अब जाके लग रहा है कि होली आने को है,जब किसी छत से फेंका गया गुब्बारा जिसमें भरा था पानी.....मेरे सर को छू कर निकल गया तब मुझे लगा कि होली आ गई है....ऊपर देखा तो एक छत की मुंडेर पर इक बच्चा मुझे देखकर मुस्कुरा रहा था जैसे.... बच गये बाबू .....खैर मैं तो थोड़ा आंख दिखाकर वहां से चलता बना ......पर जब मैं गया कबाड़खाने पर तो वहां का रंग देख कर मन मदमस्त हो गया,लावन्याजी ने तो होली को ही खंगाल दिया है ......और इधर अपने मित्र मयंकजी नये नये ब्लॉगजगत में आये हैं जो आजकल प्याज बहुत खा रहे हैं, भी ज़माने को अपना रंग दिखाने मशगूल हैं, तब मुझे भी लगा कि ठुमरी के लिये मैने भी कुछ रंग चुनके रखे थे जिसे शायद इसी मौक़े का इंतज़ार था, सुनिये और मदहोश हो जाने के लिये तैयार हो जाईये और होली के इस रंग का भी मज़ा लीजिये,इसका भी नशा भांग से कम नहीं है.....तो पिछले हफ़्ते छाया गांगुली जी की मदमाती आवाज़ ने महौल को जैसे छलका ही दिया था....तो आज सुना रहा हूँ आपको एक दादरा दो अलग अलग आवाज़ों में रंगी सारी गुलाबी चुनरिया रे मोहे मारे नजरिया संवरिया रे........ शोभा गुर्टू और उस्ताद शुजात हुसैन खां की लरज़ती आवाज़ में सुनिये ................आप सभी को रंग बिरंगी होली की शुभकामनाएं.
9 comments:
bahut sundar..
abhaar is prastuti ke liye.
aap ko bhi holi ki shubh kamnayen.
बहुत बढ़िया. "जब फागुन रंग ........ बहार होली की" ठुमरी तो पहले से ही तरह तरह के रंग पोत कर होली का स्वागत करने के लिए तैयार लग रही है. गीत संगीत भी उम्दा है पर एक गाना जिसके बजे बिना इलाहाबाद में होली पूरी नहीं होती थी उसे भी सुनवाइये. किशोर दा का गाया "आज न छोडेंगे..... खेलेगे हम होली" ये गाना ठुमरी पे भंग की तरंग का मज़ा भी देगा
बहुत बढ़िया. "जब फागुन रंग ........ बहार होली की" ठुमरी तो पहले से ही तरह तरह के रंग पोत कर होली का स्वागत करने के लिए तैयार लग रही है. गीत संगीत भी उम्दा है पर एक गाना जिसके बजे बिना इलाहाबाद में होली पूरी नहीं होती थी उसे भी सुनवाइये. किशोर दा का गाया "आज न छोडेंगे..... खेलेगे हम होली" ये गाना ठुमरी पे भंग की तरंग का मज़ा भी देगा
इसका आनन्द विजया-प्रभाव में लीजिए । शुभ होली
वाह...
vimal ji holi ki shubhkamnayen.
sunkar maja aa gaya
होली की ढेरों शुभकामनाएं और ये सुनवाने के लिए धन्यवाद... अब रंग चढ़ रहे हैं.
दादा देरी से ही सही होली की राम राम(बक़ौल बच्चन: दिन को होली रात दिवाली रोज़ मनाती मधुशाला)विदूषी शोभा गुर्टू की गाई ये होली जैसे मन के मैल को धो देती है और भर देती है कुछ ऐसा अनूठा,अप्रतिम जो मन को मालामाल कर देता है. ख़ाकसार को शोभा ताई के का प्रेमल संगसाथ मिला. वे इस होली को या दीगर रचनाओं को सिर्फ़ गलेबाज़ी के लिये नहीं गातीं थीं , कहीं उसे अंतस में उतार कर प्रस्तुत करतीं थीं बंदिशों को. जैसे इसी होली को गाते समय उनैकी बरसाने की बाला बन जाने वाली देहभाषा देखना एक अनुभव था. वे मेरी उस लिस्ट में शुमार हैं जिन्हें ज़माने ने उनका ड्यू नहीं दिया. गिरिजा देवी,हीरादेवी मिश्रा,निर्मला अरूण आदि की समकालीन होने से ठुमरी की इस महारानी को जस नहीं मिल पाया. शोभा जी का ठाठ आज भी भुलाए नहीं भूलता.
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