिन्होने बहुत कम समय में देश के बाहर भी ख्याति अर्जित की है .

तो सोचना क्या है? बिक्रम घोष के बारे में सिर्फ़ इतना कि मूलत: तबलानवाज़ हैं लेकिन रचना जो है आपका मन तो मोह ही लेंगी! तो यहां टिपियाइए, और आनंद लीजिए तबले के तक-धिड़ाक का...

Sunday, September 2, 2007

शुभा मुदगल का जादू...

शुभा मुदगल को पहले आपने सुना है या नहीं? कोई अलबम सुना ही होगा, या किसी वीडियो पर निग़ाह गई होगी. पर इससे अलग भी एक बड़ी उनकी दुनिया है. उतनी ही बड़ी और खनकदार जैसी कि उनकी आवाज़ है... आमतौर पर टीवी और रेडियो पर अक्‍सरहां उनकी आवाज़ से हमारी जो मुलाक़ातें होती हैं, उनमें चालू पॉपुलर म्‍यूजिक का काफी सारा तमाशा भी घुसा रहता है.. लेकिन शुभाजी की स्‍वर और सुर की जिन उत्‍तंग शिखरों तक पहुंचने की जो सहज काबिलियत है, उसके दिलअज़ीज़ मोती हमारे आगे नुमायां होते कहां हैं? मगर यह दुश्‍वार काम हमने किया. किसके लिए? हुज़ूर, मेरे करीब, आपके लिए! यहां भटके, वहां पहुंचे, अंतरजाल में कहां-कहां अटके... और तब कहीं जाकर हमने यह ख़ज़ाना हासिल किया है... लीजिए, नोश फ़रमाईए, ठुमरी की ठुनक- कान्‍हा तोरी बांकी चितवनिया, हे रे सांवरिया...

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लगे हाथ शुभाजी की गायिकी के कुछ अन्‍य नमूनों का भी आनन्‍द लीजिए..

पहले राग देस में यह सुनें:

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फिर यह ज़रा चालू, धीम-धड़ाम वाली बंदिश सुनें:

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और यह एक कजरी:

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और आखिर में एक सावनी:

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